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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

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पृष्ठ 174

अध्याय ६२ तिरुक्कुरळ 149
६२. कार्य-कुशलता
६११. (किसी कार्य को) असाध्य मानकर अकर्मण्य न बनना चाहिए ।
सत्प्रयास यथोचित सम्मान प्रदान करेगा ।
६१२. अपने कर्म में अप्रयत्नशील रहने के स्वभाव को त्यागना
चाहिए । कर्म को अधूरा छोड़नेवाले को संसार छोड़
देता है ।
६१३. परोपकार नामक गौरव प्रयास नामक श्रेष्ठ स्वभाव में
अवस्थित है ।
६१४. अप्रयत्नशील का परोपकार भीरु का खड्ग से शासन करने के
समान असफल सिद्ध होगा ।
६१५. सुख की कामना से रहित कर्मरथी आत्मबन्धुओं का दुःख-
निवारक व भारवाहक स्तम्भ होता है ।
६१६. प्रयास से सम्पत्ति में वृद्धि होगी । प्रयासहीनता निर्धनता
ला देगी ।
६१७. कहा जाता है कि आलस्य में अति दरिद्रता निवास करती है,
और निरालस्यपूर्ण प्रयास में कमला निवास करती है ।
६१८. सौभाग्य का न होना किसी के लिए दोष नहीं है । समझकर
सत्प्रयास न करना ही दोष है ।
६१९. भगवान से (अथवा भाग्य से) सिद्ध न होने पर भी प्रयास
अपने शारीरिक परिश्रम की मज़दूरी अवश्य प्रदान करेगा ।
६२०. निरन्तर अथक परिश्रम करनेवाले भाग्य को भी परास्त
कर देंगे ।