तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५९ तिरुक्कुरळ 143
५९. गुप्तचर
५८१. गुप्तचर और सुप्रशंसित नीति-ग्रन्थ—इन दोनों को सम्राट् के
उभय नेत्र समझो।
५८२. प्रजामात्र पर जो कुछ सम्भवित हो उसका सदा गुप्तचर के
द्वारा शीघ्र पता लगाना सम्राट् का कर्म है।
५८३. गुप्तचर के द्वारा पता लगाकर वस्तु स्थिति का ज्ञान प्राप्त न
करनेवाले सम्राट् के लिए विजय प्राप्त करने का मार्ग
कोई है ही नहीं।
५८४. कर्मचारी, बन्धु, शत्रु आदि सब का अन्वेषण गुप्तचर का
कर्म है।
५८५. भयंकर रूप के सम्मुख निर्भय रह कर हृदयस्थ भाव को कहीं
व्यक्त न होने देने की शक्ति रखनेवाला ही गुप्तचर है।
५८६. विरागी का वेश धारण कर विकट स्थलों में प्रवेश करके
विषयों का पता लगाकर, किसी भी परिस्थिति में अपने को
अभिव्यक्त न होने देनेवाला ही गुप्तचर है।
५८७. गुप्त विषयों को खोजने की सामर्थ्य तथा ज्ञात विषयों में परिपूर्ण
निश्चलता गुप्तचर के लिए आवश्यक हैं।
५८८. एक गुप्तचर द्वारा प्राप्त विषय को भी दूसरे गुप्तचर द्वारा
निश्चित कराने के पश्चात् ही उस पर विश्वास लाना चाहिए।
५८९. शासन ऐसा हो कि एक गुप्तचर को दूसरे गुप्तचर का भान न
होने पावे। यदि तीन गुप्तचरों का कथन एक-सा हो तो
उस पर विश्वास करना चाहिए।
५९० गुप्तचर का सम्मान व्यक्त रूप से न किया जाय। किया गया
तो रहस्य को तुम स्वयं ही अभिव्यक्त करनेवाले बनोगे।