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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 334 में से

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पृष्ठ 166

अध्याय ५८ तिरुक्कुरळ 141
५८. दयार्द्रता
५७१. दयार्द्रता नामक श्रेष्ठ सौन्दर्य के कारण ही वस्तुतः यह संसार
टिका हुआ है।
५७२. दयार्द्रता के आधार पर संसार ठहरा हुआ है। यह जिनमें
न हो वे भूमि के लिए भारमात्र हैं।
५७३. संगीत से असम्बद्ध गीत किस काम का ? दयार्द्रता से
रहित नेत्र वस्तुतः नेत्र कैसे हो सकते हैं ?
५७४. यथोचित दयार्द्रता नेत्रों में न हो तो मुख पर नेत्र
मात्र से क्या प्रयोजन ?
५७५. नेत्रों का भूषण है दयार्द्रता, अन्यथा उन्हें घाव ही
समझा जायगा।
५७६. नेत्रों के होने पर भी दयार्द्रता का गुण जिसमें न हो उसे भूमि
पर खड़ा हुआ पेड़ ही समझो।
५७७ दयार्द्रता जिसमें न हो वह नेत्रहीन ही है। नेत्रवाले
दयार्द्रता से रहित भी न होंगे।
५७८. कर्त्तव्यच्युत न होनेवाले दयार्द्र-गुण-सम्पन्न व्यक्ति का
इस लोक पर अधिकार होता है।
५७९. दण्डनीय व्यक्ति को भी दयार्द्रता के साथ सहने का स्वभाव ही
सर्वश्रेष्ठ है।
५८०. सब के लिए प्रिय नागरिकता (रूपी दयार्द्रता) के इच्छुक
विष के मिश्रण को देखने पर भी उसका पान करके शान्त
रह जायेंगे।