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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 334 में से

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पृष्ठ 162

अध्याय ५६ तिरुक्कुरळ 137
५६. कुशासन
५५१. प्रजा-पीड़क अन्यायपूर्ण कर्म करनेवाला सम्राट् हत्यारों से भी
अधिक भयंकर होता है।
५५२. राजदण्ड-युक्त सम्राट् का ( प्रजा से ) धन माँगना भाला लिये
हुए ( मार्ग में ) खड़े होकर ( लुटेरे के ) 'निकाल अपने धन को '
ऐसा कहने के समान है।
५५३. प्रतिदिन ध्यान से न्यायपूर्वक राज्य न करनेवाला सम्राट् अपना
राज्य क्रमशः खो बैठेगा।
५५४. अन्यायपूर्ण व विचारहीन शासन करनेवाला सम्राट् धन एवं प्रजा
को एक साथ खो बैठेगा।
५५५. कष्ट भोगते-भोगते असह्य हो उठने के फलस्वरूप रोने से
निस्रुत अश्रु-प्रवाह ही तो सम्पत्ति का समूल नाश करनेवाली
सेना है ?
५५६. सम्राट् को स्थाई यश प्रदान करता है सुशासन । अन्यथा उसका
यश अस्थाई ही होगा ।
५५७. पृथ्वी के लिए बूँदों के न बरसने के समान होता है प्रजा
के लिए सम्राट् का सदय न होना ।
५५८. जब अन्यायी सम्राट् के अधीन रहने की नौबत आ जाती है तो
सम्पन्नता निर्धनता से अधिक दुखदायी हो जाती है ।
५५९. सम्राट् न्याय-विरुद्ध कर्म करने लगे तो मेघ ऋतु-कालीन
वर्षा किये बिना चलते बनेंगे ।
५६०. राज्य का रक्षक सुराज्य न करे, तो गाय के दूध में कमी पड़
जायगी और ब्राह्मण अपने धर्म-ग्रन्थ भूल बैठेंगे ।
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