तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 152, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५१ तिरुक्कुरळ 127
५१. विचारपूर्ण चुनाव
५०१. धर्म, अर्थ, काम व प्राण-भय—इन चारों की शक्ति का
किसी में विचार करके उसे किसी कर्म के उपयुक्त माना जायगा।
५०२ कुलीन, निर्दोष व अपयश से लज्जित होनेवाले को ही
विश्वासपात्र बनाया जा सकता है।
५०३. विशिष्ट अध्ययन किये हुए व दोषों से रहित व्यक्ति में
भी, विश्लेषण करने पर, अज्ञान का सर्वथा अभाव पाना
दुष्कर है।
५०४. गुणों एवं दोषों का भी विवेचन करके उनमें जिसकी
अधिकता हो उससे किसी को पहचानो।
५०५. अपना-अपना कर्म ही श्रेष्ठता व नीचता को परखने की
कसौटी है।
५०६. बन्धु-बान्धवहीन का चुनाव न करो। वे ममता-शून्य होने के
कारण निन्दा से लज्जित नहीं होते।
५०७. प्रेमवश उचित ज्ञान से रहित व्यक्ति का चुनाव सब प्रकार का
अज्ञान उत्पन्न कर बैठेगा।
५०८. विश्लेषण के बिना जो दूसरे को विश्वासपात्र बनाता है, उसकी
वंशावली में असह्य बाधाएँ उपस्थित होंगी।
५०९. विश्लेषण किये बिना किसी पर विश्वास मत करो। विश्वस्त बनने
पर उसे उचित कर्म दो।
५१०. विश्लेषण किये बिना विश्वासपात्र बनाना और विश्वासपात्र पर
सन्देह करना असह्य वेदना प्रदान करेंगे।