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सर्वकोश
तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 334 में से

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पृष्ठ 146

-अध्याय ४८ तिरुक्कुरळ 121
४८. शक्ति का बोध
४७१. इच्छित कर्म की शक्ति, अपनी शक्ति, शत्रु की शक्ति तथा
दोनों के सहायकों की भी शक्ति को तौल कर ही उक्त कर्म में
प्रवृत्त होना चाहिए ।
४७२. अपने कर्म तथा उसके लिए आवश्यक बल को समझकर
उस पर दत्तचित्त होकर दृढ़ता के साथ चलनेवाले के लिए
असम्भव कुछ नहीं है ।
४७३. अपनी शक्ति का बोध न होने के कारण अनेक व्यक्ति आवेशवश
किसी कर्म में अग्रसर होकर उसे मध्य में छोड़ अवनति
को प्राप्त हुए हैं ।
४७४. दूसरों के साथ मिलकर न चलनेवाले अपनी शक्ति की सीमा से
भी अनभिज्ञ अहंकारी का शीघ्र नाश होगा ।
४७५. मयूर-पंख से ही लदी गाड़ी क्यों न हो, वह वस्तु एक
परिमाण से अधिक हो जावे तो गाड़ी की धुरी टूट जायगी ।
४७६. वृक्ष के सिरे की शाखा पर पहुँचकर कोई उससे भी आगे
आवेश के फलस्वरूप बढ़े तो वह आवेश प्राणान्तक हो
जायगा ।
४७७. अपनी सीमा को समझकर उचित रूप व मात्रा में दान करो ।
वही सम्पत्ति को सँभालकर शासन करने की नीति है ।
४७८. धन के आगमन का मार्ग (आय) संकुचित होने पर भी
विसर्जन का मार्ग (व्यय) चौड़ा न हो तो कोई हानि नहीं ।
४७९. अपनी सम्पत्ति की सीमा को न समझकर जीनेवाले का जीवन
सम्पन्न-सा प्रतीत होकर भी, सर्वरिक्त हो, विनाश को प्राप्त
होगा ।
४८०. अपनी सम्पत्ति की सीमा को न समझकर बड़े दानी बनने से
वह सीमा शीघ्र घट जायगी ।
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