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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा

DevanagariHindipublished334 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 334 में से

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पृष्ठ 138

अध्याय ४५ तिरुक्कुरळ 113
४४. दोष-निरोध
४३१. अभिमान, क्रोध व विषय-वासना के दोषों से रहित व्यक्ति
अधिकाधिक वैभव सम्पन्न होते जायेंगे ।
४३२. दानहीनता, निष्प्रयोजनीय सम्मान व अनुचित आनन्द नरेश के
लिए दोष हैं ।
४३३. मान-हानि से भयभीत होनेवाले व्यक्ति तृणमात्र के दोष को भी
ताड़ के समान मानेंगे ।
४३४. दोष ही अपमान (व नाश) उत्पन्न करनेवाला शत्रु है ; अतः उस
पर ध्यान रखकर अपने को उससे मुक्त रक्खो ।
४३५. दोषागमन से पूर्व अपनी रक्षा न करनेवाले का जीवन अग्नि के
सम्मुख उपस्थित भूसे के समान नाशमान होगा ।
४३६. राजा अपने दोषों से रिक्त होने के पश्चात् दूसरों का दोषान्वेषण
करे तो उस पर किस प्रकार का दोषारोपण हो सकता है ?
४३७. उचित कर्मों को करनेवाले लोभी का धन वृद्धिमान न होकर
विनाश को ही प्राप्त होगा ।
४३८. कृपणता रूपी लोभी स्वभाव का वर्गीकरण किन्हीं (दोषों) में नहीं
किया जा सकता ।
४३९. जीवन में कभी अपने को अति महान समझकर गर्व न करना
चाहिए ; प्रयोजनहीन कर्म की इच्छा भी न रक्खो ।
४४०. इच्छित वस्तु का अनुभव दूसरों पर प्रकट हुए बिना कर सको तो
शत्रुओं का षड्यन्त्र निष्फल रहेगा ।
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