तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४१ तिरुक्कुरळ 107
४१. अशिक्षा
४०१. तत्त्व भरे ग्रन्थों के अध्ययन के बिना विद्वत्-सभा में
प्रवेश होना जुए के नियमो को समझे बिना चौपड़ फेंकने के
समान ही है।
४०२. विद्वत् सभा में अशिक्षित के भाषण करने की अभिलाषा उभय
उरोज रहित नारी के प्रेम करने की अभिलाषा के समान ही है।
४०३. शिक्षित के सम्मुख मौन धारण किये रहें तो अशिक्षित भी बड़े
सभ्य ठहरते हैं।
४०४. अशिक्षित की बुद्धि अति श्रेष्ठ होने पर भी बुद्धिमान उसका मान
नहीं करेंगे।
४०५. अशिक्षित का आत्मसम्मान शिक्षितों के संग सम्भाषण करने पर
शिथिल पड़ जायेगा।
४०६. इतना ही कि अशिक्षित भी जीवित कहलाते हैं, अन्यथा वे
निष्प्रयोजन ऊसर भूमि के समान हैं।
४०७. सूक्ष्म, श्रेष्ठ व तीव्र बुद्धि से रहित व्यक्ति का रूप-लावण्य शुभ्र
मिट्टी के सुन्दर रूप से निर्मित गुड़िया के सदृश ही है।
४०८. अशिक्षितों को प्राप्त धन शिक्षितों को प्राप्त दरिद्रता से अधिक
दुःखप्रद होता है।
४०९. अशिक्षित श्रेष्ठ कुल में जन्मे होने पर भी निम्न-कुल में जन्मे हुए
शिक्षित के समान सम्माननीय नहीं होते।
४१०. अशिक्षितों की तुलना में विशद् ज्ञान-ग्रन्थों की शिक्षा प्राप्त व्यक्ति
ठीक उसी प्रकार ठहरते हैं जैसे पशुओं की तुलना में मानव।