तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३९ तिरुक्कुरळ 103
१. शासन-विधान
३९. नरेश के गुण-कर्म
३८१. सैन्य, प्रजा, धन, अमात्य, मित्र, दुर्ग—ये छहों जिसके पास हों
वह राजाओं में पुरुष-सिंह सदृश होता है।
३८२. निर्भयता, दान, बुद्धिमत्ता, उत्साह—इन चारों की सतत पूर्णता
नरेन्द्र का सहज स्वभाव है।
३८३. अनिद्रा, विद्या, निर्भीक-प्रकृति—ये तीनों भूपति से पृथक
न होंगी।
३८४. राजा वही है जो शासन-नीति से च्युत न होते हुए
राज्य से अधर्म को हटाकर अपनी वीरता को सम्मान के साथ
बनाये रक्खे।
३८५. राजा वही है जो धन के सप्रयत्न उपार्जन, उसकी वृद्धि, रक्षा
तथा वितरण में प्रवीण हो।
३८६. जिसके दर्शन सुलभ हों और जो कठोर वचन नहीं कहता हो उस
नृपति के राज्य की प्रशंसा होती है।
३८७. यह लोक मधुर वचनों व दान देने की शक्ति से युक्त नरेश की
प्रशंसा करते हुए उसके विचारानुकूल बनता है।
३८८. जनता की न्यायोचित रक्षा करनेवाले राजा को प्रजा साक्षात्
भगवान के समान मानेगी।
३८९. कानों को कर्कश लगनेवाले शब्दों को सहने की शक्ति से युक्त
सभ्य सम्राट् के छत के नीचे संसार ठहरेगा।
३९०. राजाओं में वही दीपक है जिसमें दान, दया, धर्म-नीति, प्रजा-
संरक्षण—ये चारों हों।