तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
पृष्ठ 114, कुल 334 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३४ तिरुकुरळ 91
३४. अस्थिरता
३३१. अस्थिर वस्तुओं को स्थिर मानना तुच्छ बुद्धि की पराकाष्ठा है।
३३२. बड़ी सम्पत्ति का आना तमाशा देखने के लिए आयी हुई भीड़ के
समान होता है। उस सम्पत्ति का जाना भी तमाशा खतम
होते ही भीड़ के बिखर जाने के समान ही होता है।
३३३. धन में अस्थिरता का स्वभाव होता है। वह प्राप्त हो तो तुरन्त
स्थिर धर्मों को सम्पन्न करना चाहिए।
३३४. समीक्षा करने पर ज्ञात होगा कि दिन समय की इकाई को
प्रकट करनेवाला प्राण-भक्षक आरा है।
३३५. जीभ को वश में रखकर हिचकी के निकलने से पूर्व (मरण से
पूर्व) शुभ कर्मों को यथाशीघ्र सम्पन्न करना चाहिए।
३३६. यह संसार ऐसी महिमा-सम्पन्न है कि जो कल था, आज
नहीं रहता।
३३७. बुद्धिहीन मानव को जीवन (की क्षण-भंगुरता) का ज्ञान नहीं होता
और करोड़ों का ही नहीं अनेकानेक विषयों का विचार करता है।
३३८. स्वयं जिसमें जीवन निर्वाह किया उस अंडे को अकेला छोड़ कर,
पंख निकलने पर पक्षी जिस प्रकार निकल कर उड़ जाता है, उसी
प्रकार शरीर के साथ प्राण का सम्बन्ध होता है।
३३९. निद्रा के समान है मरण, और निद्रा से जागरण के समान
है जन्म।
३४०. (रोगों के आगार) शरीर में किरायेदार के समान उपस्थित प्राण के
लिए मानो अभी तक कोई शाश्वत स्थान ही प्राप्त नहीं हुआ।