तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २७ तिरुक्कुरळ 77
२७. तपस्या
२६१. अपने पर आये हुए दुःख के सहने तथा दूसरे जीवों को
दुःख न पहुँचाने में ही तपस्या का स्वरूप निहित है।
२६२ तपस्या के आचरणों से युक्त व्यक्ति को ही तपस्वी का वेश
उचित है। अन्यथा वह व्यर्थ प्रयास मात्र होगा।
२६३. तपस्वियों को आहार आदि समर्पित करने के हेतु ही मानों अन्य
व्यक्ति (अर्थात् गृहस्थ) तपस्या को भूल गये !
२६४. तपस्या की शक्ति से दुर्जन-शत्रु का दलन तथा सज्जन-मित्र की
समृद्धि सहज सम्भव है।
२६५. (प्रयास से) इच्छित वस्तु को इच्छानुसार प्राप्त कर सकते हैं।
अतः सप्रयास करने योग्य तपस्या इस स्थिति में (गार्हस्थ्य-
जीवन में) भी सम्भव है।
२६६. तपस्या करनेवाले ही वस्तुतः कर्त्तव्यशील होते हैं। इतर
व्यक्ति के कर्म इच्छा के वशीभूत हो व्यर्थ प्रयास मात्र
ठहरते हैं।
२६७. जिस प्रकार स्वर्ण तपते-तपते निर्मल एवं प्रकाशमान होता
चलता है, उसी प्रकार तपस्वी भी दुःख से तपते-तपते निर्मल
एवं ज्ञान के प्रकाश से युक्त होता चलता है।
२६८. अपने को पूर्णतः प्राप्त व्यक्ति की वन्दना सभी अन्य जीव
करेंगे।
२६९. तपस्या में उमंग सहित लीन व्यक्ति के लिए यम पर विजय
प्राप्त करना भी सम्भव है।
२७०. संसार में धनी अधिक न होने का कारण यही है कि तपस्वी
कम हैं और तपस्या न करनेवाले अधिक।