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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 118 में से

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दिया।
दूसरे दिन तेनाली राम अपने आवास पर इन लोगों की आवभगत में लगा हुआ था, उसी
समय उसके दरवाजे पर एक वृद्ध महिला अपने पौत्र के साथ आकर खड़ी हो गई। उसके
पौत्र ने ऊंची आवाज में पुकारा, “अरे! इस घर में कौन रहता है...बाहर आओ।”
पौत्र की आवाज बहुत कर्कश थी। तभी सभी ने सुना, बुढ़िया अपने पौत्रा को समझा रही
थीदृ'इस तरह किसी को आवाज दोगे तो उसकी प्रतिक्रिया भी वैसी ही होगी और तुम्हें भी
जवाब मिलेगा-बाहर निकलो। ठहरो! देखो! अब मैं बुलाती हूँ०-कोई है बेटा...जरा बाहर
आना...इस विवश बुढ़िया की बात तो सुनते जाना...।'
तत्काल तेनाली राम बाहर निकला। उसने बुढ़िया की बात सुनी फिर दोनों को कक्ष मं े
लाकर बैठाया तथा उनके लिए सुस्वादु भोजन मँगवाकर परोस दिया।
बुढ़िया और उसके पौत्रा ने भोजन किया। तृप्त हुए। तब तेनाली राम ने बुढ़िया से कहा,
“माँ! तेरा पोता बहुत कर्कश स्वर में कड़वी बातें बोलता है।”
“हाँ, बेटा! मगर समझ जाएगा। अभी इसने दुनिया नहीं देखी है। वही दिखाने ले जा रही
हूँ०। मैंने आज इसे यही समझाया है कि कड़वे और मीठे का बोध सीधे जीभ को होता है।
कड़वे का स्वाद विरक्त करता है जबकि मीठे से तृप्ति मिलती है। ऐसी ही स्थिति वाणी की
है। वाणी का सम्बन्ध भी जिह्वा से है। मूँ ुह से निकली बोली स्वयं पर नहीं, दूसरों पर
असर करती है। मीठा बोलोगे तो मीठी प्रतिक्रिया होगी और कड़वा बोलोगे तो कड़वी।”
वृद्धा ने कहा।
तेनाली राम ने वृद्धा को विदा किया। महाराज समझ चुके थे कि यह एक सोद्देश्य
प्रायोजित दृश्य था जिसका प्रयोजन उनके दामाद को प्रबोध देना था। फिर भोजन आदि
करने के बाद जब महाराज तेनाली राम के आवास से विदा हुए तब तेनाली राम ने उनके
जामाता को ढेरों उपहार देकर विदा किया।
रास्ते भर महाराज मौन रहे। वे देखना चाहते थे कि तेनाली राम के प्रयास का क्या असर
हुआ है। महल पहँ ुचकर उन्हें सुखद आश्चर्य हुआ जब उनके दामाद ने विनम्रतापूर्वक पूछा,
“मेरे लिए क्या निर्देश है?”
फूले न समाते हुए महाराज ने उसे विश्राम करने जाने की आज्ञा दे दी।
दूसरे दिन उनकी पुत्री ने आकर महाराज से बताया कि उसका पति इस तरह बदल चुका
है कि अब कल्पना भी नहीं की जा सकती कि कभी वह अव्यावहारिक भी रहा होगा। उसने
विह्वल होकर पूछा, “मगर पिताश्री, यह चमत्कार हुआ कैसे?”