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तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ)

पण्डित तेनाली रामकृष्णन / लोक संकलन द्वारा

स्रोत: तेनालीराम की अनोखी दुनिया (बुद्धिमत्ता एवं हास्य कथाएँ) · भारतीय लोक साहित्य संकलन · 1950 (उद्गम)

DevanagariHindipublished118 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 118 में से

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पृष्ठ 102

मुझे परामर्श दो कि हमें क्या करना चाहिए। विजयनगर के इतिहास में युद्ध का अस्तित्व
नहीं है। हमारी प्रजा युयुत्सु नहीं है। हम शान्तिप्रिय हैं किन्तु हम अपनी अस्मिता की रक्षा
करना भी जानते हैं।”
महाराज कृष्णदेव राय की गम्भीर और चिन्ता-बोझिल वाणी ने तेनाली राम को उद्वेलित
कर दिया। महाराज कृष्णदेव राय का इतना सन्तप्त स्वर उसने कभी नहीं सुना था। थोड़ी
चुप्पी के बाद सहज स्वर में तेनाली राम ने कहा, “महाराज! आप सप्तद्वीप नवखंड के
महाराज विचित्र भानु को एक प्रतिवाद पत्र भेजें जिसमें कहा गया हो कि ‘सप्तद्वीप नवखंड
के ऐसे सभी गुप्तचर गिरफ्तार कर लिये गए हैं जो विजयनगर में अराजक गतिविधियों में
संलग्न थे। इन लोगों पर कड़ी कार्रवाई होगी। यदि ‘सप्तद्वीप नवखंड’ के गुप्तचरों की
गतिविधियाँ नहीं रोकी गईं तो हम विवश होकर अपनी सुरक्षा के लिए कोई भी कदम
उठाने के लिए बाध्य होंगे। ऐसे में पड़ोसी राज्य होने की मर्यादा का ध्यान रखना हमारे
लिए आवश्यक नहीं रह जाएगा।’ पत्रा में यह सन्देश भी होना चाहिए कि ‘विजयनगर के
सीमान्तकों पर चल रही सप्तद्वीप नवखंड के सैनिकों की गतिविधियाँ अविलम्ब रोकी जाएँ
अन्यथा हमें भी अपनी शक्ति और सामर्थ्य का प्रदर्शन करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।’ ”
इस बातचीत के बाद तेनाली राम घर लौट आया।
महाराज कृष्णदेव राय का पत्र जब सप्तद्वीप नवखंड के राजा महाराज विचित्र भानु के
पास पहुँचा तब वह क्रोध से काँप उठा। उसे अपने बाहुबल और सैन्य संगठन पर बहुत
घमंड था। क्रोधावेग में उसने विजयनगर के महाराज के पत्रवाहक दूत से कहा, “जाओ!
महाराज कृष्णदेव राय को कहो कि हमारे गुप्तचरों को अविलम्ब कारागार से मुक्त कर दें
अन्यथा परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें। हम उन्हें तीन दिनों का समय दे रहे हैं। तीन
दिनों में हमारे आदमी हम तक नहीं पहुँचे तो परिणाम इतना भयंकर होगा कि उसे
विजयनगर की पीढ़ियाँ स्मरण करेंगी!”
दूत ने लौटकर महाराज कृष्णदेव राय को सारी बातें बताईं। गुप्तचरों को छोड़ने का कोई
कारण नहीं था किन्तु यह महाराज कृष्णदेव राय के लिए अनिर्णय की भी घड़ी
थी...विजयनगर पर युद्ध के काले अवसादकारी बादल मँडरा रहे थे।
ऐसी घड़ी में तेनाली राम ने महाराज कृष्णदेव राय से कहा, “महाराज! आप इस संशय
में न पड़ें कि विजयनगर के इतिहास में युद्ध कभी नहीं हुआ! जो कभी अतीत में नहीं हुआ
वह भविष्य में नहीं होगा, ऐसा मानकर अनिर्णय में रहना उचित नहीं। संशयमुक्त होकर
सीमा की रक्षा का निर्देश अपने सशस्त्र सैन्य बल को दें।”
तीन दिन बीते। विजयनगर की सीमा पर भीषण संग्राम मच गया। इस घनघोर युद्ध में
सप्तद्वीप नवखंड के राजा विचित्र भानु को स्वयं महाराज कृष्णदेव राय ने पराजित कर
बन्दी बना लिया।