तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)
Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary
आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा
DevanagariHindipublished177 पृष्ठ
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अध्याय - ८
[ ततः च ] तीव्र, मध्यम या मन्द फल देने के बाद
[ निर्जरा ] उन कर्मों की निर्जरा हो जाती है अर्थात् उदय में
आने के बाद कर्म आत्मा से पृथक् हो जाते हैं।
नामप्रत्ययाः सर्वतो योगविशेषात्सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाह-
स्थिताः सर्वात्मप्रदेशेष्वनन्तानन्तप्रदेशाः ॥२४॥
[ नामप्रत्ययाः ] ज्ञानावरणादि कर्म प्रकृतियों का कारण,
[ सर्वतः ] सर्व तरफ से अर्थात् समस्त भावों में
[ योगविशेषात् ] योग विशेष से [ सूक्ष्मैकक्षेत्रावगाहस्थिताः ]
सूक्ष्म, एकक्षेत्रावगाहरूप स्थित [ सर्वात्मप्रदेशेषु ] और सर्व
आत्मप्रदेशों में [ अनन्तानन्तप्रदेशाः ] जो कर्म पुद्गल के
अनन्तानन्त प्रदेश हैं सो प्रदेशबन्ध है।
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