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तरुण के स्वप्न (नेताजी सुभाष चन्द्र बोस - युवा भारत के नाम क्रान्तिकारी वैचारिक घोषणा-पत्र)

Tarun Ke Swapna by Netaji Subhash Chandra Bose

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा

DevanagariHindipublished174 पृष्ठ

देशबन्धु
काम करवानेकी चेष्टाएं की यह शायद देशवासी नही
जानते । उनके बोए हुए वृक्षमें जब फल आयेगा । तब
देशवासी जानेंगे । जीवन, मरण, शयन, स्वप्नमें उनका
एक ही ध्यान था, एक ही चिन्ता थी, स्वदेश सेवा ।
स्वदेश सेवा ही उनके धर्म जीवनका सोपान था ।
देशबन्धुके जीवनकी बात कहते हुए यदि एक व्यक्ति
का उल्लेख न किया जायगा तो, कुछ न कहा जायगा ।
जो देवी जनसाधारणकी दृष्टिसे तिरोहित मूर्तिमती-
सेवा और शान्तिकी तरह, छायाके समान देशबन्धुके
पार्श्वमें रहतीं, उनको बाद देनेसे देशबन्धुके जीवनमे क्या
बाकी रह जायगा यह कौन कह सकता है ? भोगके
अत्युच्च शिखरपर जिन्होंने हिन्दू रमणीके आदर्श, लज्जा,
नम्रता और सेवाको किसी दिन विस्मृत नहीं किया,
विपत्के महान् अन्धकारमे जिन्होंने पातिव्रत, चित्तस्थैर्य
और भगवद्विश्वासका सहारा न छोड़ा, उन्ही देवीकी
बात लिखते समय मुझे शब्द नहीं मिलते । देशबन्धु तरुणों
के राजा थे और उनकी पतिव्रता साध्वी पत्नी तरुणोंकी
माता । देशबन्धुके देहत्यागके बाद आज वे सिर्फ चिर-
रंजनकी ही माता नहीं हैं, सिर्फ तरुणोंकी ही माता नहीं
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तरुणके स्वप्न
है, वे आज समस्त बंगालकी मा हैं। बंगालीके हृदयका
सर्वश्रेष्ट अर्घ्य आज उनके चरणोंपर समर्पित है।
अलीपुरके मामलेमें अरविन्द बाबूका समर्थन करते
हुए देशबन्धुने कहा था—
He will be looked upon as the poet of pa-
triotism, the prophet of nationalism and the
lover of humanity. His words well be echoed
and reechoed, etc.
यह क्या आज देशबन्धुके सम्बन्धमें नहीं कहा जा
सकता ?
● समाप्त ●
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