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सर्वकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

५२ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः
सव्यभिचारविरुद्धसत्प्रतिपक्षासिद्धबाधिताः पञ्च हेत्वाभासाः ।
सव्यभिचारोऽनैकान्तिकः । स त्रिविधः—साधारणासाधा-
रणानुपसंहारिभेदात् ।
तत्र साध्याभाववद्वृत्तिः साधारणोऽनैकान्तिकः । यथा-
पर्वतो वह्निमान् प्रमेयत्वादिति । ( अत्र ) प्रमेयत्वस्य वह्नय-
भाववति ह्रदे विद्यमानत्वात् ।
सव्यभिचा०-विरुद्ध-सत्प्रतिपक्ष-असिद्ध और बाधित ये पाँच हेत्वाभास हैं ।
जो हेतु अनैकान्तिक होता है, वह सव्यभिचार है । वह तीन प्रकार का होता
है—साधारण-असाधारण और अनुपसंहारी के भेद से । उनमें साध्याभाव के अधिकरण
में रहने वाला हेतु साधारणनामक अनैकान्तिक हेत्वाभास है । जैसे—“पर्वतो वह्नि-
मान् प्रमेयत्वात्” इस अनुमान में प्रमेयत्व-हेतु साधारण अनैकान्तिक है । क्योंकि
प्रमेयत्व-हेतु, वह्निरूपसाध्य का अभाव जिसमें है, ऐसे ह्रद में विद्यमान है ।
न्यायबोधिनी
सपक्षलक्षणमाह—निश्चितेति । साध्यप्रकारकनिश्चयविशेष्यत्वं सपक्ष-
त्वम् । निश्चयश्च महानसं वह्निमदित्याकारकः ।
विपक्षलक्षणमाह—निश्चितसाध्याभावेति । साध्याभावप्रकारकनिश्चय-
विशेष्यत्वं विपक्षत्वम् । निश्चयश्च ह्रदो वह्नयभाववानित्याकारकः ।
एवं सद्धेतून्निरूप्य हेत्वाभासान्निरूपयति—सव्यभिचारेति । हेतुवदाभा-
सन्त इति हेत्वाभासाः दुष्टहेतव इत्यर्थः । दोषाश्च व्यभिचारविरोधसत्प्रति-
हिन्दी-कला
मूलोक्त सपक्षलक्षण को न्यायबोधिनीकार स्पष्ट करते हैं—"साध्यप्रकारक-
निश्चयविशेष्यत्वं सपक्षत्वम्”। अर्थात् जिसमें साध्यप्रकारक निश्चय हो, वह सपक्ष है।
जैसे "महानसं वह्निमत्” ऐसा वह्निप्रकारक निश्चय महानसरूप विशेष्य में है, इस
लिये महानस सपक्ष कहाता है ।
इसी तरह "साध्याभावप्रकारकनिश्चयविशेष्यत्व विपक्षत्व” है । अर्थात्
जिसमें साध्याभाव का निश्चय हो, वह विपक्ष कहाता है । ऐसा निश्चय "ह्रदो
वह्नयभाववान्” ऐसा निश्चय है । अतः इस निश्चय का विशेष्य जो ह्रद है, वह
वह्निसाध्यक अनुमिति करने में विपक्ष कहाता है ।
मूलकार पूर्व में सद्धेतुओं का निरूपण करने के अनन्तर अब हेत्वाभासों का
निरूपण करते हैं—सव्यभिचार विरुद्ध आदि । जो वस्तुतः हेतु न हों, परन्तु हेतु के
समान भासित हों, वे हेत्वाभास हैं । अर्थात् दोषयुक्त हेतु हेत्वाभास हैं । हेतुदोष