तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः
प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनानि पञ्चावयवाः । पर्वतो
वह्निमानिति प्रतिज्ञा । धूमवत्त्वादिति हेतुः । यो यो धूमवान्
स स वह्निमानित्युदाहरणम् । तथा चायमित्युपनयः । तस्मात्तथेति
निगमनम् ।
स्वार्थानुमितिपरार्थानुमित्योर्लिङ्गपरामर्श एव करणम् ।
तस्माल्लिङ्गपरामर्शोऽनुमानम् ।
लिङ्गं त्रिविधम्—अन्वयव्यतिरेकि केवलान्वयि केवलव्यति-
प्रतिज्ञा-हेतु-उदाहरण-उपनय और निगमन ये ही अनुमान के पाँच अवयव हैं।
इनमें 'पर्वतो वह्निमान्' यह वाक्य प्रतिज्ञा है, 'धूमवत्त्वात्' यह हेतु है, "यो यो
धूमवान् स स वह्निमान्" यह उदाहरण है, 'तथा चायम्' यह उपनय है, और
'तस्मात् तथा' यह निगमन है ।
स्वार्थानुमिति हो या परार्थानुमिति हो, दोनों में पूर्वोक्त लिङ्गपरामर्श ही करण
है । अतः अनुमिति का करण होने से लिङ्गपरामर्श अनुमान है ।
लिङ्ग तीन प्रकार का होता है—अन्वयव्यतिरेकि केवलान्वयि और केवल-
व्यतिरेकि ।
न्यायबोधिनी
अन्वयेनेति । व्यापकसामानाधिकरण्यरूपव्याप्तिमानित्यर्थः । व्यतिरेके-
णेति । व्यतिरेको नामाभावः । तथा च साध्याभावहेत्वभावयोर्व्याप्तिर्व्य-
तिरेकव्याप्तिः । इयं च व्याप्तिः 'यत्र तत्र वह्न्यभावस्तत्र तत्र धूमाभाव'
हिन्दी-कला
स्वार्थानुमिति हो या परार्थानुमिति हो, दोनों में लिङ्गपरामर्श क ण है । इस-
लिये लिङ्गपरामर्श अनुमान है, यह मूलकार का कथन है ।¹ लिङ्ग तीन प्रकार के
हैं—अन्वयव्यतिरेकी, केवलान्वयी और केवलव्यतिरेकी ।
अन्वय और व्यतिरेक दोनों तरह की व्याप्ति से युक्त लिङ्ग ( हेतु ) अन्वय-
व्यतिरेकी कहाता है । अन्वयव्याप्तिका अर्थ है—व्यापकसमानाधिकरण्यरूप व्याप्ति ।
अर्थात् पूर्वोक्त हेतुव्यापकसाध्यसामानाधिकरण्यरूप व्याप्ति अन्वयव्याप्ति है ।
व्यतिरेक का अर्थ अभाव है । इसलिये साध्याभाव और हेत्वभाव की व्याप्ति व्यति-
१. किन्तु न्यायबोधिनीकार ने अपने व्याख्यान में व्याप्तिज्ञान को करण कहा है
और परामर्श को व्यापार कहा है । संभवतः इसी मतभेद के कारण उक्त मूल
का व्याख्यान न्यायबोधिनीकार ने नहीं किया ।