तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः
अनुमानं द्विविधं—स्वार्थं परार्थं च ।
स्वार्थं स्वानुमितिहेतुः, तथाहि—स्वयमेव भूयोदर्शनेन यत्र
यत्र धूमस्तत्र तत्राग्निरिति महानसादौ व्याप्तिं गृहीत्वा पर्वतसमीपं
अनुमान दो प्रकार का होता है — स्वार्थानुमान और परार्थानुमान ।
उन दोनों अनुमानों के अन्तर्गत अपनी अनुमिति का हेतु अनुमान स्वार्थानुमान
कहलाता है। जैसे—कोई स्वयं ही भूयोदर्शन ( बार बार दर्शन ) द्वारा “जहाँ जहाँ
धूम होता है, वहाँ वहाँ अग्नि होती है” इस प्रकार ‘महानस ( रसोईघर ) आदि में
न्यायबोधिनी
वच्छिन्नप्रतियोगितावच्छेदकावच्छिन्नवैयधिकरण्यावच्छिन्नाभाववन्निरूपित-
हेतुतावच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्नवृत्तित्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावो व्या-
प्तिरित्यर्थः । तच्च केवलान्वयिन्यव्याप्तमिति सिद्धान्तानुसरणम् ।
अनुमानं विभजते—स्वार्थमिति । स्वार्थानुमानं नाम न्यायाप्रयोज्यानु-
मानम् । न्यायप्रयोज्यानुमानं परार्थानुमानम् ।
हिन्दी-कला
निरूपक एवं प्रतियोगिव्यधिकरण अभाव = प्रतियोगितावच्छेदक संयोगादि-
सम्बन्धावच्छिन्न तथा प्रतियोगितावच्छेदकवह्नित्वावच्छिन्न के साथ वैयधिकरण्य
वाला अभाव, उस अभाव का जो अधिकरण ह्रद आदि, उसमें हेतुतावच्छेदकीभूत
संयोगसम्बन्ध से वृत्तित्ता मीन-शैवाल आदि में है और तादृशवृत्तित्ता का अभाव धूम
में है । तादृशवृत्तित्ता के अभाव की प्रतियोगिता वृत्तित्ता में है, जो वृत्तित्वात्वधर्म से
अवच्छिन्न है । अतः वृत्तित्वात्वावच्छिन्न-तादृशप्रतियोगितानिरूपक अभाव ही
साध्याभाववदवृत्तित्वरूप व्याप्ति का परिष्कृत स्वरूप है। इसका विशेष स्पष्टीकरण
‘संस्कृत-कला’ में द्रष्टव्य है ।
किन्तु यह “साध्याभाववदवृत्तित्व” रूप पूर्वपक्षव्याप्ति का स्वरूप “इदं वाच्यं
ज्ञेयत्वात्” इत्यादि केवलान्वयिहेतु में अव्याप्त हो जाता है। क्योंकि वहाँ वाच्यत्वरूप
साध्य का अभाव ही कहीं प्रसिद्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में ‘साध्याभाववदवृत्तित्वरूप’
व्याप्ति केवलान्वयिस्थल में सुतरां नहीं बन पायेगी। इसीलिये पूर्व में उक्त “हेतु-
समानाधिकरणात्यन्ताभावप्रतियोगितानवच्छेदकधर्मवत्त्व” रूप सिद्धान्तलक्षण का
अनुसरण आवश्यक है । सिद्धान्तलक्षण में साध्याभाव या हेत्वभाव का उल्लेख नहीं
होने से यह व्याप्ति केवलान्वयिस्थल में भी संगत हो जाती है ।
अनुमान के दो भेद हैं—स्वार्थानुमान और परार्थानुमान । इनमें न्याय से अप्रयोज्य
अनुमान स्वार्थानुमान है। अर्थात् जिस अनुमान में प्रतिज्ञा-हेत्वादिसमुदायरूप न्याय
का प्रयोग न हो, वह स्वार्थानुमान है। तथा न्याय से प्रयोज्य अनुमान परार्थानुमान