तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ तर्कसंग्रहः [ अनुमानपरिच्छेदः
यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्राग्निरिति साहचर्यनियमो व्याप्तिः ।
व्याप्यस्य पर्वतादिवृत्तित्वं पक्षधर्मता ।
“जहाँ-जहाँ धूम है, वहाँ-वहाँ अग्नि है” इस प्रकार के हेतु और साध्य के
साहचर्यनियम को ( नियत साहचर्य को ) व्याप्ति कहते हैं ।
व्याप्य की ( वह्निव्याप्ति विशिष्ट धूम आदि की ) पर्वतादि पक्ष में वृत्तिता
( रहना ) को पक्षधर्मता कहते हैं ।
न्यायबोधिनी
पितविशेष्यत्वावच्छिन्नव्याप्तित्वावच्छिन्नप्रकारतानिरूपितविशेष्यत्वावच्छि-
न्नधूमत्वावच्छिन्नप्रकारतानिरूपितपर्वतत्वावच्छिन्नविशेष्यताशालिनिश्चयः
कारणमिति वाच्यम् । स च निर्णयः वह्निव्याप्यधूमवान्पर्वत
इत्याकारको बोध्यः ।
यत्र यत्रेति । यत्र पदवीप्सा धूमाधिकरणे यावति वह्निमत्त्वलाभाय ।
यावत्पदमहिम्ना वह्नेर्धूमव्यापकत्वं लब्धम् । तदेव स्पष्टयति—साहचर्य-
नियम इति । एतदर्थस्तु नियतसाहचर्यं व्याप्तिरिति । नियतत्वं व्यापक-
हिन्दी-कला
वच्छेदकभाव मानते हैं । इनके मतानुसार जो व्याप्ति वह्नि के प्रति विशेष्य है, वही
व्याप्ति धूम के प्रति प्रकार है, फिर भी व्याप्ति में रहने वाली विशेष्यता और
प्रकारता भिन्न-भिन्न है । इसीलिये व्याप्तिनिष्ठा विशेष्यता व्याप्तिनिष्ठ प्रकारता
का अवच्छेदकरूप में भासित होगी, न कि अभिन्नरूप में । अतः गदाधर भट्टाचार्य के
मतानुसार “वह्निव्याप्य-धूमवान् पर्वतः” इस परामर्शात्मक निश्चयज्ञान का स्वरूप
यों हुआ—
वह्नित्वावच्छिन्नवह्निनिष्ठप्रकारतानिरूपिता जो व्याप्तिनिष्ठा विशेष्यता,
तादृशविशेष्यत्वावच्छिन्ना एवं व्याप्तित्वावच्छिन्ना जो व्याप्तिनिष्ठा प्रकारता, तादृश-
प्रकारतानिरूपिता जो धूमनिष्ठा विशेष्यता, तादृशविशेष्यत्वावच्छिन्ना एवं धूमत्वा-
वच्छिन्ना जो धूमगत प्रकारता, तादृशप्रकारतानिरूपिता जो पर्वतत्वावच्छिन्ना विशे-
ष्यता, तादृशविशेष्यताशाली निश्चय ‘पर्वतो वह्निमान्’ इस पर्वतोद्देश्यक वह्नि-
विधेयक अनुमिति के प्रति कारण है । विशेष विवेचन ‘संस्कृत-कला’ में द्रष्टव्य है ।
“यत्र-यत्र धूमस्तत्र तत्राग्निः” इस प्रकार का साहचर्यनियम व्याप्तिपद का अर्थ
है । यहाँ ‘यत्र’ पद की द्विरुक्ति से यावत् धूमाधिकरण में ( अर्थात् जितने धूमाधिकरण
हैं, सब में ) वह्निमत्ता का लाभ होता है । इस प्रकार यावत्पद की महिमा से
वह्नि में धूम की व्यापकता प्रतीत होती है । इसी बात का स्पष्टीकरण ‘साहचर्य-
नियम’ पद से मूलकार ने किया है । अर्थात् धूमपदोपलक्षित हेतु और वह्निपदो-
पलक्षित साध्य का नियतसाहचर्य ही व्याप्ति है । नियतत्व का अर्थ है ‘व्यापक-