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सर्वकोश
तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

३८ तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः
एवं सन्निकर्षषट्कजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षं, तत्करणमिन्द्रियम् ।
तस्मादिन्द्रियं प्रत्यक्षप्रमाणमिति सिद्धम् ।
इस प्रकार उक्त षड्विध सन्निकर्षों से उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्ष-प्रमा है और उसका
करण इन्द्रिय है । अतः इन्द्रियाँ प्रत्यक्षज्ञान का करण होने से प्रत्यक्षप्रमाण हैं, यह
सिद्ध हुआ ।
॥ इति प्रत्यक्षपरिच्छेदः ॥
न्यायबोधिनी
भावप्रत्यक्षे इन्द्रियसयुक्तविशेषणता । द्रव्यसमवेताधिकरणकाभावप्रत्यक्षे
इन्द्रियसयुक्तसमवेतविशेषणता, द्रव्यसमवेतसमवेताधिकरणकाभावप्रत्यक्षे
इन्द्रियसंयुक्तसमवेतसमवेतविशेषणता च सन्निकर्षः । तत्र घटे पटत्वाभावः
संयुक्तविशेषणतया गृह्यते । घटसमवेतघटत्वादौ पृथिवीत्वाभावः सयुक्त-
समवेतविशेषणतया गृह्यते । घटसमवेतसमवेतरूपत्वादौ नीलत्वाभावश्च
संयुक्तसमवेतसमवेतविशेषणतया गृह्यत इति संक्षेपः ।
हिन्दी-कला
करना चाहिये । जैसे—द्रव्यस्वरूप अधिकरण में यदि किसी अभाव का प्रत्यक्ष
करना हो तो वहाँ इन्द्रियसंयुक्तविशेषणता सन्निकर्ष हेतु होगा । वहाँ इन्द्रियसंयुक्त
वह द्रव्य होगा और उसमें अभाव विशेषण होगा । इस प्रकार द्रव्य में अभाव का
प्रत्यक्ष इन्द्रियसंयुक्तविशेषणता सन्निकर्ष से होता है । इसी प्रकार द्रव्यसमवेत रूपादि
में अभाव का प्रत्यक्ष करना हो तो वहाँ इन्द्रियसंयुक्तसमवेतविशेषणता सन्निकर्ष
कारण होगा । यहाँ भी इन्द्रियसंयुक्त द्रव्य, उसमें समवेतरूपादि गुण, उसमें समवेत-
रूपत्वादि जाति और उसमें विशेषणीभूत अभाव घटाभाव आदि है । इस प्रकार
रूपत्वादि में घटाभावादि का प्रत्यक्ष इन्द्रियसंयुक्तसमवेतसमवेतविशेषणता सन्निकर्ष
से होता है ।
अभाव-प्रत्यक्ष में विशेषणता-सन्निकर्ष की कारणता का उदाहरण न्यायबोधिनी-
कार स्वयं देते है—घट में पटत्वाभाव का प्रत्यक्ष संयुक्तविशेषणता सन्निकर्ष से होता
है । घटसमवेत घटत्व में पृथिवीत्वाभाव का प्रत्यक्ष संयुक्तसमवेतविशेषणता सन्निकर्ष से
होता है । तथा घटसमवेत ( रूप ) में समवेत जो रूपत्वादि, उसमें नीलत्वाभाव
का .प्रत्यक्ष संयुक्तसमवेत-समवेत-विशेषणता सन्निकर्ष से होता है । यही षड्विध
सन्निकर्षों का संक्षिप्त स्वरूप है ।
इति तर्कसंग्रहन्यायबोधिन्याः 'हिन्दी-कला' व्याख्यायां प्रत्यक्षपरिच्छेदः ।
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