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तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 199 में से

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पृष्ठ 48

न्यायबोधिनी-कलासंवलितः २९
न्यायबोधिनी
मवायिकारणत्वात् पटात्मककार्ये तदवयवतन्तुसंयोगस्यैवासमवायि-
कारणत्वमिति दर्शयति —यथा तन्तुसंयोगः पटस्येति । पटात्मककार्येण सहै-
कस्मिन्नर्थे तन्तौ समवेतं सत् समवायसम्बन्धेन वर्तमानं सत् पटात्मककार्यं
प्रति तन्तुसंयोगात्मकं कारणमसमवायिकारणमित्यर्थः । द्वितीयमसमवा-
यिकारणं कारणेन सहेत्यादिना यत् पूर्वोक्तं, तदुदाहरति - तन्तुरूपमिति ।
कारणेन सह पटरूपसमवायिकारणीभूतपटेन सह एकस्मिन्नर्थे तन्तुरूपेऽर्थे
समवेतं सत् समवायसम्बन्धेन वर्तमानं सत् तन्तुरूपं पटगतरूपं प्रति कारणं
भवति अतोऽसमवायिकारणं तन्तुरूपं पटगतरूपस्य । सामान्यलक्षणन्तु—
समवायसम्बन्धावच्छिन्नकार्यता निरूपिता या समवाय-स्वसमवायिसमवेत-
त्वान्यतरसम्बन्धावच्छिन्ना कारणता तदाश्रयत्वमसमवायिकारणत्वमिति ।
हिन्दी-कला
कारण है, उसके साथ अर्थात् अपने समवायिकारण के साथ एक अर्थ में
रहने वाला कारण असमवायिकारण है। इस प्रकार दो तरह का असमवायिकारण
होता है ।
प्रथम का उदाहरण तन्तुसंयोग है। क्योंकि जन्यद्रव्यमात्र के प्रति अवयवों
के संयोग के ही असमवायिकारण होने से पटस्वरूप कार्य के प्रति उसके अवयवभूत
तन्तुओ का संयोग ही असमवायिकारण होता है ! यहाँ पटात्मक कार्य के साथ तन्तु-
स्वरूप एक अर्थ में समवायसम्बन्ध से तन्तु का संयोग वर्तमान है । अतः पट के प्रति
तन्तुसंयोग असमवायिकारण हुआ ।
पूर्वोक्त द्वितीय असमवायिकारण का उदाहरण मूलकार देते हैं — जैसे तन्तु का रूप
पटरूप का असमवायिकारण है। लक्षण का समन्वय यों हैं—यहाँ तन्तुरूप का कार्य
पटरूप है और पटरूप का समवायिकारण पट है । अतः कारण के साथ अर्थात् पटरूप
का समवायिकारण जो पट, उसके साथ एक अर्थ में तन्तु में, समवेत अर्थात् समवाय-
सम्बन्ध से वर्तमान होता हुआ तन्तुरूप पटरूप के प्रति कारण होता है । इसलिये
तन्तु का रूप पट के रूप के प्रति असमवायिकारण हुआ ।
पूर्व में उदाहृत उभय प्रकार के असमवायिकारण का सामान्यलक्षण (एक लक्षण)
न्यायबोधिनीकार परिष्कृत करते हैं समवायसम्बन्धावच्छिन्ना जो कार्यता, ( पटगत
कार्यता या पटरूपगत कार्यता ) उससे निरूपिता जो समवायसम्बन्ध या स्वसमवायि-
समवेतत्वसम्बन्ध में किसी एक सम्बन्ध से अवच्छिन्ना कारणता (क्रमशः तन्तुसंयोग-
गत या तन्तुरूपगत कारणता ) उसका आश्रयत्व असमवायिकारणत्व है । इसके
अनुसार पट के प्रति तन्तुसंयोग और पटरूप के प्रति तन्तुरूप असमवायिकारण सिद्ध
हुआ । विशेष विवेचन संस्कृत-कला' में द्रष्टव्य है ।