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तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)

Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi

अन्नम्भट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished199 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 199 में से

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पृष्ठ 44

तत्करणमपि चतुर्विधम्—प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दभेदात् ।
असाधारणं कारणं करणम् ।
उपर्युक्त चतुर्विध यथार्थानुभव का करण भी चार प्रकार का होता है—प्रत्यक्ष-
अनुमान-उपमान और शब्द के भेद से । ( ये चारों प्रमाण कहे जाते हैं । )
कार्य के प्रति जो असाधारण कारण है, उसे करण कहते हैं ।
न्यायबोधिनी
तत्करणमिति । फलीभूतप्रत्यक्षादिकरणं चतुर्विधमित्यर्थः । प्रत्यक्षादि-
चतुर्विधप्रमाणानां प्रमाकरणत्वं सामान्यलक्षणम् । एकैकप्रमाणलक्षणन्तु
वक्ष्यते प्रत्यक्षज्ञानेत्यादिना ।
करणलक्षणमाह—असाधारणमिति । व्यापारवदसाधारणं कारणं करण-
मित्यर्थः । असाधारणत्वञ्च कार्यत्वातिरिक्तधर्मावच्छिन्नकार्यता निरूपित-
कारणताशालित्वम् । यथा—दण्डादेर्घटादिकं प्रत्यसाधारणकारणत्वम् ।
कार्यत्वातिरिक्तो घटत्वादिरूपो धर्मः, तदवच्छिन्नकार्यता घटे, तन्निरूपिता
कारणता दण्डे । अतो घटं प्रति दण्डोऽसाधारणं कारणम् । भ्रम्यादिरूपव्या-
पारवत्वाच्च करणम् । साधारणत्वञ्च कार्यत्वावच्छिन्नकार्यता निरूपितकार-
णताशालित्वम् । ईश्वरादृष्टादेःकार्यत्वावच्छिन्नं प्रत्येव कारणत्वात् साधा-
रणकारणत्वम् ।
हिन्दी-कला
( प्रमा ) के चार भेद बताते हैं—प्रत्यक्ष अनुमिति-उपमिति और शाब्द । इसके करण
भी चार होते हैं—प्रत्यक्ष-अनुमान-उपमान और शब्द । यही न्यायशास्त्र में चार
प्रमाण कहे जाते हैं, क्योंकि प्रमा के ये करण हैं । इसीलिये उक्त चतुर्विध प्रमाणों का
सामान्य लक्षण है - 'प्रमाकरणत्वम् प्रमाणत्वम्' । एक एक प्रमाण का लक्षण तो
आगे बताया जायगा ।
मूलोक्त करणलक्षण का परिष्कृत अर्थ न्यायबोधिनीकार करते हैं "व्यापारवान्
होता हुआ असाधारण कारण करण है" ऐसा । असाधारणत्व का परिष्कृत स्वरूप है-
कार्यत्व से अतिरिक्त जो धर्म घटत्व आदि, उससे अवच्छिन्न जो घटादिवृत्ति कार्यता,
तादृश कार्यता से निरूपित जो दण्डादिनिष्ठ कारणता, उससे युक्त होना असाधारणत्व
है । अतः घट के प्रति असाधारण कारण होने से तथा भ्रमि ( भ्रमण ) रूप
व्यापारवान् होने से दण्ड घट का करण है ।
साधारणकारणत्व का स्वरूप बताते हैं—कार्यत्व-धर्म से अवच्छिन्न ( विशिष्ट )
जो कार्यता, उससे निरूपित जो कारणता, तादृश कारणताशालित्व असाधारणत्व है ।
इसके अनुसार कार्यत्व-धर्म से अवच्छिन्न कार्यमात्र के प्रति कारण होने से ईश्वर
अदृष्ट ( धर्माधर्म ) काल आदि साधारणकारण कहे जाते हैं ।