तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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ध्वन्यात्मको वर्णात्मकश्च । तत्र ध्वन्यात्मको भेर्यादौ । वर्णात्मकः
संस्कृतभाषादिरूपः ।
सर्वव्यवहारहेतुर्गुणो बुद्धिर्ज्ञानम् । सा द्विविधा—स्मृतिरनु-
भवश्च ।
शब्द दो प्रकार का होता है—ध्वन्यात्मक शब्द और वर्णात्मक शब्द । उनमें ध्वन्या-
त्मक शब्द भेरी ( नगाड़े ) आदि में होता है और वर्णात्मक शब्द संस्कृतभाषा
आदि स्वरूप है ।
समस्त व्यवहारों का हेतुभूत गुण बुद्धि है । बुद्धि को ज्ञान भी कहते हैं । बुद्धि
दो प्रकार की होती है—स्मृति और अनुभव ।
न्यायबोधिनी
रूपादावतिव्याप्तिवारणाय—श्रोत्रेति । स त्रिविधः संयोगजो, विभागजः,
शब्दजश्चेति । यथा भेरीदण्डसंयोगजो झाङ्कारादिशब्द , हस्ताभिघात-
संयोगजन्यो मृदङ्गादिशब्दः । वंशे पाट्यमाने दलद्वयविभागजश्चटचटा-
शब्दः । शब्दोत्पत्तिदेशमारभ्य श्रोत्रदेशपर्यन्तं वीचीतरङ्गन्यायेन कदम्ब-
मुकुलन्यायेन वा निमित्तपवनेन शब्दधारा जायन्ते । तत्र उत्तरोत्तरशब्दे
पूर्वपूर्वशब्दः कारणम् ।
बुद्धेर्लक्षणमाह—सर्वव्यवहारेति । व्यवहारः शब्दप्रयोगः । ज्ञानं विना
शब्दप्रयोगासंभवात् शब्दप्रयोगरूपव्यवहारहेतुत्वं ज्ञानस्य लक्षणम् । बुद्धिं
विभजते - सा द्विविधेति ।
हिन्दी-कला
के लिये किया गया है । रूपादि गुण में शब्दलक्षण की अतिव्याप्ति रोकने के लिये
'श्रोत्र' पद दिया । शब्द के तीन भेद हैं—संयोगज शब्द, विभागज शब्द और शब्दज
शब्द । जैसे, भेरी-दण्ड के संयोग से होनेवाला झङ्कार आदि शब्द तथा हस्त के
संयोग से होनेवाला मृदङ्गादिका शब्द संयोगज है । बाँस के फाड़ते समय उसके
दोनों टुकड़ों के विभाग से उत्पन्न 'चटचटा' शब्द विभागज शब्द है । तथा शब्दो-
त्पत्तिस्थल से लेकर श्रोत्रपर्यन्त वीचीतरङ्गन्याय से या कदम्बमुकुलन्याय से
वायु के कारण शब्द की धारा उत्पन्न हो जाती है । यह शब्दज शब्द है । क्योंकि उत्त-
रोत्तर शब्द के प्रति पूर्व-पूर्व शब्द कारण होता है ।
समस्त व्यवहारों का हेतुभूत गुण बुद्धि है । इसे ही ज्ञान भी कहते हैं । यहाँ
व्यवहार का अर्थ शब्दप्रयोग है । चूँकि ज्ञान के बिना शब्दप्रयोग नहीं हो सकता,
इसलिये 'शब्दप्रयोगरूपव्यवहारहेतु गुणत्व' ज्ञान का लक्षण है ।