तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० तर्कसंग्रहः [ प्रत्यक्षपरिच्छेदः
अतीतादिव्यवहारहेतुः कालः । स चैको विभुर्नित्यश्च ।
प्राच्यादिव्यवहारहेतुर्दिङ् । सा चैका नित्या विभ्वी च ।
ज्ञानाधिकरणमात्मा । स द्विविधः । जीवात्मा परमात्मा
चेति । तत्रेश्वरः सर्वज्ञः परमात्मा एक एव । जीवस्तु प्रतिशरीरं
भिन्नो विभुर्नित्यश्च ।
अतीत आदि ( भूत, भविष्यत् और वर्तमान ) व्यवहार का हेतु काल है । वह
भी एक, विभु और नित्य है ।
प्राची आदि ( पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण आदि ) व्यवहार का हेतु दिक् है ।
वह भी एक, विभु और नित्य है ।
ज्ञान का अधिकरण ( आश्रय ) आत्मा है । वह दो प्रकार का होता है—
जीवात्मा और परमात्मा । उनमें परमात्मा ईश्वर ( ऐश्वर्य से युक्त ) है, सर्वज्ञ
( सब कुछ जानने वाला ) है और एक है । किन्तु जीव ( जीवात्मा ) प्रत्येक शरीर
में भिन्न भिन्न है विभु ( कारक ) है और नित्य है ।
न्यायबोधिनी
कालं लक्षयति—अतीतेति । व्यवहारहेतुत्वस्य लक्षणत्वे घट इति
व्यवहारहेतुभूतघटादावतिव्याप्तिः । तद्वारणाय अतीतादीति विशेषणो-
पादानम् ।
दिशो लक्षणमाह—प्राच्येति । उदयाचलसन्निहिता या दिक् सा प्राची ।
अस्ताचलसन्निहिता या दिक् सा प्रतीची । मेरोः सन्निहिता या दिक्
सोदीची । मेरोर्व्यवहिता या दिक् साऽवाची ।
हिन्दी-कला
अतीत अनागत आदि व्यवहार का हेतु काल है । यहाँ यदि व्यवहारहेतुत्वमात्र
काल का लक्षण किया जाय तो 'घटः' इस व्यवहार का हेतु घटविषय में भी
काललक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः इस दोष का वारण करने के लिये
“अतीत आदि” यह व्यवहार का विशेषण कहा गया । काल भी एक, विभु और नित्य
द्रव्य है ।
प्राची प्रतीची ( पूर्व पश्चिम ) आदि व्यवहार का हेतु दिक् (दिशा) है । उदया-
चल ( उदयपर्वत ) से सन्निहित दिशा प्राची है । अस्ताचल से सन्निहित दिशा प्रतीची
है । सुमेरु से सन्निहित दिशा उदीची है और मेरु से व्यवहित दिशा अवाची
(दक्षिण) है ।