तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन्यायबोधिनी-कलासंबलितः ५
तत्र गन्धवती पृथिवी । सा द्विविधा । नित्या अनित्या च ।
नित्या परमाणुरूपा । अनित्या कार्यरूपा । पुनस्त्रिविधा शरीरेन्द्रि-
यविषयभेदात् । शरीरमस्मदादीनाम् । इन्द्रियं गन्धग्राहकं घ्राणम्
नासाग्रवर्ति । विषयो मृत्पाषाणादिः ।
नौ द्रव्यों के अन्तर्गत पृथिवी गन्धवती है । अर्थात् जिसमें गन्ध हो, वह पृथिवी
है । वह दो प्रकार की होती है—नित्य पृथिवी और अनित्य पृथिवी । नित्य पृथिवी
परमाणुरूप है । अनित्य पृथिवी कार्यरूप है । शरीर-इन्द्रिय और विषय के भेद से
कार्यरूप अनित्य पृथिवी फिर तीन प्रकार की होती है । हम लोगों का शरीर अनित्य
पृथिवी का एक भेद है । गन्ध को ग्रहण करने वाला तथा नासिका के अग्रभाग में
रहने वाला घ्राण इन्द्रियरूप पृथिवी है । मिट्टी पाषाण ( पत्थर ) आदि विषय रूप
पृथिवी है ।
न्यायबोधिनी
गन्धवतीति । गन्धवत्त्वं पृथिव्या लक्षणम् । लक्ष्या पृथिवी । पृथिवीत्वं
लक्ष्यतावच्छेदकम् । यद्धर्मावच्छिन्नं लक्ष्यं स धर्मो लक्ष्यतावच्छेदकः ।
यो धर्मो यस्यावच्छेदकः स तद्धर्मावच्छिन्नः । तथा च लक्ष्यतावच्छेदकं
पृथिवीत्वं चेत्—लक्ष्यता पृथिवीत्वावच्छिन्ना । गन्धसमानाधिकरणद्रव्यत्व-
व्याप्यजातिमत्त्वं पृथिव्या लक्षणम् ।
हिन्दी-कला
गन्धवत्त्व पृथिवी का लक्षण है, पृथिवी लक्ष्य है और पृथिवीत्वधर्म पृथिवी
में रहने वाली लक्ष्यता का अवच्छेदक हैं । क्योंकि जिस धर्म से अवच्छिन्न
( युक्त ) लक्ष्य होता है, वह धर्म लक्ष्यता का अवच्छेदक होता है । तथा जो धर्म
जिसका अवच्छेदक होता है, उस धर्म से वह अवच्छिन्न कहाता है । जैसे, पृथिवीवृत्ति
लक्ष्यता का अवच्छेदक पृथिवीत्व है, अतः पृथिवीगत लक्ष्यता पृथिवीत्व धर्म से अव-
च्छिन्न हुई । यहाँ का विशेष विचार संस्कृत-कला व्याख्या में द्रष्टव्य है ।
मूलोक्त गन्धवत्त्वलक्षण अव्याप्तिदोष से ग्रस्त है । क्योंकि उत्पत्तिकालीन घट
में गन्ध नहीं होता है । "उत्पन्नं द्रव्यं क्षणमगुणं निष्क्रियं च तिष्ठति" यह नैयायिकों
की मान्यता है । इसलिये न्यायबोधिनीकार पृथिवी के उक्त लक्षण का परिष्कृत रूप
स्पष्ट करते हैं—
"गन्धसमानाधिकरण-द्रव्यत्व-व्याप्यजातिमत्त्वं पृथिवीत्वम्" यह पृथिवी का
निष्कृष्ट लक्षण है । अर्थात् गन्ध के समान अधिकरण में रहनेवाली (जहाँ गन्ध रहता
है, वहाँ रहनेवाली) द्रव्यत्व की व्याप्या (न्यूनदेशवृत्ति) पृथिवीत्वजाति जिसमें रहे,
वह पृथिवी है । द्रव्यों के अन्तर्गत गन्ध के साथ रहने वाली जाति जिसमें हो, वह
पृथिवी है, यह सारांश है ।