तर्कसंग्रह एवं न्यायबोधिनी (अन्नम्भट्ट - पं. केदारनाथ त्रिपाठी सान्वय सटीक)
Tarkasangraha with Nyayabodhini of Annambhatta by Kedarnath Tripathi
अन्नम्भट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंॐ
तर्कसंग्रहः
सानुवादः
न्यायबोधिनी-कलाद्वयसंवलितः
( हिन्दीव्याख्यासहितपदकृत्योपेतश्च )
प्रत्यक्षपरिच्छेदः
निधाय हृदि विश्वेशं विधाय गुरुवन्दनम् ।
बालानां सुखबोधाय क्रियते तर्कसंग्रहः ॥
हृदय में विश्व के स्वामी परमात्मा को रख कर तथा गुरु की वन्दना कर बालकों
को सुखपूर्वक न्याय-पदार्थों का बोध कराने के लिए तर्कसंग्रहनामक ग्रन्थ की रचना की
जा रही है ।
न्यायबोधिनी
अखिलागमसञ्चारि श्रीकृष्णाख्यं परं महः ।
ध्यात्वा गोवर्धनसुधीस्तनुते न्यायबोधिनीम् ॥
चिकीर्षितस्य ग्रन्थस्य निर्विघ्नपरिसमाप्त्यर्थमिष्टदेवतानमस्कारात्मकं
मङ्गलं शिष्यशिक्षायै ग्रन्थतो निबध्नाति - निधायेति ।
हिन्दी-कला
यस्मिन् ध्याते भवेत् सिद्धिर्गणनाथे गजानने ।
सो ऽनुगृह्णातु नस्तूर्णं बुद्धिराशिर्गुणालयः ॥
समस्त आगमों के प्रतिपाद्यतत्त्व श्रीकृष्णनामक सर्वोत्कृष्ट ( लोकोत्तर ) तेज
का ध्यान कर गोवर्धननामक न्यायशास्त्र के विद्वान् न्यायाभिमत पदार्थों का बोधक
होने के कारण “न्यायबोधिनी” इस यथार्थनामवाली विस्तृत व्याख्या को निर्मित
करते हैं ।
प्रस्तुत व्याख्येय ग्रन्थ तर्कसंग्रह की व्याख्या के प्रारम्भ में मूल ग्रन्थ के
कर्ता श्रीअन्नंभट्टद्वारा किये गये इष्टदेवतानमस्कारात्मक मङ्गल का प्रयोजन
दर्शाते हुए गोवर्धन सुधी कहते हैं कि चिकीर्षित ( निर्माण के लिए अभीष्ट )