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तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

अथाष्टादशमाह्निकम्
अथाभिषेकः
स्वभ्यस्तज्ञानिनं साधकत्वे गुरुत्वे वा अभिषिञ्चेत्—यतः सर्वलक्षण-
हीनोऽपि ज्ञानवानेव साधकत्वे अनुग्रहकरणे च अधिकृतः न अन्यः
अभिषिक्तोऽपि। स्वाधिकारसमर्पणे गुरुः दीक्षादि अकुर्वन् अपि न प्रत्य-
वैति; पूर्वं तु प्रत्यवायेन अधिकारबन्धेन विशेषपददायिना बन्ध एव
अस्य दीक्षाद्यकरणम्, सोऽभिषिक्तो मन्त्रदेवतातादात्म्यसिद्धये षाण्मा-
सिकं प्रत्यहं जपहोमावशेषपूजाचरणेन विद्याव्रतं कुर्यात्, तदनन्तरं
लब्धतन्मयीभावो दीक्षादौ अधिकृतः, तत्र न अयोग्यान् दीक्षेत, न च
योग्यं परिहरेत्, दीक्षितमपि ज्ञानदाने परीक्षेत, अत्र च अभिषेकविभवेन
देवपूजादिकम्।
स्वभ्यस्तज्ञानतया स्वार्थपरार्थाधिकारतां वहतः।
साधकगुरुतायोगस्तत्र हि कार्यस्तदभिषेकः॥
जो परि उण्ण सत्थसं अणु
तस्स अणुग्गहमेतु पवित्ति।
कामणाइ जो पुणुसो साह
उतइ उपा अरुहुरइणहु चित्ति ॥
इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे अभिषेकप्रकाशनं
नाम अष्टादशमाह्निकम् ॥ १८ ॥

अष्टादश आह्निक
अब अभिषेक विधि है१
जिसमें ज्ञान का परिपाक हो चुका है उसे साधक पद में अथवा गुरु के
पद में अभिषिक्त करना चाहिए, क्योंकि सब प्रकार लक्षणों से विहीन होने
पर भी केवल ज्ञानी ही साधक पद में अभिषिक्त होता है और दूसरों पर
अनुग्रह करने का अधिकार रखता है। अभिषिक्त होने पर भी ज्ञानी के
अलावा दूसरा कोई इस प्रकार अधिकार नहीं रखता है। ज्ञानहीन गुरु
अपने अधिकार समर्पण में दीक्षा आदि कृत्य न करने पर भी उसे कोई
प्रत्यवाय नहीं होगा। लेकिन पहले (अभिषिक्त होने के पहले) विद्येश्वर
के पद प्रदान करने वाले अधिकार रूपी बन्धन रहने के कारण दीक्षा
प्रदान न करना उसके लिए अपराध था।२ अब अभिषिक्त होने के
१. दीक्षा के अनन्तर अभिषेक विधि का संक्षिप्त वर्णन इस आह्निक में प्रस्तुत
किया गया है। लेकिन अभिषिक्त करने के पहले किसे अभिषिक्त करना
चाहिए आचार्य के मन में यह विचार उठता है। यह याद रखना आवश्यक
है कि जिसे सबीज दीक्षा प्राप्त हुआ है वही आचार्य पद में अभिषिक्त होने
की योग्यता रखता है लेकिन सभी सबीज दीक्षा प्राप्त किये हुए मनुष्य
अभिषेक प्राप्त नहीं कर सकते हैं। गुरु के द्वारा उनकी परीक्षा होना
आवश्यक है। श्रुत, चिन्ता और भावना से जिस दीक्षित शिष्य में ज्ञान का
परिपाक हो चुका है अभिषेक उसी को मिलता है। और भी बात है,
जिसने समयी दीक्षा से दीक्षित होकर अभिषेक भी प्राप्त कर लिया है
उसमें कुछ कमी होने के कारण वह देशिक अर्थात् आचार्य नहीं बन
सकता है। ये कमियाँ निम्न प्रकार हैं—अध्वसन्धान विधि को न जानना,
जो दो प्रकार हैं—एक आन्तर, दूसरा बाह्य। इसलिए सब प्रकार लक्षण
से हीन होने पर भी ज्ञानवान गुरु ही श्रेष्ठ है। वह पदवाक्य प्रमाण के
ज्ञाता, शिवभक्त, अशेष शैवशास्त्रों के मर्मज्ञ और करुणाशील है। इसके
विपरीत जो अभक्त है और स्वयं अपने को शिव के द्वारा अधिष्ठित मानता
है वह दीक्षा आदि देने का अधिकार नहीं रखता है।
२. इस सिद्धान्त के अनुसार जो सब तत्त्वों का यथार्थरूप से जानते हैं वे
शिवस्वरूप हैं और मन्त्र के वीर्य का वास्तविक प्रकाश करने वाले हैं।

आ. १८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १७३
अनन्तर मन्त्र और देवता की तदात्मता की सिद्धि के लिए छः महीने तक
प्रतिदिन जप, हवन और विशेषपूजा रूपी विद्याव्रत का अनुष्ठान उसे
करना चाहिए ।'
इसके अनन्तर मन्त्र और देवता सम्बन्धी तन्मयीभाव सम्पन्न हो
जाने पर उसे दीक्षा आदि कृत्यों में अधिकार आता है । इस दीक्षा कार्य में
अयोग्य मनुष्य को दीक्षा न देनी चाहिए । न तो योग्य व्यक्ति का परिहार
करना चाहिए । जो दीक्षित है उसे ज्ञान प्रदान करते समय उसकी परीक्षा
होनी चाहिए । जिसने गुप्त रूप से ज्ञान प्राप्त कर लिया है उसके विषय में
गुरु को वैसा जानकर उसकी उपेक्षा करनी चाहिए । इस अभिषेक के कार्य
में जिसकी जैसी शक्ति है देवता का पूजन भी उसी प्रकार होना चाहिए ।
ज्ञान का अभ्यास जिसमें हो चुका है और अपने और दूसरों में ज्ञान
के संक्रमण करने के अधिकार रखने वाले साधक ही गुरु होने की योग्यता
प्राप्त करता है इसलिए ऐसे पुरुष का ही अभिषेक होना चाहिए ।
इति श्री अभिनवगुप्त के द्वारा रचित तन्तसार के अभिषेक
प्रकाशन नाम का अठारह आह्निक है ।
ऐसे मनुष्य जगत् में दुर्लभ हैं। उनके दर्शन स्पर्शन, उनसे आलापन,
उनकी कृपादृष्टि दूसरों पर पड़ने से मनुष्य निष्पाप हो जाते हैं। उनसे
दीक्षा मिलने पर मनुष्य परमपद प्राप्त करते हैं।
गुरु जो कर्मी है, ज्ञानी नहीं अगर वह अपने अधिकार समर्पित करने
के बाद दीक्षा आदि कार्यों से विरत रहते हैं तो उसे किसी प्रकार अपराध
का दोष नहीं लगता है। लेकिन अभिषिक्त होने के पहले उसे अधिकार रूप
बन्धन था। क्यों कि भोग जैसा बन्धन है अधिकार भी उसी प्रकार बन्धन
है। गुरु दीक्षा के द्वारा शिष्य को विद्येश्वर पद में पहुँचाते हैं, यह उनका
अधिकार है अगर वे दीक्षा आदि कार्यों से विरत रहते हैं तो अधिकार
भंग रूप अपराध उसे लगता है ।
१. जिन्होंने अभिषेक प्राप्त कर लिया है वे दो वर्गों में बाँटे जाते हैं—एक
आचार्य है, और दूसरा साधक है । आचार्य दीक्षा आदि कार्यों में
अधिकार रखते हैं लेकिन साधक सिद्धि की कामना रखते हैं।
इसलिए दोनों को अभिषेक प्राप्त होने पर भी अधिकार की भिन्नता है ।

अथैकोनविंशमाह्निकम्
अथ अधरशासनस्थानां गुर्वन्तानामपि मरणसमनन्तरं मृतोद्धारो-
दितशक्तिपातयोगादेव अन्त्यसंस्काराख्यां दीक्षां कुर्यात्, ऊर्ध्वशासनस्था-
नामपि लुप्तसमयानाम् अकृतप्रायश्चित्तानाम्—इति परमेश्वराज्ञा । तत्र
यो मृतोद्धारे विधिः उक्तः स सर्व एव शरीरे कर्तव्यः, पूर्णाहुत्या शव-
शरीरदाहः, मूढानां तु प्रतीतिरूढये सप्रत्ययामन्त्येष्टिं क्रियाज्ञानयोग-
बलात् कुर्यात्, तत्र शवशरीरे संहारक्रमेण मन्त्रान् न्यस्य जालक्रमेण
आकृष्य रोधनवेधनघट्टनादि कुर्यात्—प्राणसंचारक्रमेण हृदि कण्ठे ललाटे
च इत्येवं शवशरीरं कम्पते । ततः परमशिवे योजनिकां कृत्वा तत् दहेत्
पूर्णाहुत्या, अन्त्येष्ट्या शुद्धानाम् अन्येषामपि वा श्राद्धदीक्षां त्र्यहं तुर्ये
दिने मासि मासि संवत्सरे संवत्सरे कुर्यात् । तत्र होमान्तं विधिं कृत्वा
नैवेद्यमेकहस्ते कृत्वा तदीयां वीर्यरूपां शक्तिं भोग्याकारां पशुगतभोग्य-
शक्तितादात्म्यप्रतिपन्नां ध्यात्वा परमेश्वरे भोक्तरि अर्पयेत्, इत्येवं भोग्य-
भावे निवृत्ते पतिरेव भवति, अन्त्येष्टिमृतोद्धरणश्राद्धदीक्षाणाम् अन्यतमे-
नापि यद्यपि कृतार्थता तथापि बुभुक्षोः क्रियाभूयस्त्वं फलभूयस्त्वाय
इति सर्वमाचरेत् । मुमुक्षोरपि तन्मयीभावसिद्धये अयम् जीवतः प्रत्यहम्
अनुष्ठानाभ्यासवत् । तत्त्वज्ञानिनस्तु न कोऽप्ययम् अन्त्येष्ट्यादिश्राद्धान्तो
विधिः उपयोगी—तन्मरणं तद्विद्यासंतानानिनां पर्वदिनं संविदंशपूरणात्,
तावतः संतानस्य एकसंवित्मात्रपरमार्थत्वात् जीवतो ज्ञानलाभसंतान-
दिवसवत् । सर्वत्र च अत्र श्राद्धादिविधौ मूर्तियागः प्रधानम् इति
श्राद्धादिविधौ मूर्तियागः प्रधानम् इति श्रीसिद्धामतम्' तद्विधिश्च वक्ष्यते
नैमित्तिकप्रकाशने ।
अनुग्रहपरः शिवो वशितयानुगृह्णाति यं
स एव परमेश्वरीभवति नाम किं वाऽद्भुतम् ।
उपायपरिकल्पना ननु तदीशनामात्मकं
विदन्निति न शङ्कते परिमितेप्युपाये बुधः ॥

आ. १९ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १७५
एहु सरीरु सअलु अह भवसरु
इच्छामित्तणजेण विचित्ति उ ।
सोश्चिअ सोक्खदेयि परमेसरु
इअजानन्त उरूढिपदितो उ ॥
इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे श्राद्धदीक्षाप्रकाशनं
नाम एकोनविंशमाह्निकम् ॥ १९ ॥

उन्नीसवाँ आह्निक
निम्नकोटि के शास्त्र के अनुसार में स्थित १ गुरु तक सभी मनुष्यों की
मृत्यु के अनन्तर उनपर शक्तिपात हो जाने के कारण ही आचार्य को मृत
मनुष्य के लिए कथित दीक्षा विधि के अनुसार अन्त्येष्टि दीक्षा करनी
चाहिए। केवल इतना ही नहीं जो लोग ऊर्ध्वशासन अर्थात् शिवाद्धय
शासन में स्थित हैं लेकिन आचारभ्रष्ट हो गये हैं और प्रायश्चित्त न कर
मर गये हैं ऐसे लोगों के लिए भी यह अन्त्येष्टिदीक्षा का अनुष्ठान करना
चाहिए। यह परमेश्वर की आज्ञा है। इस विषय में यह ज्ञातव्य है कि
मृत मनुष्य के उद्धार के लिए जो विधि का उल्लेख हुआ है वे सभी
शवशरीर में करणीय है। शरीर का दाहसंस्कार पूर्णाहुति से करना
चाहिए। जो लोग अज्ञ हैं उनमें विश्वास दिलाने के लिए सप्रत्ययात्मिका
अन्त्येष्टि२ क्रिया, ज्ञान और योगबल से करनी चाहिए।
१. इस सिद्धान्त के अनुसार वैष्णवादि शास्त्रों के अनुगामी सभी लोग निम्न-
कोटि के अनुशासन के अन्तर्गत हैं। मृत्यु के अनन्तर अगर उनमें शक्तिपात
हुआ हो तो आचार्य उनके दाहसंस्कार के समय अन्त्येष्टिदीक्षा प्रदान
करते हैं। इस प्रकार दीक्षा केवल उन्हीं को नहीं अपितु जो लोग अद्वय
शिवमार्ग में स्थित हैं लेकिन किसी कारण वश आचारभ्रष्ट हो गये हैं
उनके लिए भी इस प्रकार दीक्षाविधि प्रचलित थी।
२. शवशरीर में उन सब क्रियाओं का अनुष्ठान आवश्यक हैं मृतोद्धार के लिए
कुश या गोबर से बनी मूर्ति में उनका अनुष्ठान किया जाता है। जो लोग
इस प्रकार अनुष्ठान में विश्वास नहीं रखते हैं उन्हें विश्वास दिलाने के
लिए आचार्य क्रिया, ज्ञान और योग बल से अर्थात् उस जीव को महाजाल
प्रयोग के द्वारा आकर्षित करते हुए आचार्य अपने हृदय में उसे स्थापित
कर दें। इसके अनन्तर कुछ प्रक्रियाओं से उसकी सत्ता से अपनी सत्ता की
अभिन्नता लावे इसके बाद मध्यममार्ग से ब्रह्मरंध्र तक पहुँचकर स्वाभाविक
स्पन्द को प्राप्त करें, जीव की सोलह कलाओं पर अपना अधिकार स्थापित
कर उसको अपने के साथ अभिन्न बनावे। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप शव
का शरीर काँपने लगता है या उसका बाया हाथ ऊपर उठ जाता है।

आ. १९ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १७७
उस शवशरीर में संहार क्रम से मन्त्रों के न्यास¹के अनन्तर महाजाल
प्रयोग से उसकी जीवात्मा के आकर्षण के बाद रोधन, वेधन, घट्टन आदि
कार्यों को करना चाहिए।² प्राण संचार क्रम से उस शरीर के हृदय,
कण्ठ और ललाट में प्रवेश करने पर शव का शरीर काँपने लगता है।
इसके अनन्तर उस जीव का योजन परमशिव में होना चाहिए। इसके
बाद पूर्णाहुति के रूप में उस शरीर का दाहसंस्कार करना चाहिए।
अन्त्येष्टि संस्कार के द्वारा जिनकी शुद्धि हुई है या जिनकी शुद्धि नहीं
हुई है उनकी श्राद्धदीक्षा तीसरे दिन या चौथे दिन या हर महीने या हर
वर्ष करना चाहिए।
इसके बाद होम तक कार्यों को समाप्त कर एक हाथ में नैवेद्य
रखकर परमेश्वर के वीर्यरूपी शक्ति ने ही भोग्य वस्तुओं के आकार
धारण कर लिए है और पशुजीवों के भोग्य शक्ति के साथ तदात्मता को
प्राप्त कर लिया है इस प्रकार भावना के साथ उस वस्तु को परमेश्वर
रूपी भोक्ता को अर्पित कर देना चाहिए।³
इस उपाय से पशुजीव की भोग्यरूपता की निवृत्ति होती है और
जीव पतिभाव को प्राप्त करता है। अन्त्येष्टि, मृतोद्धरण और श्राद्धदीक्षा
आदि उपायों से किसी एक के द्वारा यद्यपि कृतार्थता अर्थात् कार्य की
सिद्धि होती है तो भी जो भोग का अभिलाषी है उसके लिए क्रिया को
बहुलता है उससे फल की प्राप्ति अधिक होती है—इसलिए सब कृत्यों का
१. मन्त्रों का न्यास संहार क्रम से करना चाहिए अर्थात् मन्त्र में जो वर्ण
अन्तिम हैं उसका पहले और जो आदि वर्ण है उसका अन्त में न्यास करना
चाहिए।
२. रोधन बिन्दु से, वेधन शक्ति बीज से, घट्टन त्रिशूल बीज से और ताड़न
विसर्ग से सम्पन्न होता है।
३. नैवेद्य जो अन्नरूप है गुरु को उसे शक्तिरूप में चिन्तन करना चाहिए। उसी
शक्ति के द्वारा साध्य समाशिष्ट है। उस अन्न में जो पशु सम्बन्धी अंश है
वही उसका भोग्य रूप है। उस भोग्य वस्तु का भोक्ता स्वयं परमेश्वर हैं,
उसे अर्पित कर देने पर शिष्य के सभी भोगों का अवसान हो जाता है
और उसे शिवभाव प्राप्त होता है।
१२

१७८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १९
अनुष्ठान आवश्यक है। जो लोग मुक्ति का इच्छुक है वह भी परमेश्वर के
साथ तदात्मता की सिद्धि के लिए अपने जोवनकाल में प्रतिदिन इनका
अनुष्ठान अभ्यस्त क्रिया के समान करें।
जो लोग तत्त्वज्ञानी हैं उनके लिए अन्त्येष्टि से लेकर श्राद्ध तक इन
विधियों का कोई उपयोग नहीं है। उनका प्रयाण का दिन उनसे जिन
लोगों ने विद्या प्राप्त की है उन विद्यासन्तानों का पर्वदिन है। १ क्योंकि
पर्वदिन ही संविद् रूप अंश को पूर्ण करता है। सभी सन्तानों का संवित्,
ही एकमात्र परमार्थ है इसलिए जीवित अवस्था में ज्ञानलाभरूपी सन्तान
प्राप्ति का दिन जैसे एक पर्वदिन है।
इस श्राद्ध आदि विधि में मूर्तियाग ही मुख्य है—श्री सिद्धा तन्त्र का
यही सिद्धान्त है। मूर्तियाग की विधि नैमित्तिक प्रकाशन नामक अंश में
बतलायेंगे।
शिव अनुग्रह परायण हैं। वे अनुग्रह से विवश होकर जिसे अनुग्रह
करते हैं वही परमेश्वर स्वरूप को प्राप्त करता है—यह कितना अद्भुत
है। उन परमेश्वर की इच्छा से ही उपायों की कल्पना हुई है, ऐसा
जानकर ज्ञानी मनुष्य परिमित उपायों को ग्रहण करते हुए भी किसी
प्रकार शंका का अनुभव नहीं करते हैं।
इति श्री अभिनवगुप्त द्वारा रचित तन्त्रसार के श्राद्धदीक्षा
प्रकाशन नाम का उन्नीसवाँ अध्याय है।
१. गुरु का तिरोधान दिवस विशेष पर्व का दिन है क्योंकि उसी दिन परमेश्वर
के साथ उनका सायुज्य प्राप्त हुआ था। उस पर्वदिन में उनसे दीक्षाप्राप्त
सभी, उनकी पत्नी, पुत्र आदि उनके सायुज्य के स्मरण से और पर्वदिन में
विहित अनुष्ठान से बोध की पूर्णता प्राप्त करते हैं। जैसे तिरोधान का दिन
पर्व के दिन के रूप में माना जाता है वैसा ही उनका जन्मदिवस भी उनकी
शिष्य आदि सन्तानों के लिए पर्व का दिन है।

अथ विंशमाह्निकम्
अथ शेषवर्तनार्थं प्रकरणान्तरम्
तत्र या दीक्षा संस्कारसिद्धौ ज्ञानयोग्यान् प्रति, या च तदशक्तान्
प्रति मोक्षदीक्षा सबीजा, तस्यां कृतायाम् आजीवनं शेषवर्तनं गुरुः उप-
दिशेत्। तत्र नित्यं, नैमित्तिकं, काम्यम् इति त्रिविधं शेषवर्तनम्, अन्त्यं
च साधकस्यैव, तत् न इह निश्चेतव्यम् । तत्र नियतभवं नित्यं, तन्मयी-
भाव एव नैमित्तिकं, तदुपयोगि सन्ध्योपासनं प्रत्यहमनुष्ठानं, पर्वदिनं,
पवित्रकम् इत्यादि। तदपि नित्यं स्वकालनैयत्यात्—इति केचित् ।
नैमित्तिकं तु तच्छासनस्थानामपि अनियतम्, तद्यथा—गुरुतद्वर्गगमनं
तत्पर्वदिनं ज्ञानलाभदिनम् इत्यादिकम्—इति केचित् । तत्र नियतपूजा,
सन्ध्योपासा, गुरुपूजा, पर्वपूजा पवित्रकम् इति अवश्यंभावि । नैमित्ति-
कम्—ज्ञानलाभः, शास्त्रलाभो, गुरुतद्वर्गगृहागमनं, तदीयजन्मसंस्कार-
प्रायणदिनानि, लौकिकोत्सवः, शास्त्रव्याख्या आदिमध्यान्ता, देवता-
दर्शनं, मेलकः, स्वप्नाज्ञा, समयनिष्कृतिलाभः—इत्येतत् नैमित्तिकं
विशेषार्चनकारणम् । तत्र कृतदीक्षाकस्य शिष्यस्य प्रधानं मन्त्रं सवीर्यकं
संवित्तिस्फुरणसारम् अलिखितं वक्रागमेनैव अर्पयेत्, ततः तन्मयीभाव-
सिद्धयर्थं स शिष्यः संध्यासु तन्मयीभावाभ्यासं कुर्यात्, तद्द्वारेण सर्व-
कालं तथाविधसंस्कारलाभसिद्धयर्थं प्रत्यहं च परमेश्वरं च स्थण्डिले
वा लिङ्गे वा अभ्यर्चयेत् । तत्र हृद्ये स्थण्डिले विमलमकुरवद्ख्याते स्वमेव
रूपं याज्यदेवताचक्राभिन्नं मूर्तिबिम्बितमिव दृष्ट्वा हृद्यपुष्पगन्धासबत-
र्पणनैवेद्यधूपदीपोपहारस्तुतिगीतवाद्यनृत्तादिना पूजयेत्, जपेत्, स्तुवीत—
तन्मयीभावमशङ्कितं लब्धुम् । आदर्शे हि स्वमुखम् अविरतम् अवलोक-
यतः तत्स्वरूपनिश्चितिः अचिरेणैव भवेत्, न चात्र कश्चित् क्रमः प्रधानम्—
ऋते तन्मयीभावात् । परमन्त्रतन्मयीभावाविष्टस्य निवृत्तपशुवासनाक-
लङ्कस्य भक्तिरसानुवेधविद्रुतसमस्तपाशजालस्य यत् अधिवसति हृदयं
तदेव परममुपादेयम्, इति अस्मद्गुरवः ।
अधिशय्य पारमार्थिक भावप्रसरं प्रकाशमुल्लसति या ।
परमामृतदृक्त्वा तयार्च्यन्ते रहस्यविदः ॥

१८० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २०
कृत्वाधारधरां चमत्कृतिरसप्रोक्षाक्षणक्षालितां
मत्तैर्मानसतः स्वभावकुसुमैः स्वामोदसंदोहिभिः ।
आनन्दामृतनिर्भरस्वहृदयानर्घार्घपात्रक्रमात्
त्वां देव्या सह देहदेवसदने देवार्चयेऽहर्निशम् ॥
इति श्लोकद्वयोक्तमर्थम् अन्तर्भावयन् देवताचक्रं भावयेत् । ततो मुद्रा-
प्रदर्शनं, जपः, तन्निवेदनम् । बोधैकात्म्येन विसर्जनम् । मुख्यं नैवेद्यं
स्वयम् अश्नीयात्, सर्वं वा जले क्षिपेत्, जलजा हि प्राणिनः पूर्वदीक्षिताः
चरुभोजनद्वारेण इति आगमविदः । मार्जारमूषकश्वादिभक्षणे तु शङ्का
जनिता निर्याय—इति ज्ञानो अपि लोकानुग्रहेच्छया न तादृक् कुर्यात्,
लोकं वा परित्यज्य आसीत, इति स्थण्डिलयागः । अथ लिङ्गे, तत्र न
रहस्यमन्त्रैः लिङ्गं प्रतिष्ठापयेत्, विशेषात् व्यक्तम्—इति पूर्वप्रतिष्ठितेषु
आवाहनविसर्जनक्रमेण पूजां कुर्यात् आधारतया । तत्र गुरुदेहं स्वदेहं
शक्तिदेहं रहस्यशास्त्रपुस्तकं वीरपात्रं अक्षसूत्रं प्राहरणं बाणोत्थं मौक्तिकं
सौवर्णं पुष्पगन्धद्रव्याविहृद्यवस्तुकृतं भकुरं वा लिङ्गम् अर्चयेत् । तत्र च
आधारबलादेव अधिकाधिकमन्त्रसिद्धिः भवति इति पूर्वं पूर्वं प्रधानम्
आधारगुणानुविधायित्वात् च मन्त्राणां तत्र तत्र साध्ये तत्तत्प्रधानम्
इति शास्त्रगुरवः । सर्वत्र परमेश्वराभेदाभिमान एव परम्ः संस्कारः ।
अथ पर्वविधिः
तत्र सामान्यं, सामान्यसामान्यं, सामान्यविशेषो, विशेषसामान्यं,
विशेषो, विशेषविशेषश्च इति षोढा पर्व—पूरणात् विधेः । तत्र मासि
मासि प्रथमं पञ्चमं दिनं सामान्यम्, चतुर्थाष्टमनवमचतुर्दशपञ्चदशानि
द्वयोरपि पक्षयोः सामान्यसामान्यम्, अनयोरुभयोरपि राश्योः वक्ष्यमाण-
तत्तत्तिथ्युचितग्रहनक्षत्रयोगे सामान्यविशेषः, मार्गशीर्षस्य प्रथमरात्रि-
भागः कृष्णनवम्याम्, पौषस्य तु रात्रिमध्ये कृष्णनवम्याम्, माघस्य
रात्रिमध्यं शुक्लपञ्चदश्याम्, चैत्रस्य शुक्लत्रयोदश्याम्, वैशाखस्य
कृष्णाष्टम्याम्, ज्यैष्ठस्य कृष्णनवम्याम्, आषाढस्य प्रथमे दिने, श्रावणस्य
दिवसपूर्वभागः कृष्णैकादश्याम्, भाद्रपदस्य दिनमध्यं शुक्लषष्ठ्याम्,
आश्वयुजस्य शुक्लनवमीदिनम्, कार्तिकस्य प्रथमो रात्रिभागः शुक्लनव-
म्याम्—इति विशेषपर्व । चित्राचन्द्रौ, मघाजीवौ, तिष्यचन्द्रौ पूर्वफल्गुनी-
बुधौ, श्रवणबुधौ, शतभिषक्चन्द्रौ, मूलादित्यौ, रोहिणीशुक्रौ, विशाखा-

आ. २० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १८१
बृहस्पति, श्रवणचन्द्रौ इति । यदि मार्गशीर्षादिक्रमेण यथासंख्यं भवति
आश्वयुजं वर्जयित्वा तदा विशेषविशेषः । अन्यविशेषश्चेत् अन्यपर्वणि
तदा तत्—अनुपर्व इत्याहुः । अग्रहयोगे च न वेला प्रधानं—तिथिरेव
विशेषलाभात्, अनुयागकालानुवृत्तिस्तु पर्वदिने मुख्या—अनुयागप्राधा-
न्यात् पर्वयागानाम्, अनुयागो मूतियागः चक्रयागः इति पर्यायाः । तत्र
गुरुः तद्भार्यः ससन्तानः, तत्त्ववित्, कन्या, अन्त्या, वेश्या, अरुणा, तत्त्व-
वेदिनी वा इति चक्रयागे मुख्यपूज्याः—विशेषात् सामस्त्येन । तत्र मध्ये
गुरुः तदावरणक्रमेण गुर्वादिसमध्यन्तं वीरः शक्तिः इति, क्रमेण—इत्येवं
चक्रस्थित्या वा पंक्तिस्थित्या वा आसीत ततो गन्धधूपपुष्पादिभिः क्रमेण
पूजयेत्, ततः पात्रं सदाशिवरूपं ध्यात्वा शक्त्यमृतध्यातेन आसवेन पूर-
यित्वा तत्र भोक्त्रीं शक्तिं शिवतया पूजयित्वा तयैव देवताचक्रतर्पणं कृत्वा
नरशक्तिशिवात्मकत्रितयमेलनं ध्यात्वा आवरणावतरणक्रमेण मोक्षभोग-
प्राधान्यं बहिरन्तश्च तर्पणं कुर्यात्, पुनः प्रतिसंचरणक्रमेण, एवं पूर्णं
भ्रमणं चक्रं पुष्णाति । तत्र आधारे विश्वमयं पात्रं स्थापयित्वा देवता-
चक्रं तर्पयित्वा स्वात्मानं वन्दितेन तेन तर्पयेत्, पात्राभावे भद्रं वेल्लित-
शुक्तिः वा, दक्षहस्तेन पात्राकारं भद्रं, द्वाभ्यामुपरिगतदक्षिणाभ्यां निः-
सन्धीकृताभ्यां वेल्लितशुक्तिः, पतद्भिः बिन्दुभिः वेतालगुह्यकाः संतुष्यन्ति
धारया भैरवः, अत्र प्रवेशो न कस्यचित् देयः, प्रमादात् प्रविष्टस्य विचारं
न कुर्यात्, कृत्वा पुनर्द्विगुणं चक्रयागं कुर्यात्, ततोऽवदंशान् भोजनादीन्
च अग्रे यथेष्टं विकीर्येत, गुप्तगृहे वा संकेताभिधानवजं देताशब्देन सर्वान्
योजयेत्—इति वीरसंकरयागः । ततोऽन्ते दक्षिणाताम्बूलवस्त्रादिभिः
तर्पयेत्—इति प्रधानतमोऽयं मूर्तियागः । अदृष्टमण्डलोऽपि मूर्तियागेन
पर्वदिनानि पूजयन् वर्षादेव पुत्रकोक्तं फलमेति, बिना सन्ध्यानुष्ठानादिभिः
—इति वृद्धानां भोगिनां स्त्रीणां विधिरयम्, शक्तिपाते सति उपदेष्टव्यो
गुरुणा ।
अथ पवित्रकविधिः । स च श्रीरत्नमालात्रिशिरोमतश्रीसिद्धामतादौ
विधिपूर्वकः पारमेश्वराज्ञापूरकश्च, उक्तं चैतत् श्रीतन्त्रालोके
बिना पवित्रकेण सर्वं निष्फलम् ।
इति । तत्र आषाढशुक्लात् कुलपूर्णिमादिनान्तं कार्यं पवित्रकम्, तत्र
कार्तिककृष्णपञ्चदशी कुलचक्रं नित्याचक्रं पूरयति इति श्रीनित्यातन्त्र-
विदः । माघशुक्लपञ्चदशी इति श्रीभैरवकुलोमिविदः दक्षिणायनान्त-

१८२ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २०
पञ्चदशी इति श्रीतन्त्रसद्भावविदः । तत्र विभवेन देवं पूजयित्वा आहुत्या
तर्पयित्वा पवित्रकं दद्यात्, सौवर्णमुक्तारत्नविरचितात् प्रभृति पटसूत्र-
कार्पासकुशगर्भान्तिमपि कुर्यात् । तत्त्वसंख्यग्रन्थिकं पदकलाभुवनवर्णमन्त्र-
संख्यग्रन्थि च जान्वन्तमेकं, नाभ्यन्तमपरं, कण्ठान्तमन्यत्, शिरसि
अन्यत्—इति चत्वारि पवित्रकाणि देवाय गुरवे च समस्ताध्वपरिपूर्ण-
तद्रूपभावनेन दद्यात्, शेषेभ्य एकम् इति । ततो महोत्सवः कार्यः,
चातुर्मास्यं सप्तदिनं त्रिदिनं च इति मुख्यान्वापत्कल्पाः, सति विभवे
मासि मासि पवित्रकम्, अथ वा चतुर्षु मासेषु, अथ वा सकृत्, तदकरणे
प्रायश्चित्तं जपेत्, ज्ञानी अपि संभवद्वित्तोऽपि अकरणे प्रत्यवैति लोभो-
पहितज्ञानाकरणे ज्ञाननिन्दापत्तेः ।
यदा प्राप्यापि विज्ञानं दूषितं परमेशशासनं
तदा प्रायश्चिती ।
इति वचनात् ।
इत्येष पवित्रकविधिः
ज्ञानलाभादौ लौकिकोत्सवान्तेऽति सर्वत्र संविदुल्लासाधिक्यं देवता-
चक्रसंनिधिः विशेषतो भवति, इति तथाविधाधिक्यपर्यालोचनया तथा-
विधमेव विशेषमनुमागादौ कुर्यात् ।
अथ व्याख्याविधिः
सर्वशास्त्रसंपूर्णं गुरुं व्याख्यार्थम् अभ्यर्थयेत, सोऽपि स्वशिष्याय
परशिष्यायापि वा समुचितसंस्कारोचितं शास्त्रं व्याचक्षीत, अधरशासन-
स्थायापि करुणावशात् ईश्वरेच्छावैचित्र्योद्भावितशक्तिपातसंभावना-
भावितहृदयो व्याचक्षीत—मर्मोपदेशवर्जम् । तत्र निम्नासनस्थितेभ्यः
तत्परेभ्यो नियमितवाङ्मनःकायेभ्यो व्याख्या क्रियमाणा फलवती भवति,
प्रथमं गन्धादिलिप्तायां भुवि उल्लिख्य संकल्प्य वा पद्माधारं चतुरश्रं
पद्ममध्ये वागीशीं वामदक्षिणयोः गणपतिगुरू च पूजयेत्, आधारपद्मे
व्याख्येयकल्पदेवताम् । ततः सामान्यार्घपात्रयोगेन चक्रं तर्पयेत्, ततो
व्याचक्षीत सूत्रवाक्यपटलग्रन्थम्, पूर्वापराविरुद्धं कुर्वन् तन्त्रावृत्तिप्रसङ्ग-
समुच्चयविकल्पादिशास्त्रन्यायौचित्येन पूर्वं पक्षं सम्यक् घटयित्वा सम्यक्
च दूषयन् साध्यं साधयन् तात्पर्यवृत्तिं प्रदर्शयन् पटलान्तं व्याचक्षीत

आ. २० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १८३
नाधिकम्, तत्रापि वस्त्वन्ते वस्त्वन्ते तर्पणं पूजनम् इति यावद्व्याख्या-
समाप्तिः । ततोऽपि पूजयित्वा विद्यापीठं विसर्ज्य उपलिप्य अगाधे तत्
क्षेपयेत् ।
इति व्याख्याविधिः
अथ समयनिष्कृतिः
यद्यपि तत्त्वज्ञाननिष्ठस्य प्रायश्चित्तादि न किंचित् तथापि चर्यामात्रा-
देव मोक्षभागिनः, तान् अनुग्रहीतुम् आचारवर्त्तनीं दर्शयेत् । अतत्त्वज्ञानो
तु चर्यैकायत्तभोगमोक्षः समयोल्लङ्घने कृते प्रायश्चित्तम् अकुर्वन् वर्षशतं
क्रव्यादो भवतीति—इति प्रायश्चित्तविधिः वक्तव्यः, तत्र स्त्रीवधे
प्रायश्चित्तं नास्ति, अन्यत्र तु बलाबलं ज्ञात्वा अखण्डां भगवतीं मालिनीं
एकावारात् प्रभृति त्रिलक्षान्तम् आवर्तयेत् यावत् शङ्काविच्युतिः भवति
तदन्ते विशेषपूजा, तत्रापि चक्रयागः, स हि सर्वत्र शेषभूतः ।
इति समयनिष्कृतिविधिः
अथ गुरुपूजाविधिः
सर्वयागान्तेषु उपसंहृते यागे अपरेद्युः गुरुपूजां कुर्यात्, पूर्वं हि स
विध्यङ्गतया तोषितो न तु प्राधान्येन, इति तां प्राधान्येन अकुर्वन्
अधिकारबन्धेन बद्धो भवति—इति तां सर्वथा चरेत् । तत्र स्वास्तिकं
मण्डलं कृत्वा तत्र सौवर्णं पीठं दत्त्वा तत्र समस्तमध्वानं पूजयित्वा
तत्पीठं तेन अधिष्ठाप्य तस्मै पूजां कृत्वा तर्पणं भोजनं दक्षिणाम्
आत्मानम् इति निवेद्य नैवेद्योच्छिष्टं प्रार्थ्य वन्दित्वा स्वयं प्राश्य चक्र-
पूजां कुर्यात् ।
इति गुरुपूजाविधिः
नित्यं नैमित्तिकं कर्म कुर्वञ्शाठ्यविवर्जितः ।
विनापि ज्ञानयोगाभ्यां चर्यामात्रेण मुच्यते ॥
सिवणाहू सच्छन्दु तत्त्वकोणविअप्प इच्छ ।
चरि आमित्तिणजिणजण हुकिअ भवरोअ चिइच्छ ॥
इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे शेषवर्तनप्रकाशनं
नाम विंशमाह्निकम् ॥२०॥

बीसवाँ आह्निक
अब शेषवृत्ति के उपदेश के लिए दूसरा प्रकरण का आरम्भ किया
जाता है।
ज्ञानप्राप्ति की योग्यता जिनमें वर्तमान है, संस्कार की सिद्धि के लिए
उन्हें जो दीक्षा दी जाती है और ज्ञान की योग्यता जिनमें नहीं है उन्हें
जो सबीज मोक्षदीक्षा दी जाती है इन दोनों प्रकार दीक्षा सम्पन्न हो जाने
पर उनके जीवन काल तक पालनीय शेषवृत्ति का उपदेश गुरु अवश्य
करें।
शेषवृत्ति नित्य, नैमित्तिक और काम्य आदि के भेद से तीन प्रकार
हैं। काम्य शेषवर्तन केवल साधक के लिए है, इसलिए यहाँ उसका
विवेचन नहीं हुआ है।
उनमें जो नित्य है वह नियतभव है, जिनसे परमेश्वर के साथ
तन्मयता उत्पन्न होती हैं वे नैमित्तिक कृत्य हैं। इसके उपयोगी
सन्ध्योपासना आदि का अनुष्ठान प्रतिदिन होना चाहिए। पर्वदिन और
पवित्रक आदि भी नित्य है। किसी-किसी का मत में ये भी नित्य हैं
क्योंकि ये अपने काल के द्वारा नियत है। लेकिन नैमित्तिक कृत्य वे हैं जो
उस शास्त्र के अनुशासन में स्थित मनुष्यों के लिए भी नियमपूर्वक नहीं
माने जाते हैं। वे क्रमशः गुरु तथा उनके निजी वर्ग के शिष्य के घर पर
आगमन का दिन है, उनके पर्वदिवस, उनकी दीक्षा का दिन आदि है—
यह किन्हीं किन्हीं का मत है। उसमें नियमपूर्वक पूजा, सन्ध्योपासन,
गुरुपूजा, पर्वपूजा, पवित्रक आदि अवश्य करने वाले कृत्य हैं, लेकिन
ज्ञानलाभ, शास्त्रलाभ, गुरु और उनके वर्गों के शिष्य के घर में आगमन
के दिन, गुरु का जन्म दिवस, उनके संस्कार का दिन और तिरोधान का
दिन, लौकिक उत्सव, शास्त्र व्याख्या के प्रथम, मध्यम तथा अन्तिम
दिन, देवतादर्शन, स्वप्न में आज्ञा प्राप्ति का दिन, मेलक, गुरु से प्राप्त
समय से निष्कृतिलाभ का दिन आदि नैमित्तिक अर्चना करने का हेतु है।
अब इस विषयमें उल्लेख है कि जिसने दीक्षा ग्रहण कर लिया है
ऐसे शिष्य को मुख्यमन्त्र जो वीर्यमय तथा संवित्स्फुरण ही जिसका
सार है उसे न लिखकर मुख से कहकर उसे अर्पित करना चाहिए।

आ. २० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १८५
उसके बाद मन्त्र के साथ तन्मयभाव की सिद्धि के लिए उस शिष्य को
सभी सन्ध्याओं में तन्मयभाव का अभ्यास करना चाहिए । उस उपाय से
उस प्रकार संस्कार की सिद्धि के लिए प्रतिदिन परमेश्वर को स्थण्डिल
या लिंग में अर्चना करना चाहिए ।
मनोहर स्थण्डिल को निर्मल दर्पण के समान ध्यान करते हुए उसमें
अपना रूप जो यजनीय देवताचक्र के साथ अभिन्न हुआ है और उसने
मूर्ति का रूप धारण कर लिया है। इस प्रकार दर्शन करने के बाद
मनोहर पुष्प, गन्ध, आसव, तर्पण, नैवेद्य, धूप, दीप और अन्य उपचार
आदि अर्पित कर स्तुति, गीत, वाद्य और नृत्त आदि के द्वारा पूजन
करना चाहिए । जप और स्तवन करना चाहिए । शंका रहित तन्मयता
की सिद्धि के लिए ये अवश्य करणीय हैं।
मुकुर में अपना मुख के निरन्तर दर्शन करने वाले व्यक्ति को
अपने स्वरूप के विषय में निश्चयात्मक बोध शीघ्र ही उत्पन्न हो जाता है
उसी प्रकार स्तवन पूजन से परमेश्वर सम्बन्धी तन्मयता आती है । इस
विषय में तन्मयभाव के अलावा किसी क्रम की प्रधानता नहीं है । सबसे
उत्कृष्ट ( पर ) मन्त्र में तन्मयभाव में आविष्ट और जिस पशुरूपी जीव
के हृदय से पशुवासना के कलंक के दूर हो गया है और भक्तिरस के
प्लावन से पाश समूह विदूरित हो चुका है ऐसे मनुष्य में जो भाव हृदय
में स्थित रहता है वही परम उपादेय है—यही हमारे गुरुओं का मत है।
पारमार्थिक भावों के विस्ताररूपी-प्रकाश पर आश्रित होकर जो
परमामृतमयी दृक्-शक्ति उल्लसित होती है, रहस्य के ज्ञाता आपका
पूजन आप ही से करते हैं ।
आधार को धरा बनाकर उसे चमत्कार रूप रस के प्रोक्षण से
प्रक्षालित कर मन के द्वारा संगृहीत अपने सुरभि से सुरभित स्व-भाव
पुष्पों के द्वारा आनन्द तथा अमृतमय निज हृदयरूपी बहुमूल्य अर्घपात्र
के द्वारा देवी के साथ तुम्हें देहरूपी देवगृह में देवता को दिन-रात हमें
पूजन करना चाहिए ।
× × ×
उपर्युक्त इन दोनों श्लोकों को हृदय में भावना के साथ देवता
चक्र का पूजन होना चाहिए । उसके बाद मुद्रा का प्रदर्शन, जप, जप

१८६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २०
का निवेदन करना है। अपने बोधमय स्वरूप में देवताचक्र को विसर्जित
करना है। मुख्य नैवेद्य को स्वयं ग्रहण करें या सभी वस्तुओं को जल
में त्याग देना चाहिए। जल में उत्पन्न जीवसमूह चरु के भोजन के द्वारा
आगम के ज्ञाता बन गये हैं।
अगर बिल्ली, मूष और कुत्ते आदि के द्वारा चरु का भोजन हो तो
हृदय में शंका उत्पन्न होने पर ही वह नरक का कारण बनती है।
इसलिए ज्ञानी पुरुष लोकानुग्रह करने की इच्छा से कोई विपरीत कार्य
न करें। अर्थात् स्वयं शङ्कारूप संकोच का त्याग करें। वह लोकसम्पर्क
को छोड़ कर रहें। यह हुआ स्थण्डिल का विवरण ।
इसके अनन्तर लिंग में पूजन होना चाहिए। रहस्यमन्त्रों से लिंग
की स्थापना नहीं करना चाहिए, विशेषरूप से व्यक्त लिङ्ग की। पूर्व
से स्थापित लिङ्ग का पूजन आवाहन, विसर्जन आदि क्रम से करना है
क्यों कि वही आधार है। गुरु का शरीर, निज शरीर, शक्ति का
शरीर, रहस्यशास्त्र की पुस्तकें, वीर पात्र, अक्षसूत्र, प्राहरण, वाण-
लिङ्ग, मोती से बने लिङ्ग, सुवर्णनिर्मित लिङ्ग, पुष्प, गन्धद्रव्यादि,
मनोहर वस्तु से बने मुकुर या लिङ्ग की अर्चना करना चाहिए।
आधार की सुन्दरता के बल से ही मन्त्र की अधिक सिद्धि होती है।
इस क्रम में उत्तर की अपेक्षा पूर्व-पूर्व की प्रधानता है। क्योंकि मन्त्र
समूह आधार के गुणों का ही अनुविधायी हैं। भिन्न-भिन्न वस्तुओं को
साध्य बनाने पर भिन्न-भिन्न वस्तु की प्रधानता होती है—यही शास्त्र-
गुरुओं का निर्देश है। सर्वत्र परमेश्वर सम्बन्धी अभिन्नता का अभिमान
ही उत्कृष्ट संस्कार है।
अब पर्व का विधान है
पर्व सामान्य, सामान्य-सामान्य, सामान्य-विशेष, विशेष-सामान्य,
विशेष, विशेष-विशेष आदि छः प्रकार हैं। इनसे विधि की पूर्ति होती
है। हर महीने के प्रथम और पंचम दिन सामान्य पर्व है। चौथा, आठवाँ,
चौदहवाँ और पन्द्रहवाँ दोनों पक्ष के दिन सामान्य-सामान्य पर्व हैं। इन
दोनों पक्षों के आगे बतलाये जाने वाले भिन्न-भिन्न तिथियों में ग्रह तथा
नक्षत्र के संयोग से सम्बन्धित दिन सामान्य-विशेष नाम का पर्व हैं।
अग्रहायण मास के कृष्ण नवमी के प्रथम रात्रि का भाग, पौष महीने के

आ. २० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १८७
कृष्ण-नवमी का रात्रिमध्य, माघ महीने के शुक्ल पंचदशी की मध्यरात्रि,
फाल्गुन महीने के शुक्ल द्वादशी के दिन का मध्य भाग, चैत्र महीने के
शुक्ल त्रयोदशी, वैशाख की कृष्णाष्टमी, ज्येष्ठ की शुक्लानवमी, आषाढ़
का पहला दिन, श्रावण की कृष्णा एकादशी तिथि के दिन का पहला भाग,
भाद्र को शुक्ला षष्ठी के दिन का मध्य भाग, आश्विन शुक्ला नवमी का
दिन, कार्तिक की शुक्ला नवमी की रात्रि का प्रथम भाग विशेष पर्व के
दिन हैं।
चित्रा नक्षत्र तथा चन्द्र, मघा तथा बृहस्पति, तिष्या तथा चन्द्र,
पूर्वफाल्गुनी तथा बुध, श्रवणा तथा बुध, शतभिषा तथा चन्द्र, मूला
तथा रवि, रोहिणी तथा शुक्र, विशाखा तथा बृहस्पति, श्रवणा तथा
चन्द्र आदि के संयोग से भिन्न भिन्न पर्व के दिन बनते हैं।
यदि अग्रहायण के महीने से आरम्भ होकर यथासंख्य संयोग
उपस्थित हो तो आश्विन के महीने को छोड़कर जो पर्व हैं उसे विशेष-
विशेष पर्व कहते हैं।
अन्य प्रकार विशेष अन्य पर्व में हो तो उसे अनुयाग कहते हैं। भगृह
के योग होने पर बेला की प्रधानता नहीं होती, तिथि ही विशेषता का
सम्पादक है। अनुयागकाल में करणीय कृत्यों की अनुवृत्ति ही पर्व के
दिन में मुख्य कृत्य है। पर्व यागों में अनुयाग को ही प्रधानता है।
मूर्तियाग, चक्रयाग अनुयाग के ही पर्याय हैं।
इस याग में गुरु, सन्तानों के साथ गुरु के अनुयायी, तत्त्वज्ञानी पुरुष,
कन्या, अन्त्या, वेश्या, अरुणा या तत्त्वज्ञा महिला चक्रयाग में मुख्य रूप
से पूजा करने योग्य हैं, विशेष रूप से सामूहिक रूप में पूजन करना
चाहिए। चक्रयाग में गुरु मध्यभाग में और उन्हें घेर कर गुरु से लेकर
समयी तक शिष्य गणों को वीर और शक्ति के क्रम से बैठना चाहिए।
चक्र के आकार में या पंक्ति के क्रम से वे बैठते हैं। इसके अनन्तर गन्ध,
पुष्प धूप आदियों से उनका पूजन होना चाहिए।
इसके बाद पात्र को जो सदाशिव का ही रूप है इस प्रकार चिन्तन
करने के बाद उसे आसव से जो शक्तिरूप अमृतमय है इस प्रकार ध्यान
करते हुए भरना चाहिए। तब उसमें भोक्त्री शक्ति को शिवरूप में पूजन
करने के बाद उस शक्तिरूप आसव से देवताचक्र का तर्पण करना
चाहिए। इसके अनन्तर नरशक्ति शिवात्मक इन तीनों का मेलक उसमें

१८८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २०
हुआ है इस प्रकार चिन्तन करने के बाद आवरणरूपी जो चक्र है उस
का भी तर्पण जो भोग और मोक्ष प्रधान है होना चाहिए, यह तर्पण
बाह्य और आन्तर दोनों हों। पहले गुरु से चक्र के अन्त तक फिर अन्त
से गुरु तक पात्र का भ्रमण होने से चक्र की पूर्णता होती है।
आधार जो विश्वमय है उस पर पात्र को स्थापित कर देवता चक्र
को तर्पित कर उसे पहले स्तवन और नमन के बाद अपने को तर्पित
करना चाहिए। अगर अपने पास पात्र न हो तो भद्र या वेल्लितशुक्ति
से अर्थात् दाहिने हाथ को पात्र का आकार बनाना भद्र, दोनों हाथों में
दाहिने हाथ को बायें के ऊपर बिना कोई छेद को हो तो उसे वेल्लित-
शुक्ति कहते हैं। हाथ से कुछ बूँदें गिरती है तो उनसे बेताल तथा
गुह्यकगण तृप्त होते हैं। आसव की धारा से भैरव की तृप्ति होती है।
इस चक्रयाग में भूल से किसी का प्रवेश हो तो उस व्यक्ति के विषय
में कोई विचार न करना चाहिए। भीतर आने पर फिर से दोबारा
चक्रयाग करना चाहिए। इसके अनन्तर अवदंश और भोज्य वस्तुओं
को काफी मात्रा में सामने रख देना चाहिए। या गुप्तगृह में चक्रयाग में
सम्मिलित सभी के वास्तविक नाम को वर्जित कर देवता शब्द से उनका
अभिधान होना चाहिए। यह हुआ वीरसंकरयाग का विवरण।
अन्त में दक्षिणा, ताम्बूल और वस्त्र आदि से उन सभी को सन्तुष्ट
करना चाहिए। यह मुख्यतम मूर्तियाग है।
अदृष्टमण्डल भी मूर्तियाग के द्वारा पर्वदिन में पूजन करते हुए एक
वर्ष से ही पुत्रक शिष्य जो फल प्राप्त करता उसे प्राप्त करता है—इसे
प्राप्त करने में सन्ध्या आदि के अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं है। यह
वृद्ध, भोगी, स्त्री आदि के उपयोगी विधि है—इस विधि का उपदेश
शक्तिपात होने पर गुरु के द्वारा होना चाहिए।
अब पवित्रक विधि का विवरण है
यह श्रीरत्नमाला, त्रिशिरोमत, श्रीसिद्धामत आदि ग्रन्थ में विधियों
का पूरक है और परमेश्वर की आज्ञा का परिपूरक है। इस विषय में
श्री तन्त्रालोक में कहा गया—
बिना पवित्रक से सब कृत्य निष्फल है
आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष से कुलपूर्णिमा के अन्तिम दिन तक

आ. २० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १८३
पवित्रक का अनुष्ठान करणीय है। इस विषय में कार्तिक महीने के कृष्ण
पञ्चदशी तिथि में पवित्रक विधि के अनुष्ठान से कुलचक्र तथा नित्याचक्र
की पूर्ति होती है—यह श्रीनित्यातन्त्रविद् ज्ञानियों का मत है। माघ
महीने की शुक्लापञ्चदशी ही इसका पूरक है ऐसा श्रीभैरवकुलोर्मिविद्
ज्ञानियों की सम्मति है। दक्षिणायन के समाप्ति की पञ्चदशी तिथि ही
विधि का पूरक है, यह श्रीतन्त्रसद्भाव के ज्ञाताओं का सिद्धान्त है।
अपने आर्थिक स्थिति के अनुसार परमेश्वर के पूजन के बाद हवन,
तर्पण समाप्त कर पवित्रक को अर्पित करना चाहिए। पवित्रक स्वर्ण,
मोती आदि से रचित होकर रेशम के सूत, कपास, कुश आदि से भी
बनाना चाहिए, पवित्रक में तत्त्व संख्या ( ३६ ) के अनुसार ग्रन्थियाँ
होनी चाहिए, पद, कला, भुवन, वर्ण, मन्त्र आदि की संख्या के अनुसार
ग्रन्थियों से युक्त घुटने तक एक, नाभि तक दूसरा, कण्ठ तक एक, मस्तक
पर एक—इन चार पवित्रक परमेश्वर को और गुरु को जो सब अध्वाओं
से परिपूर्ण है, इस प्रकार भावना के साथ और उस स्वरूप की प्राप्ति
के निमित्त अर्पित करना चाहिए, शेष जो रहे उसे एक देना चाहिए।
पवित्रक अर्पित करने के बाद महोत्सव करना चाहिए। चारो महीनों
में सात दिन तक या तीन दिन तक या आपत्ति के समय मुख्य पवित्रक
एक दिन अर्पित करें। आर्थिक वैभव हो तो हर महीने में पवित्रक अर्पित
करना चाहिए। अथवा चारों महीनों में या एक बार। पवित्रक-विधि
के अनुष्ठान न करने पर प्रायश्चित्त करना चाहिए। ज्ञानी मनुष्य के पास
धन की कमी भी हो तो भी इसके न करने से प्रत्यवाय होता है। जो
लोग लोभ से कलुषित चित्त है अथवा ज्ञानी हैं उनके द्वारा इसके न
करने से ज्ञान की ही निन्दा है—इस विषय के समर्थन निम्न प्रकार का
वचन है—
'विज्ञान प्राप्त करने के बाद जो परमेश के द्वारा कथित शास्त्र को
दूषित करता है उसे प्रायश्चित करना पड़ता है।'
यह पवित्रक विधि है
ज्ञानलाभ के समय और लौकिक उत्सव के अन्त में भी सब जगह
संविदुल्लास की अधिकता होती है जिस समय विशेषरूप से देवता चक्र
का सन्निधान होता है, अतः उस प्रकार अधिकता के पर्यालोचन से उसी
प्रकार विशेष का अनुष्ठान अनुयाग में करना चाहिए।

१९० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. २०
अब व्याख्या की विधि है
सब शास्त्रों के ज्ञान से परिपूर्ण गुरु को शास्त्र की व्याख्या के लिए
पूजन करना चाहिए। गुरु भी अपने तथा दूसरे के शिष्यों को उनके
संस्कार के अनुरूप शास्त्र की व्याख्या करनी चाहिए। जो लोग निम्न-
कोटि के शास्त्रों के अनुयायी हैं उन्हें भी गुरु करूणावश ईश्वर की
इच्छा से उत्पन्न विचित्र प्रकार के शक्तिपात की सम्भावना होती है
इस प्रकार भावना से भक्तिचित्त होकर शास्त्र की व्याख्या करें, केवल
गूढ़तात्पर्य को गुप्त रखें।
शास्त्रव्याख्या के श्रवण के इच्छुक शिष्य नीचे आसन पर बैठें।
शास्त्र सुनने के लिए उत्सुक होकर, शरीर, वाक् मन को संयमित
रखकर जब वे शास्त्र को सुनते हैं तब व्याख्या सफल होतो है।
पहले गन्ध आदि से लिपो हुई भूमि पर कमलाधार चतुष्कोण मण्डल
में तीन कमल अंकित कर या मन में संकल्प कर कमल के मध्य में
वागीशी, बायें और दाहिने गणेश और गुरु को पूजन करना चाहिए।
आधारकमल में व्याख्येय शास्त्र के अधिपति को पूजन करना चाहिए।
इसके अनन्तर सामान्यार्घपात्र से चक्र का तर्पण होना चाहिए। इसके
बाद सूत्र, वाक्य और पटलात्मक ग्रन्थ का व्याख्यान होना चाहिए।
व्याख्या पूर्वापर अविरुद्ध हो तथा तन्त्र, आवृत्ति, प्रसंग, समुच्चय
विकल्प प्रभृति के उद्भावन के द्वारा युक्ति के अनुसार पूर्वपक्ष को सम्यक्
प्रकार से उपस्थित करने के बाद उसमें दोष लगाकर (खण्डन करने के
बाद) अपने साध्य वस्तु को साधन करते हुए पटल (अध्याय) तक की
व्याख्या करनी चाहिए। वाच्य वस्तु के अनन्तर चक्रदेवता का तर्पण
पूजन आवश्यक है जब तक व्याख्या की समाप्ति नहीं होती है। जब
समाप्ति होती है तब विद्यापीठ के पूजन के अनन्तर उसे विसर्जित कर
उस स्थान को लिपने के बाद उसे अथाह जल में फेकना चाहिए।
यह हुई व्याख्या की विधि
अब समय निष्कृति है
यद्यपि तत्त्वज्ञान में निष्णात व्यक्ति के लिए किसी प्रकार प्रायश्चित
नहीं है तो भी जो लोग केवल चर्या (आचार) मात्र के मांक्षभागी हैं
उन पर अनुग्रह प्रदर्शित करने के लिए आचार का मार्ग उन्हें दिखाना