तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)
Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary
महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा
अथ पञ्चदशमाह्निकम्
यदा पुनरासन्नमरणस्य स्वयं वा बन्धुमुखेन शक्तिपात उपजायते,
तदा अस्मै सद्यः समुत्क्रमणदीक्षां कुर्यात् । समस्तमध्वानं शिष्ये न्यस्य
तं च क्रमेण शोधयित्वा, भगवतीं कालरात्रीम् मर्मकर्तनीं न्यस्य, तया
क्रमात्क्रमं मर्मपाशान् विभिद्य, ब्रह्मारन्ध्रवर्ति शिष्यचैतन्यं कुर्यात् । ततः
पूर्वोक्तक्रमेण योजनिकार्थं पूर्णाहुतिं दद्यात्, यथा पूर्णाहुत्यन्ते जीवो
निष्क्रान्तः परमशिवाभिन्नो भवति । बुभुक्षोस्तु द्वितीया पूर्णाहुतिः—
भोगस्थाने योजनाय, तत्काले च तस्य जीवलयः, नात्र शेषवर्तनम्,
ब्रह्मविद्यां वा कर्णे पठेत्, सा हि परामर्शस्वभावा सद्यः प्रबुद्धपशुचैतन्ये
प्रबुद्धविमर्शं करोति । समयादेरपि च एतत्पाठेऽधिकारः । सप्रत्ययां
निर्बीजां तु यदि दीक्षां मूढाय आयातशक्तिपाताय च दर्शयेत्, तदा हि
शिवहस्तदानकाले अयं विधिः—त्रिकोणमाग्नेयं ज्वालाकरालं रेफ-
विस्फुलिङ्गं बहिर्व्याप्ताच्चक्रधमायमानं मण्डलं दक्षिणहस्ते चिन्तयित्वा
तत्रैव हस्ते बीजं किंचित् निक्षिप्य ऊर्ध्वाधोरेफविबोधितफट्कार-
परम्पराभिः यस्य तां जननशक्तिं दहेत्, एवं कुर्वन् तं हस्तं शिष्यस्य
मूर्धनि क्षिपेत्, इति द्वयोरपि एषा दीक्षा निर्बीजा स्वकार्यकरणसामर्थ्य-
विध्वंसिनी भवति—स्थावरणामपि दीक्ष्यत्वेन उक्तत्वात्, वायुपुरान्तर्ध्व-
वस्थितं दोधूयमानं शिष्यं लघुभूतं चिन्तयेत्—येन तुलया लघुः दृश्यते
इति ।
मर्मकर्तनविधौ लघुभावे बीजभावविलये यदि मन्त्रः ।
तत्तथोचितपथेन नियुक्तस्तत्तदाशु कुरुते परमेशः ।
जं अनु अन्धि विसेसं घेत्तूण जडन्ति मन्तमुच्चरइ ।
इच्छासत्तिप्पाणो तं तं मन्तो करेइ फुडम् ॥
इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे सप्रत्ययदीक्षा-
प्रकाशनं नाम पञ्चदशमाह्निकम् ॥१५॥
पञ्चदश आह्निक
जब किसी व्यक्ति में जिसकी मृत्यु अति निकट हो गयी है उसमें
स्वयं या मित्रों के मुख से जानकर कि उसमें शक्तिपात उत्पन्न हुआ है
तब उस व्यक्तिको सद्य समुत्क्रमणी दीक्षा देनी चाहिए।१ सभी अध्वाओं
को शिष्य के शरीर में न्यास करने के बाद उन अध्वाओं का शोधन करना
आवश्यक है। इसके अनन्तर भगवती कालरात्रि जो मर्म की छेदन करने-
वाली है उसका भी न्यास करना चाहिए। उस कालरात्रि के द्वारा क्रम
से विभिन्न मर्मंका छेदन करना चाहिए। इसके अनन्तर शिष्य के चैतन्य
को ब्रह्मरन्ध्र में स्थापित करना चाहिए।२ इसके अनन्तर चैतन्य का
योजन परतत्त्व के साथ होना चाहिए। इस योजना के लिए पहले बतलाये
गये क्रम के अनुसार पूर्णाहुति देनी चाहिए। इस पूर्णाहुति के अनन्तर
जीवचैतन्य शरीर से निकलकर परमशिव से अभिन्न हो जाता है।३ जो
१. शिष्य जो जरा और रोगों से पीड़ित है और जिसमें मलों का परिपाक
उत्तमरूप से हुआ है ऐसे शिष्यको मृत्यु सन्निकट जानकर आचार्य सद्य-
निर्वाणदायिनी दीक्षा प्रदान करते हैं।
२. मर्म के छेदन करने के लिए क्षुरिका का न्यास होना चाहिए । आचार्य
आग्नेयी धारणा के द्वारा सभी भस्म स्थानों को उत्तप्त करते हैं और वायु
के द्वारा अंगुठे से मस्तक तक सम्पूर्ण शरीर भर गया है इस प्रकार
भावना करते हैं। इसके बाद शिष्य के चैतन्य को अंगुठे से भिन्न-भिन्न
स्थानों से उठाकर और साथ ही कालरात्रि नाम के क्षुरिका से मर्म से
चैतन्य का जो ग्रन्थिरूपी बन्धन है उन्हें काटकर उस चैतन्य को ब्रह्मरंध्र
पर स्थापित कर देते हैं ।
३. यहाँ जिस क्रम का उल्लेख हुआ है उससे भिन्न षट् चक्र, सोलह आधार,
तीन लक्ष्य, पाँच शून्य आदि के भेदन के द्वारा भी आचार्य शिष्य चैतन्य
को परमशिव में नियोजित कर सकते हैं । अथवा अन्य विधि जिसे ज्ञान-
त्रिशूल-विधि के रूप में वर्णित की जाती है उससे भी उत्क्रामणी दीक्षा दी
जाती है । लेकिन प्राणचार के सम्बन्ध में जिनका अभ्यास नही है वे अन्य
प्रक्रिया से इस प्रकार दीक्षा प्रदान करते हैं। क्योंकि प्राणचार का सम्यक्,
ज्ञान न होने पर ब्रह्मविद्या के पढ़ने से भी उत्क्रामणी दीक्षा सम्पन्न होती है।
१६० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १५
शिष्य भोग का अभिलाषी है भोग के स्थान में उसकी योजना के लिए
दूसरी पूर्णाहुति की आवश्यकता है। इस दीक्षा के अनन्तर उसी जीव
चैतन्य का लय हो जाता है। उसके लिए और कुछ कर्म शेष नहीं
रहता। अथवा उसके कान में ब्रह्मविद्या पढ़ना चाहिए। १ क्योंकि यह
ब्रह्मविद्या स्वतः ही परमार्थ परामर्शन स्वभावात्मक है और इसी कारण से
प्रबुद्ध पशु के चैतन्य में यह उसी क्षण प्रबुद्ध विमर्श उत्पन्न करती है। जो
लोग समयी हैं उनको भी इस विद्या के पाठ में अधिकार है। जो सप्रत्यय
निर्बीज दीक्षा प्राप्त करते हैं वे मूर्ख होने पर भी शक्तिपात प्राप्त होनेके
कारण उसे यह दिखाना चाहिए। जब उसके मस्तक पर शिवहस्त प्रदान
किया जाता है उसी समय यह विधि का प्रयोग होता है।
ऊर्ध्वमुख त्रिकोण में जो अग्नि की ज्वाला से भयंकर है, अग्निवाचक
वर्ण र जो अग्नि के स्फुलिंग के समान उज्ज्वल है और जो षडश्र वायु
चक्र के द्वारा निरन्तर ध्यायमान हो रहा है अपने दाहिने हाथ में इस
प्रकार मण्डल के चिन्तन के अनन्तर उस हाथ में धान्यादि बीज को
छोड़कर उसके ऊपर और नीचे रेफ वर्ण के द्वारा जाग्रत किया गया
मन्त्र की परम्परा से उस बीज की जननशक्ति को नष्ट कर देना चाहिए२
हाथ में इस प्रकार चिन्तन के अनन्तर उस हाथ को शिष्य के मस्तक
के ऊपर स्थापित करना चाहिए। ऐसे करने से ( बीज और शिष्य )
दोनों की निर्बीज दीक्षा होती है। जिससे उसमें अपने कार्य करने की
जो शक्ति थी उसका नाश हो जाता है। स्थावरों की दीक्षा का उल्लेख
शास्त्रकारों ने किया है। वायुपुर में स्थित और वायु से शिष्य ढोया जा
१. तन्त्रालोक में इस ब्रह्मविद्या का उल्लेख किया गया है। यह पंचाक्षरमय
मन्त्र है।
२. मन्त्र में असीम शक्ति निहित है लेकिन इस विषय में बहुतों को शंका और
संशय वर्तमान है। इस संशय के दूरीकरण के लिए आचार्य अपने दाहिने
हाथ में एक मण्डल का चिन्तन करते हैं और उसी मण्डल में एक धान को
रखकर कुछ मन्त्र का पाठ करते रहते हैं। मन्त्र के पाठ से उस धान का
अंकुर पैदा करने की शक्ति नष्ट हो जाती है। यही हुआ निर्बीजकरण।
इसके अनन्तर उस हाथ को शिष्य के मस्तक पर रखा जाता है।
आ. १५ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १६१
रहा है इस प्रकार चिन्तन करना चाहिए ! इस प्रकार चिन्तन करने के
पहले तराजू में शिष्य की लघुता दिखलायी पड़ती है१ ।
मर्म के छेदन से शिष्य की लघुता और बीजभाव के विलयन में मन्त्र
जब सामर्थ्य रखता है तब उसे उचित मार्ग की ओर परमेश्वर शीघ्र
नियुक्त करते हैं ।
इति श्रीअभिनवगुप्तपाद द्वारा रचित तन्त्रसार का पन्द्रह आह्निक
१. शिष्य में सद्य प्रत्यय ( विश्वास ) उत्पन्न करने के लिए तुला दीक्षा का
विधान है । इस प्रकार दीक्षा प्राप्त करने के बाद शिष्य का शरीर अत्यन्त
लघु हो जाता है क्यों कि इस दीक्षा द्वारा उस शरीर में पार्थिव शक्ति
स्तम्भित हो जाती है और उसका शरीर वायु में उठ जाता है । तराजू में
वजन करने पर उसका शरीर की लघुता दिखलाई देती है । धर्मशास्त्रों के
तुलाशुद्धि प्रकरण में इस विषय की चर्चा हुई है ।
११
अथ षोडशमाह्निकम्
अथ परोक्षस्य दीक्षा, द्विविधश्च सः—मृतो जीवंश्च । तत्र कृतगुरुसेव
एव मृत उद्वासितो वा अभिचारादिहतो डिम्बाहतो मृत्युक्षणोदितत-
थारुचिः मुखान्तरायातशक्तिपातो वा तथा दीक्ष्य इत्याज्ञा । अत्र च
मृतदीक्षायाम् अधिवासादि न उपयुज्यते । मण्डले मन्त्रविशेषसंनिधये
यत्र बहुला क्रिया, उत्तममुपकरणं पुष्पादि, स्थानं पीठादि, मण्डलं
त्रिशूलाब्जादि, आकृतिः ध्येयविशेषः, मन्त्रः स्वयं दीप्रश्च, ध्यानपरस्य
योगिनः तदेकभक्तिसमावेशशालिनो ज्ञानिनश्च संबन्धः, इत्येते संनिधान-
हेतवो यथोत्तरम् उक्ताः । समुदितत्वे तु का कथा स्यात्—इति
परमेश्वरेण उक्तम् । ततो देवं पूजयित्वा तदाकृतिं कुशादिमयीम्
अग्रे स्थापयित्वा गुर्वासादितज्ञानोपदेशक्रमेण तां पश्येत्, स च
मूलधारादुदेत्य प्रसृतसुविततानन्तनाड्यध्वदण्डं
वीर्येणाक्रम्य नासागगनपरिगतं विक्षिपन्व्योमृषीष्टे ।
यावद्धूमाभिराम्प्रचिततरशिखाजालकेनाध्वचक्रं
संच्छाद्याभीष्टजीवानयनमिति महाजालनामा प्रयोगः ॥
एतेनाच्छादनीयं व्रजति परवशं संमुखीनत्वमादौ
पश्चादानीयते चेत्सकलमथ ततोऽप्यध्वमध्याद्यथेष्टम् ।
आकृष्ट्यावुद्धृतौ वा मृतजनविषये कर्शणीयेऽथ जीवे
योगः श्रीशंभुनाथागमपरिगमितो जालनामा मयोक्तः ॥
बहिरपि इत्थं कथं न भवति, आकर्षणादौ विनाभ्यासात् ? इति चेत्—
रागद्वेषादियोगवशेन तत्प्रवृत्तौ ऐश्वर्यविशायोगात् । ततो नियति निय-
न्त्रितत्वात् अभ्यासाद्यपेक्षा स्यादेव । इह तु अनुग्रहात्मकपरमेश्वरातावे-
शात् तथाभावः । परमेश्वर एव हि गुरुशरीराधिष्ठानद्वारेण अनुग्राह्यान्
अनुगृह्णाति स च अचिन्त्यमहिमा इति उक्तप्रायम् । एवं जालप्रयोगा-
कृष्टो जीवो दार्भं जातीफलादि वा शरीरं समाविष्टो भवति, न च
आ. १६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १६३
स्पन्दते—मनःप्राणादिसामग्र्यभावात्, तदनुध्यानबलात् तु स्पन्दतेऽपि
तादृशेऽपि तस्मिन् पूर्ववत् प्रोक्षणादिसंस्कारः पूर्णाहुतियोजनिकान्तः।
अत्र परं पूर्णाहुत्या तस्य दार्भाद्याकारस्य परतेजसि लयः कर्तव्यः। एवम्
उद्धृतोऽसौ पूर्णाहुत्यैव अपवृज्यते—यदि स्वर्नरकप्रेततिर्यक्षु स्थितः।
मनुष्यस्तु तदैव ज्ञानं योगं दीक्षां विवेकं वा लभते—अधिकारिशरीर-
त्वात्, इति मृतोद्धरणम्। जीवतोऽपि परोक्षस्य उत्पन्ने शक्तिपातेऽयमेव
क्रमः, दार्भाकृतिकल्पनजीवाकृष्टिवर्जम्। ध्यानमात्रोपस्थापितस्यैव अस्य
संस्कारः दीक्षा च भोगमोक्षोभयदायिनी—स्ववासनाबलीयस्त्वात्,
भोगवासनाविच्छेदस्य च असंभाव्यमानत्वात् बहुभिः, दीक्षायाम् ऊर्ध्व-
शासनसंस्कारो बलवान् अन्यस्तु तत्संस्काराय स्यात्। परोक्षस्यापि
दीक्षितस्य तदैव ज्ञानाद्याविर्भावः इति।
परमेश्वरतावेशदाढर्यात्स्वातन्त्र्यभाग्गुरुः ।
परोक्षमभिसंधाय दीक्षितेति किमद्भुतम् ॥
परम्म सिवतम्म अत्तण-
प्पडिअंसच्छन्दभान ।
परमत्थं जो आविसत्ताऽस-
दिक्खइ परोक्ख इवं पिसिस्सगणं ॥
इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे परोक्षदीक्षाप्रकाशनं
नाम षोडशमाह्निकम् ॥ १६ ॥
षोडश आह्निक
परोक्ष व्यक्ति की दीक्षा की विधि बतलायी जाती है। १ परोक्ष
व्यक्ति दो प्रकार हैं एक है मृत और दूसरा जीवित है। उन में जिसने
गुरु की सेवा की है और दीक्षा पाने के पहले मर गया है अथवा दूसरी
जगह चला गया है, या अभिचार के प्रयोग से मारा गया है या डिम्ब से
मारा गया है २ और मृत्यु के समय दीक्षा की इच्छा उठती है अथवा
दूसरों के मुख से अर्थात् बन्धु, भार्या सुहृत् या पुत्र के मुख से यह
जानकर की उसमें शक्तिपात हुआ है तो उस समय गुरु उसे दीक्षा दें
यही परमेश्वर की आज्ञा है। मृतजनों को दीक्षा देते समय अधिवास
आदि करने की उपयोगिता नहीं है। पूजा के मण्डल में विशेष प्रकार मन्त्र-
के सन्निधान के लिए जहाँ बहुविध क्रिया की आवश्यकता है जैसे उत्तम
(लक्षण से समन्वित) पुष्प आदि, स्थान जैसे पीठादि, मण्डल जैसे
त्रिशूल और कमल, विशेषध्येयरूपी आकृति, स्वतः दीप्त मन्त्र, ध्यान
परायण परमेश्वर के प्रति अनन्य भक्ति से समाविष्ट ज्ञानी पुरुषों
के साथ इन सबका सम्बन्ध है। ३ ये सब मंत्रके सन्निधान के कारण
एक के बाद बाद एक हो तो ठीक है, इन में सब एक साथ हो तो उत्तम
है ऐसा ही परमेश्वर ने कहा है। इसके अनन्तर परमेश्वर के पूजन के
बाद शिष्य जो मृत या दूर देश में है उसकी कुश से बनी मूर्ति को
१. रुद्रशक्ति के समावेश होने पर ही किसी पुरुष में गुरु के समीप जाने की
इच्छा होती है, क्यों कि भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली दीक्षा तभी
सम्भव होती है। लेकिन दीक्षा प्राप्त करने के पहले अगर दीक्षा प्राप्त करने-
वाले की मृत्यु हो जाती है तो गुरु के समीप जाना कैसे सम्भव होता है ?
इस प्रश्न का समाधान यह है कि गुरु की कृपापात्रता बनना ही सन्निधान
का तात्पर्य है गुरु के समीप जाना या जाना यहाँ अवास्तव है।
२. वाहनों के द्वारा आकस्मिक मृत्यु होने पर ।
३. क्रिया, उपकरण, स्थान, मण्डल, आकृति, मन्त्र, ध्यान, योग, ईश्वर में
अनन्य भक्ति, ज्ञान और तन्मयभाव ये ग्यारह मन्त्र के सन्निधान के कारण
बतलाये जाते हैं लेकिन ईश्वर में अनन्य भक्ति इन में मुख्य है।
आ. १६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १६५
सम्मुख रखकर गुरु अपने आचार्य से प्राप्त ज्ञान के उपदेश जिस क्रम से
पाये हैं उस ज्ञान दृष्टि से उसे देखें।१ वह तो :—
मूलाधार से उदित और वहाँ से प्रसृत सुविस्तृत अनन्त नाड़ियों में
प्रवहमान प्राण ने दण्ड का आकार धारण कर लिया है। उस प्राण को
शाक्तबल से अपने अधिकार में लाकर और हृदय आदि स्थानों को पार
करा कर एवम् नासिकारन्ध्र तक उसे पहुँचाकर बाहर निक्षेप कर देना
चाहिए ताकि वह प्राण विश्वव्यापक बन जाय। इसके अनन्तर उस प्राण
रूप अग्नि से निकले प्रचुर धूम के जाल से समग्र अध्वाओं को आच्छादित
कर देना चाहिए। यही ईप्सित जीव के आनयनरूप महाजाल नाम का
प्रयोग है।२ इस जालप्रयोग से जो आच्छादनीय अध्वसमूह है वह दूसरे
का अधीन बन जाता है। उसे पहले अपने सम्मुख उपस्थित किया जाता
१. कुश या गोमय से शिष्य की आकृति बनानी चाहिए। उसी आकृति में ही
शिष्य वर्तमान है इस प्रकार भावना करते हुए उसे गुरु अपने सम्मुख स्थापित
कर देते हैं। उस आकृति में प्रकृति तक अध्वा का न्यास करना चाहिए क्यों
कि मृत पुरुष प्रकृति में ही स्थित रहता है। इसके अनन्तर महान् जाल
प्रयोग से उस पुरुष के चित्तको आकर्षित करा उस पुरुषको अपने सम्मुख
स्थित कुश में स्थापित करना चाहिए।
२. महाजाल प्रयोग मृतव्यक्तियों के लिए किया जाता है। इसका विशेष वर्णन
तन्त्रालोक में मिलता है जिसका सार नीचे लिखा जा रहा है।
आचार्य स्वभावतः ही शिवाहं भावना में परिनिष्ठित रहते हैं। वे
महाजाल प्रयोग के पहले पुनः पुनः रेचक, पूरक और कुम्भक के द्वारा मूला-
धार से प्राणशक्ति को जाग्रत करते हैं। इस जागरण का विशेष तात्पर्य है।
प्राण अपने स्वभाव से समग्र शरीर में व्याप्त रहता है। शरीर में साढ़े
तीन करोड़ नाड़ियाँ हैं जिनमें प्राण विचरता रहता है।
कुम्भक के प्रयोग से प्राण दण्ड का आकार धारण कर लेता है। तब
आचार्य उसे विभिन्न स्थानों को पार कराकर नासिकारन्ध्र तक ले जाते हैं
और बाहर छोड़ देते हैं। बाहर छोड़ा गया प्राण ही धूम के समान सारे
विश्व में फैल जाता है और अन्त में वह एक विशाल जाल के समान बन
जाता है। मछुए के जाल से जैसे मछली पकड़ी जाती है, उसी प्रकार मृत
आत्मा जहाँ कहीं भी हो उस जाल से निकट लाया जाता है।
१६६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १६
है, यद्यपि सभी को लाया जाता है और बाद में उसी का ग्रहण होता है ।
अध्वासमूह में केवल उस अभीष्ट जीव को आकृष्ट करने के बाद उसका
( शिष्य का ) ही उद्धार किया जाता मृतजनों के विषय में यह जालप्रयोग
और दीक्षा रूपी योग श्री शम्भुनाथ के वचन से मुझे ज्ञात हुआ और मैंने
उसे कह दिया ।
बाहर भी इस प्रकार क्यों नहीं होता है ? आकर्षण आदि कार्यों में
बिना अभ्यास से काम नहीं बनता । राग और द्वेष से कार्य में प्रवृत्त होने
पर ईश्वरीय शक्ति का आवेश जो आचार्य में वर्तमान है उसकी हानि हो
जाती है, क्यों कि वह नियतिनियन्त्रित है और अभ्यास की अपेक्षा भी
है, लेकिन इस जगह अनुग्रहात्मक परमेश्वरता का आवेश आचार्य में
( दीक्षा के समय ) रहता है, इसलिए अभ्यास की अपेक्षा यहाँ नहीं है ।
परमेश्वर ही गुरु के शरीर में अधिष्ठित होकर जो अनुग्रह पाने वाले हैं
उन्हें अनुग्रह करते हैं। उनकी महिमा अचिन्तनीय है यह कहा ही गया है !
इस जालप्रयोग से जीव आकृष्ट होने पर कुश या जातीफल आदि
शरीर में समाविष्ट होता है । उस समय उस में स्पन्दन नहीं होता है
क्यों कि जीव के मन, प्राण आदि सामग्री वहाँ उपस्थित नहीं रहती,
लेकिन उनका ( मन और प्राणों का ) ध्यान होने पर वह स्पन्दित भी
होता है । जिस प्रकार हो उस में ( कुश आदि शरीर में ) पहले जैसे
प्रोक्षण आदि संस्कार करने के बाद पूर्णाहुति और शिवत्वयोजन तक
कार्य करना चाहिए । इसके बाद पूर्णाहुति के द्वारा उस कुशमय शरीर
को परम प्रकाश में विलयन करना चाहिए । इस प्रकार शिष्य के उद्धार
होने पर पूर्णाहुति के साथ ही उसकी मुक्ति हो जाती है अगर वह स्वर्ग,
इस जाल प्रयोग में और भी बातें हैं। इस प्रयोग में मन्त्र का भी उपयोग
है । मायाबीज को संहार क्रम से उच्चरित किया जाता है, यह दण्डाकार
‘र’ है, इसके साथ शाक्तस्पन्दमय हकार और अन्त में नासारन्ध्र में ईकार
जो ज्योतिरूप धारण कर लेता है । उस ईकार स्थित बिन्दु उसकी शिखा
बन जाता है । यही शिखा ही व्यापक विश्वमय जाल का रूप धारण लेती
है। यह जाल लिङ्ग शरीर धारण किये हुए स्रोत में तैरता हुआ जीव को
उठाता है । आचार्य उस जीव को स्वर्ग, नरक या किसी भी स्थिति से
उद्धार करते हैं ।
आ. १६ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १६७
नरक, प्रेत या तिर्यक्स्थिति में क्यों न हो । मनुष्य शरीर में अगर वह
स्थित हो तो उसी समय ज्ञान, योग, दीक्षा या विवेक प्राप्त होता है—क्यों
कि उसका अधिकारी शरीर है ।¹ यह हुआ मृत पुरुषों का उद्धरण ।
जो जीवित और परोक्ष में स्थित है अगर उसमें शक्तिपात हुआ है तो
उसके उद्धार का यही क्रम है, केवल कुशमय शरीर की कल्पना और
जीवाकर्षण को छोड़कर केवल ध्यान से ही उसकी उपस्थिति के बाद
उसका संस्कार होता है ।
दीक्षा भोग तथा मोक्ष उभय के देनेवाली है क्योंकि अपनी अपनी
वासना अत्यन्त बलवान है और बहुतों की भोगवासना दूर करना एक-
प्रकार असम्भव है । दीक्षा में ऊर्ध्वशासन से प्राप्त संस्कार ही बलवान है,
जो निम्नकोटि के शास्त्रों से संस्कृत है उन्हें पुनः संस्कार की अपेक्षा है ।
जो परोक्ष रूप से दीक्षित है उसमें ज्ञान का आविर्भाव होता है ।
यह बड़ा ही आश्चर्य है कि परमेश्वरता के आवेश की दृढ़ता से
स्वतन्त्रता प्राप्त गुरु परोक्ष में स्थित जीवों को चिन्तन के द्वारा दीक्षा
देते हैं ।
इति श्री अभिनवगुप्ताचार्य रचित तंत्रसार के परोक्षदीक्षा
प्रकरण का सोलह आह्निक है ।
१. जिस मृत जीव ने मनुष्य शरीर प्राप्त कर लिया है परोक्षदीक्षा से उसकी
मुक्ति अविलम्ब नहीं होती है, उस शरीर के छूटने पर होती है । अगर
गुरु चाहे तो परोक्षदीक्षा के साथ साथ उसकी मृत्यु भी हो सकती है ।
अथ सप्तदशमाह्निकम्
अथ लिङ्गोद्धारः
वैष्णवादिदक्षिणतन्त्रान्तेषु शासनेषु ये स्थिताः तद्गृहीतव्रता वा,
ये च उत्तमशासनस्था अपि अनधिकृताधरशासनगुरूपसेविनः, ते यदा
शक्तिपातेन पारमेश्वरेण उन्मुखीक्रियन्ते तदा तेषामयं विधिः,—तत्र
एनं कृतोपवासम् अन्यदिने साधारणमन्त्रपूजितस्य तदीयां चेष्टां श्रावि-
तस्य भगवतोऽग्रे प्रवेशयेत्, तत्रास्य व्रतं गृहीत्वा अम्भसि क्षिपेत्, ततोऽसौ
स्नायात्, ततः प्रोक्ष्य, चरुदन्तकाष्ठाभ्यां संस्कृत्य, बद्धनेत्रं प्रवेश्य साधा-
रणेन मन्त्रेण परमेश्वरपूजां कारयेत्। ततः साधारणमन्त्रेण शिवीकृते
अग्नौ व्रतशुद्धिं कुर्यात्, तन्मन्त्रसंपुटं नाम कृत्वा 'प्रायश्चित्तं शोधयामि'
इति स्वाहान्तं शतं जुहुयात्। ततोऽपि पूर्णाहुतिः वौषडन्तेन। ततो
व्रतेश्वरम् आहूय पूजयित्वा तस्य शिवाज्ञया 'अकिञ्चित्करः त्वमस्य भव'
इति श्रावणां कृत्वा तं तर्पयित्वा विसृज्य अग्निं विसृजेत्, इति लिङ्गो-
द्धारः। ततोऽस्य अधिवासादि प्राग्वत्। दीक्षा यथेच्छम्।
अधरस्थोऽपि गाढेशशक्तिप्रेरितमानसः ।
संस्कृतस्य दीक्ष्यो यश्च प्राङ्गिरतोऽसद्गुरावभूत् ॥
पसवअणुहं जोत्तमसासणुल
इविणुवणु परमेसपसाइण ।
पत्थइ सद्गुरुबोहपसाहणु
सो दिक्खइ लिङ्गोद्धारिण ॥
इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तविरचिते श्रीतन्त्रसारे लिङ्गोद्धरणं
नाम सप्तदशमाह्निकम् ॥ १७ ॥
सप्तदश आह्निक
वैष्णव आदि से लेकर दक्षिण तन्त्र तक शास्त्रों के अनुशासन में जो
लोग स्थित हैं¹ या उन उन शास्त्रों से जिन्होंने व्रत धारण कर लिया है,
और जो लोग उत्तम शासन में स्थित होते हुए भी ऐसे गुरुओं की सेवा में
निरत रहते हैं जिन्हें उर्ध्व शासन के अधिकार प्राप्त नहीं है, ऐसे मनुष्य
जब परमेश्वर के शक्तिपात के द्वारा उनकी ओर उन्मुख किये जाते हैं,
तब उनके लिए निम्नलिखित विधान है। तब ऐसे मनुष्य को उपवास
कराकर दूसरे दिन सामान्यविधि से भगवान् के पूजन के अनन्तर उसके
पूर्वकृत्य उन्हें सुनाकर परमेश्वर के सामने उपस्थित करना चाहिए। तब
उसका पूर्वव्रत अर्थात् मन्त्र आदि लेकर जल में छोड़ देना चाहिए। उसके
बाद उसे स्नान करना चाहिए इसके बाद उसका प्रोक्षण होना चाहिए
तब उसे चरु और दन्तकाष्ठ देकर उसका संस्कार होना चाहिए। इसके
अनन्तर साधारण मन्त्र से शिवस्वरूप अग्नि में उसकी व्रतशुद्धि करनी चाहिए।
उसके द्वारा गृहीत मन्त्र से उसका नाम संपुटित कर 'प्रायश्चित्त का शोधन
१. कश्मीर के शिवाद्वैत सिद्धान्त के अनुसार वैष्णव बौद्ध, सिद्धान्त आदि
साधनधारा के जो लोग अनुगामी हैं और उन धाराओं के आचार्य से
जिन्होंने दीक्षा प्राप्त कर ली है वे निम्नकोटी के शास्त्र के अनुशासन से
चलते हैं। जब शिवरूपी सूर्य के किरणों से उनके हृदय कमल खिल उठते
हैं अर्थात् जब उन पर शक्तिपात होता है तब उन में स्वभावतः ही सद्गुरु
के समीप जाने की इच्छा उदित होता है। लेकिन तुरन्त ही उन्हें दीक्षा
नहीं मिलती है। जिस प्रक्रिया से उन्हें पूर्वगुरु से प्राप्त संस्कार का
दूरीकरण होता है उस प्रक्रिया का परिभाषिक नाम लिंगोद्धार है। जैसे
घड़ों से दुर्गन्ध दूर करने के पहले उसे बार बार साफ किया जाता है
फूलों के सुगन्ध से उसे सुगन्धित किया जाता है, उसी प्रकार असद्गुरु
से संस्कार-प्राप्त मनुष्य का भी दुगुणा संस्कार आवश्यक होता है।
इसलिए उसका उपवास, स्थण्डिल में पूजन, उसके पूर्व कृत्यों का
भगवत्समीप में कथन, उसपर परमेश्वर के अनुग्रह प्राप्त करने के लिए
आचार्य के द्वारा भगवान् से प्रार्थना, पूर्वमन्त्र का जल में विसर्जित
करना आदि कार्य करना पड़ता है।
१७० ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ आ. १७
करता हूँ' इसका उच्चारण करते हुए स्वाहाशब्द इसके अन्त में लगाकर
सौ बार हवन करना चाहिए। वौषड् मन्त्र से पूर्णाहुति होनी चाहिए
तब 'व्रतेश्वर का आवाहन कर उसके पूजन के बाद' शिवजी की आज्ञा से
आप इस पर अकिंचित्कर बन जाइए' इस प्रकार श्रावणा सुनवाकर उनके
तर्पण करने के बाद उसे विसर्जित करना चाहिए। इसके बाद अग्नि
का भी विसर्जन करना चाहिए। यह हुआ लिंगोद्धार। इसके अनन्तर
अधिवास आदि की विधि पहले जैसी है। और दीक्षा यथारुचि होनी है।
जो निम्नभूमि में स्थित है वह महेश्वर के शक्तिपात के कारण सद्गुरु
के पास जाने के इच्छुक होता है। जो पहले असद्गुरु के प्रति सेवानिरत
था उसे भी संस्कृत और दीक्षित करना उचित है।
इति श्री अभिनवगुप्त रचित तंत्रसार के लिंगोद्धार
नाम का सप्तदश आह्निक है।
अथाष्टादशमाह्निकम्
अथाभिषेकः
स्वभ्यस्तज्ञानिनं साधकत्वे गुरुत्वे वा अभिषिञ्चेत्—यतः सर्वलक्षण-
हीनोऽपि ज्ञानवानेव साधकत्वे अनुग्रहकरणे च अधिकृतः न अन्यः
अभिषिक्तोऽपि। स्वाधिकारसमर्पणे गुरुः दीक्षादि अकुर्वन् अपि न प्रत्य-
वैति; पूर्वं तु प्रत्यवायेन अधिकारबन्धेन विशेषपददायिना बन्ध एव
अस्य दीक्षाद्यकरणम्, सोऽभिषिक्तो मन्त्रदेवतातादात्म्यसिद्धये षाण्मा-
सिकं प्रत्यहं जपहोमावशेषपूजाचरणेन विद्याव्रतं कुर्यात्, तदनन्तरं
लब्धतन्मयीभावो दीक्षादौ अधिकृतः, तत्र न अयोग्यान् दीक्षेत, न च
योग्यं परिहरेत्, दीक्षितमपि ज्ञानदाने परीक्षेत, अत्र च अभिषेकविभवेन
देवपूजादिकम्।
स्वभ्यस्तज्ञानतया स्वार्थपरार्थाधिकारतां वहतः।
साधकगुरुतायोगस्तत्र हि कार्यस्तदभिषेकः॥
जो परि उण्ण सत्थसं अणु
तस्स अणुग्गहमेतु पवित्ति।
कामणाइ जो पुणुसो साह
उतइ उपा अरुहुरइणहु चित्ति ॥
इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे अभिषेकप्रकाशनं
नाम अष्टादशमाह्निकम् ॥ १८ ॥
अष्टादश आह्निक
अब अभिषेक विधि है१
जिसमें ज्ञान का परिपाक हो चुका है उसे साधक पद में अथवा गुरु के
पद में अभिषिक्त करना चाहिए, क्योंकि सब प्रकार लक्षणों से विहीन होने
पर भी केवल ज्ञानी ही साधक पद में अभिषिक्त होता है और दूसरों पर
अनुग्रह करने का अधिकार रखता है। अभिषिक्त होने पर भी ज्ञानी के
अलावा दूसरा कोई इस प्रकार अधिकार नहीं रखता है। ज्ञानहीन गुरु
अपने अधिकार समर्पण में दीक्षा आदि कृत्य न करने पर भी उसे कोई
प्रत्यवाय नहीं होगा। लेकिन पहले (अभिषिक्त होने के पहले) विद्येश्वर
के पद प्रदान करने वाले अधिकार रूपी बन्धन रहने के कारण दीक्षा
प्रदान न करना उसके लिए अपराध था।२ अब अभिषिक्त होने के
१. दीक्षा के अनन्तर अभिषेक विधि का संक्षिप्त वर्णन इस आह्निक में प्रस्तुत
किया गया है। लेकिन अभिषिक्त करने के पहले किसे अभिषिक्त करना
चाहिए आचार्य के मन में यह विचार उठता है। यह याद रखना आवश्यक
है कि जिसे सबीज दीक्षा प्राप्त हुआ है वही आचार्य पद में अभिषिक्त होने
की योग्यता रखता है लेकिन सभी सबीज दीक्षा प्राप्त किये हुए मनुष्य
अभिषेक प्राप्त नहीं कर सकते हैं। गुरु के द्वारा उनकी परीक्षा होना
आवश्यक है। श्रुत, चिन्ता और भावना से जिस दीक्षित शिष्य में ज्ञान का
परिपाक हो चुका है अभिषेक उसी को मिलता है। और भी बात है,
जिसने समयी दीक्षा से दीक्षित होकर अभिषेक भी प्राप्त कर लिया है
उसमें कुछ कमी होने के कारण वह देशिक अर्थात् आचार्य नहीं बन
सकता है। ये कमियाँ निम्न प्रकार हैं—अध्वसन्धान विधि को न जानना,
जो दो प्रकार हैं—एक आन्तर, दूसरा बाह्य। इसलिए सब प्रकार लक्षण
से हीन होने पर भी ज्ञानवान गुरु ही श्रेष्ठ है। वह पदवाक्य प्रमाण के
ज्ञाता, शिवभक्त, अशेष शैवशास्त्रों के मर्मज्ञ और करुणाशील है। इसके
विपरीत जो अभक्त है और स्वयं अपने को शिव के द्वारा अधिष्ठित मानता
है वह दीक्षा आदि देने का अधिकार नहीं रखता है।
२. इस सिद्धान्त के अनुसार जो सब तत्त्वों का यथार्थरूप से जानते हैं वे
शिवस्वरूप हैं और मन्त्र के वीर्य का वास्तविक प्रकाश करने वाले हैं।
आ. १८ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १७३
अनन्तर मन्त्र और देवता की तदात्मता की सिद्धि के लिए छः महीने तक
प्रतिदिन जप, हवन और विशेषपूजा रूपी विद्याव्रत का अनुष्ठान उसे
करना चाहिए ।'
इसके अनन्तर मन्त्र और देवता सम्बन्धी तन्मयीभाव सम्पन्न हो
जाने पर उसे दीक्षा आदि कृत्यों में अधिकार आता है । इस दीक्षा कार्य में
अयोग्य मनुष्य को दीक्षा न देनी चाहिए । न तो योग्य व्यक्ति का परिहार
करना चाहिए । जो दीक्षित है उसे ज्ञान प्रदान करते समय उसकी परीक्षा
होनी चाहिए । जिसने गुप्त रूप से ज्ञान प्राप्त कर लिया है उसके विषय में
गुरु को वैसा जानकर उसकी उपेक्षा करनी चाहिए । इस अभिषेक के कार्य
में जिसकी जैसी शक्ति है देवता का पूजन भी उसी प्रकार होना चाहिए ।
ज्ञान का अभ्यास जिसमें हो चुका है और अपने और दूसरों में ज्ञान
के संक्रमण करने के अधिकार रखने वाले साधक ही गुरु होने की योग्यता
प्राप्त करता है इसलिए ऐसे पुरुष का ही अभिषेक होना चाहिए ।
इति श्री अभिनवगुप्त के द्वारा रचित तन्तसार के अभिषेक
प्रकाशन नाम का अठारह आह्निक है ।
ऐसे मनुष्य जगत् में दुर्लभ हैं। उनके दर्शन स्पर्शन, उनसे आलापन,
उनकी कृपादृष्टि दूसरों पर पड़ने से मनुष्य निष्पाप हो जाते हैं। उनसे
दीक्षा मिलने पर मनुष्य परमपद प्राप्त करते हैं।
गुरु जो कर्मी है, ज्ञानी नहीं अगर वह अपने अधिकार समर्पित करने
के बाद दीक्षा आदि कार्यों से विरत रहते हैं तो उसे किसी प्रकार अपराध
का दोष नहीं लगता है। लेकिन अभिषिक्त होने के पहले उसे अधिकार रूप
बन्धन था। क्यों कि भोग जैसा बन्धन है अधिकार भी उसी प्रकार बन्धन
है। गुरु दीक्षा के द्वारा शिष्य को विद्येश्वर पद में पहुँचाते हैं, यह उनका
अधिकार है अगर वे दीक्षा आदि कार्यों से विरत रहते हैं तो अधिकार
भंग रूप अपराध उसे लगता है ।
१. जिन्होंने अभिषेक प्राप्त कर लिया है वे दो वर्गों में बाँटे जाते हैं—एक
आचार्य है, और दूसरा साधक है । आचार्य दीक्षा आदि कार्यों में
अधिकार रखते हैं लेकिन साधक सिद्धि की कामना रखते हैं।
इसलिए दोनों को अभिषेक प्राप्त होने पर भी अधिकार की भिन्नता है ।
अथैकोनविंशमाह्निकम्
अथ अधरशासनस्थानां गुर्वन्तानामपि मरणसमनन्तरं मृतोद्धारो-
दितशक्तिपातयोगादेव अन्त्यसंस्काराख्यां दीक्षां कुर्यात्, ऊर्ध्वशासनस्था-
नामपि लुप्तसमयानाम् अकृतप्रायश्चित्तानाम्—इति परमेश्वराज्ञा । तत्र
यो मृतोद्धारे विधिः उक्तः स सर्व एव शरीरे कर्तव्यः, पूर्णाहुत्या शव-
शरीरदाहः, मूढानां तु प्रतीतिरूढये सप्रत्ययामन्त्येष्टिं क्रियाज्ञानयोग-
बलात् कुर्यात्, तत्र शवशरीरे संहारक्रमेण मन्त्रान् न्यस्य जालक्रमेण
आकृष्य रोधनवेधनघट्टनादि कुर्यात्—प्राणसंचारक्रमेण हृदि कण्ठे ललाटे
च इत्येवं शवशरीरं कम्पते । ततः परमशिवे योजनिकां कृत्वा तत् दहेत्
पूर्णाहुत्या, अन्त्येष्ट्या शुद्धानाम् अन्येषामपि वा श्राद्धदीक्षां त्र्यहं तुर्ये
दिने मासि मासि संवत्सरे संवत्सरे कुर्यात् । तत्र होमान्तं विधिं कृत्वा
नैवेद्यमेकहस्ते कृत्वा तदीयां वीर्यरूपां शक्तिं भोग्याकारां पशुगतभोग्य-
शक्तितादात्म्यप्रतिपन्नां ध्यात्वा परमेश्वरे भोक्तरि अर्पयेत्, इत्येवं भोग्य-
भावे निवृत्ते पतिरेव भवति, अन्त्येष्टिमृतोद्धरणश्राद्धदीक्षाणाम् अन्यतमे-
नापि यद्यपि कृतार्थता तथापि बुभुक्षोः क्रियाभूयस्त्वं फलभूयस्त्वाय
इति सर्वमाचरेत् । मुमुक्षोरपि तन्मयीभावसिद्धये अयम् जीवतः प्रत्यहम्
अनुष्ठानाभ्यासवत् । तत्त्वज्ञानिनस्तु न कोऽप्ययम् अन्त्येष्ट्यादिश्राद्धान्तो
विधिः उपयोगी—तन्मरणं तद्विद्यासंतानानिनां पर्वदिनं संविदंशपूरणात्,
तावतः संतानस्य एकसंवित्मात्रपरमार्थत्वात् जीवतो ज्ञानलाभसंतान-
दिवसवत् । सर्वत्र च अत्र श्राद्धादिविधौ मूर्तियागः प्रधानम् इति
श्राद्धादिविधौ मूर्तियागः प्रधानम् इति श्रीसिद्धामतम्' तद्विधिश्च वक्ष्यते
नैमित्तिकप्रकाशने ।
अनुग्रहपरः शिवो वशितयानुगृह्णाति यं
स एव परमेश्वरीभवति नाम किं वाऽद्भुतम् ।
उपायपरिकल्पना ननु तदीशनामात्मकं
विदन्निति न शङ्कते परिमितेप्युपाये बुधः ॥
आ. १९ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १७५
एहु सरीरु सअलु अह भवसरु
इच्छामित्तणजेण विचित्ति उ ।
सोश्चिअ सोक्खदेयि परमेसरु
इअजानन्त उरूढिपदितो उ ॥
इति श्रीमदभिनवगुप्ताचार्यविरचिते तन्त्रसारे श्राद्धदीक्षाप्रकाशनं
नाम एकोनविंशमाह्निकम् ॥ १९ ॥
उन्नीसवाँ आह्निक
निम्नकोटि के शास्त्र के अनुसार में स्थित १ गुरु तक सभी मनुष्यों की
मृत्यु के अनन्तर उनपर शक्तिपात हो जाने के कारण ही आचार्य को मृत
मनुष्य के लिए कथित दीक्षा विधि के अनुसार अन्त्येष्टि दीक्षा करनी
चाहिए। केवल इतना ही नहीं जो लोग ऊर्ध्वशासन अर्थात् शिवाद्धय
शासन में स्थित हैं लेकिन आचारभ्रष्ट हो गये हैं और प्रायश्चित्त न कर
मर गये हैं ऐसे लोगों के लिए भी यह अन्त्येष्टिदीक्षा का अनुष्ठान करना
चाहिए। यह परमेश्वर की आज्ञा है। इस विषय में यह ज्ञातव्य है कि
मृत मनुष्य के उद्धार के लिए जो विधि का उल्लेख हुआ है वे सभी
शवशरीर में करणीय है। शरीर का दाहसंस्कार पूर्णाहुति से करना
चाहिए। जो लोग अज्ञ हैं उनमें विश्वास दिलाने के लिए सप्रत्ययात्मिका
अन्त्येष्टि२ क्रिया, ज्ञान और योगबल से करनी चाहिए।
१. इस सिद्धान्त के अनुसार वैष्णवादि शास्त्रों के अनुगामी सभी लोग निम्न-
कोटि के अनुशासन के अन्तर्गत हैं। मृत्यु के अनन्तर अगर उनमें शक्तिपात
हुआ हो तो आचार्य उनके दाहसंस्कार के समय अन्त्येष्टिदीक्षा प्रदान
करते हैं। इस प्रकार दीक्षा केवल उन्हीं को नहीं अपितु जो लोग अद्वय
शिवमार्ग में स्थित हैं लेकिन किसी कारण वश आचारभ्रष्ट हो गये हैं
उनके लिए भी इस प्रकार दीक्षाविधि प्रचलित थी।
२. शवशरीर में उन सब क्रियाओं का अनुष्ठान आवश्यक हैं मृतोद्धार के लिए
कुश या गोबर से बनी मूर्ति में उनका अनुष्ठान किया जाता है। जो लोग
इस प्रकार अनुष्ठान में विश्वास नहीं रखते हैं उन्हें विश्वास दिलाने के
लिए आचार्य क्रिया, ज्ञान और योग बल से अर्थात् उस जीव को महाजाल
प्रयोग के द्वारा आकर्षित करते हुए आचार्य अपने हृदय में उसे स्थापित
कर दें। इसके अनन्तर कुछ प्रक्रियाओं से उसकी सत्ता से अपनी सत्ता की
अभिन्नता लावे इसके बाद मध्यममार्ग से ब्रह्मरंध्र तक पहुँचकर स्वाभाविक
स्पन्द को प्राप्त करें, जीव की सोलह कलाओं पर अपना अधिकार स्थापित
कर उसको अपने के साथ अभिन्न बनावे। इस प्रक्रिया के फलस्वरूप शव
का शरीर काँपने लगता है या उसका बाया हाथ ऊपर उठ जाता है।
आ. १९ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ १७७
उस शवशरीर में संहार क्रम से मन्त्रों के न्यास¹के अनन्तर महाजाल
प्रयोग से उसकी जीवात्मा के आकर्षण के बाद रोधन, वेधन, घट्टन आदि
कार्यों को करना चाहिए।² प्राण संचार क्रम से उस शरीर के हृदय,
कण्ठ और ललाट में प्रवेश करने पर शव का शरीर काँपने लगता है।
इसके अनन्तर उस जीव का योजन परमशिव में होना चाहिए। इसके
बाद पूर्णाहुति के रूप में उस शरीर का दाहसंस्कार करना चाहिए।
अन्त्येष्टि संस्कार के द्वारा जिनकी शुद्धि हुई है या जिनकी शुद्धि नहीं
हुई है उनकी श्राद्धदीक्षा तीसरे दिन या चौथे दिन या हर महीने या हर
वर्ष करना चाहिए।
इसके बाद होम तक कार्यों को समाप्त कर एक हाथ में नैवेद्य
रखकर परमेश्वर के वीर्यरूपी शक्ति ने ही भोग्य वस्तुओं के आकार
धारण कर लिए है और पशुजीवों के भोग्य शक्ति के साथ तदात्मता को
प्राप्त कर लिया है इस प्रकार भावना के साथ उस वस्तु को परमेश्वर
रूपी भोक्ता को अर्पित कर देना चाहिए।³
इस उपाय से पशुजीव की भोग्यरूपता की निवृत्ति होती है और
जीव पतिभाव को प्राप्त करता है। अन्त्येष्टि, मृतोद्धरण और श्राद्धदीक्षा
आदि उपायों से किसी एक के द्वारा यद्यपि कृतार्थता अर्थात् कार्य की
सिद्धि होती है तो भी जो भोग का अभिलाषी है उसके लिए क्रिया को
बहुलता है उससे फल की प्राप्ति अधिक होती है—इसलिए सब कृत्यों का
१. मन्त्रों का न्यास संहार क्रम से करना चाहिए अर्थात् मन्त्र में जो वर्ण
अन्तिम हैं उसका पहले और जो आदि वर्ण है उसका अन्त में न्यास करना
चाहिए।
२. रोधन बिन्दु से, वेधन शक्ति बीज से, घट्टन त्रिशूल बीज से और ताड़न
विसर्ग से सम्पन्न होता है।
३. नैवेद्य जो अन्नरूप है गुरु को उसे शक्तिरूप में चिन्तन करना चाहिए। उसी
शक्ति के द्वारा साध्य समाशिष्ट है। उस अन्न में जो पशु सम्बन्धी अंश है
वही उसका भोग्य रूप है। उस भोग्य वस्तु का भोक्ता स्वयं परमेश्वर हैं,
उसे अर्पित कर देने पर शिष्य के सभी भोगों का अवसान हो जाता है
और उसे शिवभाव प्राप्त होता है।
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