सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 294 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 116

आ. ४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ ३५
दान दीक्षित पुरुष के लिए—प्रवर्तक वाक्य से ( दान ) वहाँ अशुद्धता का
निर्देश हुआ ऐसा कहा जाय, अन्य प्रकार प्रवर्तक वाक्य से ( जो शिव के
द्वारा कहा गया है ) तुल्य हो जाता है, इस प्रकार दूसरा प्रवर्तक वाक्य
असत् ( अलीक ) है और उस प्रकार वाक्य बाध दोष से बाधित है—ऐसा
कहा जाय तो यह ठीक नहीं क्योंकि शिव के द्वारा कथित वाक्य ही अन्य
प्रवर्तक वाक्यों का बाधक है जो युक्तिसिद्ध है और सर्वज्ञानोत्तर आदि
अनन्त प्रकार आगमों के द्वारा प्रमाणित हैं—इस विषय में आगे आलोचना
करेंगे। अतः वैदिक से आरम्भ कर पारमेश्वर सिद्धान्त रूपी तन्त्र जैसे
कुलोच्छुष्मादि शास्त्रों में कथित जो नियमरूपी विधि या निषेधात्मक
बातें हैं वे सभी यहाँ अकिञ्चित्कर हैं ! श्रीपूर्व आदि ग्रन्थों में ऐसा ही कहा
गया है—इसका विस्तृत विवरण तन्त्रालोक में अन्वेषण करना चाहिए।
× × ×
मैं जड़ हूँ, कर्मपाश से बद्ध हूँ, मलिन हूँ, दूसरे के द्वारा संचलित होता
हूँ पशु जीव का इस प्रकार जो निश्चय है इसके विपरीत सुदृढ़ निश्चयात्मक
निष्ठा की प्राप्तिरूपी सिद्धि आने पर वह उसी क्षण विश्वशरीर चिदात्मक
पतिस्वभाव को प्राप्त करता है ।
इस प्रकार निश्चय जैसे आ सकता है पर योगी सतत उस प्रकार
अनुसन्धान के लिए अवहित रहे । वस्तु के यथार्थरूप से हीन जो दृष्टि
है उससे शंकित होना नहीं चाहिए अर्थात् सन्देह में नहीं पड़ना चाहिए न
तो मूढ़ों के उपदेशों से भ्रमित होना चाहिए ।
× × ×
किसी का अध्यवसाय जैसे-जैसे स्फुट होता जायगा, उसका प्रभाव भी
तब उसी प्रकार होगा ॥
× × ×
मैं मलिन हूँ, मैं पशु हूँ, अथवा मैं सब भावमण्डल से भिन्न हूँ, इस
प्रकार दृढ़ निश्चय ने जिसके हृदय को मलिन कर रखा है उसमें कैसे
परत्व का प्रतिभास होगा ?
× × ×
परम शिवरूपी सूर्य किरणों से जिसके हृदय कमल तीव्र शक्तिपात