सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

तन्त्रसार (महामाहेश्वर अभिनवगुप्त - तन्त्रालोक का प्रामाणिक सार-संग्रह सटीक)

Tantrasara of Mahamaheshvara Abhinavagupta with Commentary

महामाहेश्वर अभिनवगुप्त द्वारा

DevanagariHindipublished294 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 294 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 110

आ. ४ ] तन्त्रसार-अभिनवगुप्त [ २९
आगम के अनुसार ( दीक्षा मिलती है ), इसकी सविस्तार आलोचना
शक्तिपात प्रकाशन नामक अध्याय में करेंगे । गुरु आगम के ( अर्थ )
निरूपण में व्यापार है, फिर आगम का कार्य शंकाहीन ( सन्देह रहित )
सजातीय ज्ञान की श्रृंखलाओं के उत्पादन के द्वारा उचित विकल्प (शुद्ध
विकल्प ) को उदित करना है । उन विकल्पों की श्रृंखला को ही सत्
तर्क कहते हैं । वैसे तर्कों को भावना कहते हैं जो अस्फुट भूत-विषय
( अतीत विषय ) को भी वर्तमान की तरह स्फुटता का आधान करते हुए
उसकी भावना की जाती है। इस विषय में शुद्धविद्या प्रकाशरूपी सत् तर्क
के अतिरिक्त अन्य कोई साक्षात् योगांग नहीं है । तपः¹ प्रभृति नियम
समूह, अहिंसा आदि यम के प्रकार, पूरक आदि प्राणायाम समूह केवल
वेद्य वस्तुओं में ही सीमित हैं अतः संवित् में उनका कोई उपयोग नहीं
है । प्रत्याहार² भी करण भूमि ( इन्द्रिय आदि ) में ही उत्कर्षता का
आधान करता है, ध्यान, धारणा, समाधि भी उत्तरोत्तर क्रम से
अभ्यास³ के द्वारा सम्पादित होने पर ध्येय वस्तु के साथ ध्यान करने
वाले को तदात्मता प्रदान करते हैं । लेकिन अभ्यास शिवस्वरूप परम
तत्त्व जो निज स्वभाव है उसमें सम्भव नहीं । संवित् में स्थित होकर ही
प्राण, बुद्धि, देह आदि में उत्कर्ष का आपादन ही अभ्यास का तात्पर्य
१. अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह ये पाँच यम के अन्तर्गत हैं । यम
साक्षात् रूप से संवित् में उपयोगी नहीं है । बोध-स्वभाव शिव-स्वरूप के
अधिगम के लिए प्राणायाम आदि की भी उपयोगिता स्वीकृत नहीं है ।
इस शास्त्र में इन सबको बाहरी आडम्बर कहा गया है ।
२. किसी विषय से अर्थात् रूपादि विषयों से इन्द्रियों को निवृत्त कराकर चित्त
स्वरूप में स्थित करना ही प्रत्याहार का लक्ष्य है, लेकिन संवित् सर्वव्यापक
है । अतः उसकी उपलब्धि सर्वत्र होना सम्भव है । इसी प्रकार धारणा,
ध्यान एवं समाधि भी नियताकार होने से परिच्छिन्न है, इसलिए ये
अपरिच्छिन्न संवित् के साक्षात्कार में उपयोगी नहीं हैं ।
३. हृदय में सचेतनता के साथ प्राण, बुद्धि और शरीर में जो-जो क्रियाएँ होती
हैं उसे अभ्यास कहते हैं । भारी वस्तु को उठाना, शास्त्रों का अनुशीलन
और उनका आशय ज्ञात करना, नृत्य और संगीत की चर्चा करने से
उत्तरोत्तर उनमें कुशलता उत्पन्न होती है । लेकिन बोध-स्वभाव संवित्
सदा ही एकरूप है । इसलिए अभ्यास से उसकी वृद्धि या ह्रास नहीं होती ।