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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 261 में से

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पृष्ठ 246

२४० तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली ३

न; उपलब्धुरनुपलभ्यत्वात् । | सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि जो
| ( जीव ) सबका द्रष्टा है वह देखा
| नहीं जा सकता ।
संसारधर्मविशिष्ट आत्मोप- | पूर्व०—सांसारिक धर्मोंसे युक्त
लभ्यत इति चेत् ? | आत्मा तो उपलब्ध होता ही है ?
न; धर्माणां धर्मिणोऽव्यति- | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है;
| क्योंकि धर्म अपने धर्मीसे अभिन्न
रेकात्कर्मत्वानुपपत्तेः, उष्णप्र- | होते हैं अतः वे उसके कर्म नहीं
| हो सकते, जिस प्रकार कि [ सूर्यके
काशयोर्दाह्यप्रकाश्यत्वानुपपत्ति- | धर्म ] उष्ण और प्रकाशका दाह्यत्व
| और प्रकाश्यत्व सम्भव नहीं है ।
वत् । त्रासादिदर्शनाद्दुःखित्वा- | यदि कहो कि भय आदि देखनेसे
| आत्माके दुःखित्व आदिका अनुमान
द्यनुमीयत इति चेत् ? न; त्रासा- | होता ही है—तो ऐसा कहना भी
| ठीक नहीं; क्योंकि भय आदि दुःख
देर्दुःखस्य चोपलभ्यमानत्वान्नो- | उपलब्ध होनेवाले होनेके कारण
| उपलब्ध करनेवाले [ आत्मा ] के
पलब्धृधर्मत्वम् । | धर्म नहीं हो सकते ।
कापिलकाणादादितर्कशास्त्र- | पूर्व०—परन्तु ऐसा माननेसे तो
| कपिल और कणाद आदिके तर्क-
विरोध इति चेत् ? | शास्त्रसे विरोध आता है ।
न; तेषां मूलाभावे वेद- | सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक
| नहीं; क्योंकि उनका कोई आधार
विरोधे च भ्रान्तत्वोपपत्तेः । | न होनेसे और वेदसे विरोध होनेसे
| भ्रान्तिमय होना उचित ही है । श्रुति
श्रुत्युपपत्तिभ्यां च सिद्धमात्म- | और युक्तिसे आत्माका असंसारित्व
| सिद्ध होता है तथा एक होनेके
नोऽसंसारित्वमेकत्वाच्च । | कारण भी ऐसा ही जान पड़ता है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri