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सर्वकोश
तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 261 में से

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पृष्ठ 189

अनु० ८ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८३
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नामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं
देवानामानन्दाः । स एक इन्द्रस्यानन्दः ॥ ३ ॥
श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतमिन्द्रस्या-
नन्दाः । स एको बृहस्पतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाका-
महतस्य । ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः । स एकः प्रजा-
पतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं
प्रजापतेरानन्दाः । स एको ब्रह्मण आनन्दः । श्रोत्रियस्य
चाकामहतस्य ॥ ४ ॥
इसके भयसे वायु चलता है, इसीके भयसे सूर्य उदय होता है
तथा इसीके भयसे अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है । अब यह
[ इस ब्रह्मके ] आनन्दकी मीमांसा है—साधु स्वभाववाला नवयुवक,
वेद पढ़ा हुआ, अत्यन्त आशावान् [ कभी निराश न होनेवाला ] तथा
अत्यन्त दृढ़ और बलिष्ठ हो एवं उसीकी यह धन-धान्यसे पूर्ण सम्पूर्ण
पृथिवी भी हो । [ उसका जो आनन्द है ] वह एक मानुष आनन्द है;
ऐसे जो सौ मानुष आनन्द हैं ॥ १ ॥ वही मनुष्य-गन्धर्वोंका एक
आनन्द है तथा वह अकामहत ( जो कामनासे पीड़ित नहीं है उस )
श्रोत्रियको भी प्राप्त है । मनुष्य-गन्धर्वोंके जो सौ आनन्द हैं वही
देवगन्धर्वका एक आनन्द है और वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है ।
देवगन्धर्वोंके जो सौ आनन्द हैं वही नित्यलोकमें रहनेवाले पितृगणका
एक आनन्द है और वह अकामहत श्रोत्रियको भी प्राप्त है । चिरलोक-
निवासी पितृगणके जो सौ आनन्द हैं वही आजानज देवताओंका एक
आनन्द है ॥ २ ॥ और वह अकामहत श्रोत्रियोंको भी प्राप्त है । आजानज
देवताओंके जो सौ आनन्द हैं वही कर्मदेव देवताओंका, जो कि
[ अग्निहोत्रादि ] कर्म करके देवत्वको प्राप्त होते हैं, एक आनन्द है और