तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished261 पृष्ठ
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अनु० ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८१
युक्तम् । सर्वं च जगद्भयवद् | होनेवाला भय सम्भव नहीं था ।
| किन्तु सारा ही संसार भययुक्त
दृश्यते । तस्माज्जगतो भयदर्श- | देखा जाता है । अतः जगत्को
| भय होता देखनेसे जाना जाता है
नाद्गम्यते नूनं तदस्ति भयकारण- | कि उसके भयका कारण उच्छेदका
मुच्छेदहेतुरनुच्छेद्यात्मकं यतो | हेतुभूत किन्तु स्वयं अनुच्छेद्यरूप
| ब्रह्म है, जिससे कि जगत् भय
जगद्विभेतीति । तदेतस्मिन्नप्यर्थ | मानता है । इसी अर्थमें यह श्लोक
एष श्लोको भवति ॥ १ ॥ | भी है ॥ १ ॥
इति ब्रह्मानन्दवल्ल्यां सप्तमोऽनुवाकः ॥ ७ ॥