तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Taittiriya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 134, कुल 261 में से
संदर्भ में पढ़ें१२८ तैत्तिरीयोपनिषद् [ वल्ली २
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परिकल्पित आत्मत्वेन प्राणमयः | है, प्राणमय है। प्राण-वायु उससे
प्राणो वायुस्तन्मयस्तत्प्रायः । तेन | युक्त अर्थात् तत्प्राय [ यानी उसमें
प्राणमयेनान्नरसमय आत्मैष पूर्णो | प्राणकी ही प्रधानता है ]। जिस
| प्रकार वायुसे धोंकनी भरी रहती है
वायुनेव दृतिः । स वा एष प्राण- | उसी प्रकार उस प्राणमयसे यह
| अन्नरसमय शरीर भरा हुआ है।
मय आत्मा पुरुषविध एव पुरुषा- | वह यह प्राणमय आत्मा पुरुषविध
| अर्थात् शिर और पक्षादिके कारण
कार एव, शिरःपक्षादिभिः । | पुरुषाकार ही है।
किं स्वत एव, नेत्याह । | क्या वह स्वतः ही पुरुषाकार
| है ? इसपर कहते हैं—नहीं,
[प्राणमयस्य] प्रसिद्धं तावदन्नरस- | अन्नरसमय शरीरकी पुरुषाकारता तो
[पुरुषविधत्वम्] मयस्यात्मनः पुरुष- | प्रसिद्ध ही है; उस अन्नरसमय-
विधत्वम् । तस्यान्नरसमयस्य पुरुष- | की पुरुषविधता—पुरुषाकारताके
| अनुसार साँचेमें ढली हुई प्रतिमाके
विधतां पुरुषाकारतामनु अयं | समान यह प्राणमय कोश भी
प्राणमयः पुरुषविधो मूषानिषिक्त- | पुरुषाकार है—स्वतः ही पुरुषाकार
प्रतिमावन्न स्वत एव । एवं पूर्वस्य | नहीं है। इसी प्रकार पूर्व-पूर्वकी
| पुरुषाकारता है और उसके अनुसार
पूर्वस्य पुरुषविधतामनूत्तरोत्तरः | पीछे-पीछेका कोश भी पुरुषाकार है;
पुरुषविधो भवति पूर्वः पूर्व- | तथा पूर्व-पूर्व कोश पीछे-पीछेके
श्चोत्तरोत्तरेण पूर्णः । | कोशसे पूर्ण ( भरा हुआ ) है।
कथं पुनः पुरुषविधतास्य | इसकी पुरुषाकारता किस प्रकार
| है ? सो बतलायी जाती है—उस
इत्युच्यते। तस्य प्राणमयस्य प्राण | प्राणमयका प्राण ही शिर है।
एव शिरः । प्राणमयस्य वायु- | वायुके विकाररूप प्राणमय कोशका
विकारस्य प्राणो मुखनासिका- | मुख और नासिकासे निकलनेवाला
| प्राण, जो मुख्य प्राणकी वृत्तिविशेष
निसरणो वृत्तिविशेषः शिर एव | है, श्रुतिके वचनानुसार शिररूपसे ही
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