तैत्तिरीय आरण्यक (सायण भाष्य एवं भट्टभास्कर भाष्य सहित सम्पूर्ण प्रथम भाग)

तैत्तिरीय आरण्यक (सायण भाष्य एवं भट्टभास्कर भाष्य सहित सम्पूर्ण प्रथम भाग)
Taittiriya Aranyaka with Sayanacharya Commentary
कृष्ण यजुर्वेदीय महर्षि मण्डल (भाष्यकार: श्रीमत् सायणाचार्य) द्वारा
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६८८ श्रीमत्सायणाचार्यविरचितभाष्यसमेतम्— [प्रपा०९अनु०१]
[*भृगुस्तस्मै॑ यतो विश॑न्ति तद्विजि॑ज्ञासस्व॒ त्रयो॑-
दशान्नं॑ प्रा॒णो मनो॑ वि॒ज्ञानं॒ द्वाद॑श द्वादशाऽऽ-
न॒न्दो दशान्नं॒ न नि॑न्द्यादन्नं॒ न प॑रिचक्षीतान्नं॑
ब॒हु कु॑र्वीतैकादशैकादश॑] न कंचनैंकषष्टि॑र्दश॑ ॥
स॒ह ना॑ववतु । स॒ह नौ॑ भुनक्तु । स॒ह वी॒र्यं॑ करवावहै ।
ते॒ज॒स्वि ना॒वधी॑तमस्तु॒ मा वि॑द्विषा॒वहै॑ ॥
ॐ शान्ति॒: शान्ति॒: शान्ति॑: + ।
हरिः ॐ ।
इति कृष्णयजुर्वेदीयतैत्तिरीयारण्यके नवमः प्रपा-
ठकः समाप्तः ॥ ९ ॥
वेदार्थस्य