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सर्वकोश
तैत्तिरीय आरण्यक (सायण भाष्य एवं भट्टभास्कर भाष्य सहित सम्पूर्ण प्रथम भाग)

तैत्तिरीय आरण्यक (सायण भाष्य एवं भट्टभास्कर भाष्य सहित सम्पूर्ण प्रथम भाग)

Taittiriya Aranyaka with Sayanacharya Commentary

कृष्ण यजुर्वेदीय महर्षि मण्डल (भाष्यकार: श्रीमत् सायणाचार्य) द्वारा

DevanagariSanskritpublished914 पृष्ठ

पृष्ठ 447, कुल 914 में से

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पृष्ठ 447

"
Wait, at the end of line 4: "कपि-" hyphenated!
Line 5:
"कपिवच्चेष्टाकारी मनुष्यः पुनस्तेजनमुत्तेजनं यथा भवति तथा बभास्ति दीपयति । तत्र"
Wait, is "तत्र" at the end of line 5?
In line 5: "तथा बभास्ति दीपयति । तत्र" -> only "त" is visible at the end of line 5!
Look at the end of line 5:
"भवति तथा बभास्ति दीपयति । त"
And line 6 starts with:
"दृष्टान्तः—गौरिव जरायु । यथा गौः स्वगर्भस्य रक्षार्थं जरायुपटं संपादयति न च"
Ah! "त" is at the end of line 5, and line 6 starts with "दृष्टान्तः"!
Wait, look at line 6: "दृष्टान्तः—गौरिव जरायु ।"
So "तद्" + "दृष्टान्तः" = "तद् दृष्टान्तः" or "तत्र दृष्टान्तः"?
It is "तद् दृष्टान्तः" or "तत्र दृष्टान्तः"?
Notice at the end of line 5: "। त" (just one letter त!).
And line 6: "दृष्टान्तः—गौरिव जरायु ।"
So "त-दृष्टान्तः" or "तद्दृष्टान्तः"!

Line 6:
"