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सर्वकोश
तैत्तिरीय आरण्यक (सायण भाष्य एवं भट्टभास्कर भाष्य सहित सम्पूर्ण प्रथम भाग)

तैत्तिरीय आरण्यक (सायण भाष्य एवं भट्टभास्कर भाष्य सहित सम्पूर्ण प्रथम भाग)

Taittiriya Aranyaka with Sayanacharya Commentary

कृष्ण यजुर्वेदीय महर्षि मण्डल (भाष्यकार: श्रीमत् सायणाचार्य) द्वारा

DevanagariSanskritpublished914 पृष्ठ

पृष्ठ 436, कुल 914 में से

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पृष्ठ 436

युवतिर्नित्यतरुणी दक्षिणावती कौशलयुक्ता सैषा पृथिवी,`

Line 13:
उपस्थे स्वोत्सङ्गे *निर्ऋत्या॑तः +पापदेवतायाः सकाशाद्धे लोष्ट त्वां पातु ।
Wait, why does निर्ऋत्या॑तः have an udatta on त्या?
Because in the mantra: निर्ऋ॑त्या उप॑स्थे or निर्ऋत्या॑! And footnote 1 says: १ क. ख. ॰त्याः स॑° ।Meaning in manuscripts क and ख, it reads:निर्ऋत्याः सकाशात्(withoutतः`)!

Line 17:
हे पृथिवि लोष्टमेनमूच्छ्वञ्चस्वोत्कर्षेण सुखयुक्तं कुरु । मा विबाधिथा अस्य
Wait, is it लोष्टमेनमूच्छ्वञ्चस्वोत्कर्षेण or लोष्टमेनमृच्छ्वञ्चस्व... or लोष्टमेनमूच्छ्वञ्चस्व... or लोष्टमेनमुच्छ्वञ्चस्वोत्कर्षेण?
Let's look closely at line 17:
लोष्टमेनमूच्छ्वञ्चस्वोत्कर्षेण -> wait, look at लोष्टमेनम:
लो ष्ट मे न मु च्छ्व ञ्च स्वो `