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सर्वकोश
तैत्तिरीय आरण्यक (कृष्ण यजुर्वेद - सायणभाष्य व हिन्दी अनुवाद)

तैत्तिरीय आरण्यक (कृष्ण यजुर्वेद - सायणभाष्य व हिन्दी अनुवाद)

Taittiriya Aranyaka Hindi

महर्षि वैशम्पायन द्वारा

स्रोत: Taittiriya Aranyaka with Sayana Bhashya and Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished940 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 940 में से

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पृष्ठ 174

१ प्रपाठके २७ अनुवाकः। १६६

वे॑द। अ॒मृते॑नावृ॒तां पु॑री॓म्। तस्मै॒ ब्रह्म॑ च॒ ब्रह्मा॑ च।
आयु॑: की॒र्तिं प्र॒जां द॑दुः॥^(९)। ^(१०)वि॒भ्राज॑माना॒ꣳ ह॒रि-
णी॓म्। यश॑सा॒ सम्परी॑वृताम्। पुर॑ꣳ हिर॒ण्मयी॓ं ब्र॒ह्मा॥ ३॥
वि॒वेशा॑परा॒जिता॓म्^(१०)। ^(११)परा॑ङेत्य॒ ज्याम॑यी। परा-


अथ षष्ठीमाह। ^(९)"यो वै तां ० प्रजां ददुः"^(९) इति।
'ब्रह्मणः' सत्यं ज्ञानमनन्तमित्यादिश्रुतिप्रतिपादितस्य वस्तुनः,
सम्बन्धिनी 'अमृतेन' परमानन्देन, 'आवृतां', 'तां पुरीं', 'यो
वै' यः कोऽपि पुमान्, 'वेद', 'तस्मै' विदुषे, 'ब्रह्म च' परमा-
त्मापि, 'ब्रह्मा च' प्रजापतिरपि, चकाराभ्यामन्येऽपि सर्वे देवा
आयुरादिकं प्रयच्छन्ति॥

अथ सप्तमीमाह। ^(१०)"विभ्राजमानाꣳ ० विवेशापरा-
जिता"^(१०) इति। 'ब्रह्मा' प्रजापतिः, 'पुरं' शरीरं, 'विवेश'
प्रविष्टवान्। कीदृशीं पुरं, 'विभ्राजमानां' विशेषेण राजमानां,
'हरिणीं' पापहरणशीलां, 'यशसा' जगत्स्रष्टृत्वलक्षणया
कीर्त्या, 'सम्परीवृतां' सम्यक् परिवेष्टितां, 'हिरण्मयीं' सुवर्ण-
निर्मितां, कदाचिदपि पराजयरहितां॥

अथाष्टमीमाह। ^(११)"पराङेत्य ज्यामयी ० सुरानुभयान्',
^(११) इति। 'विद्वान्' परब्रह्मतत्त्ववित्, 'पराङ्' पुनरावृत्तिर-
हितः, 'एति' ब्रह्मतत्त्वं प्राप्नोति। कीदृशो विद्वान्, 'अज्यामयी'