स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्याद्वादमंजरीमें निर्दिष्ट ग्रन्थ और ग्रन्थकार (२)
१ जैन--
भद्रबाहु-दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों सम्प्रदायोंके अनुसार भद्रबाहु श्रुतकेवली माने जाते हैं ।
भद्रबाहु महावीर-निर्वाणके १७० वर्ष बाद मोक्ष गये । उन्होंने आचारांग, सूत्रकृतांग, सूर्यप्रज्ञप्ति, उत्तरा-
ध्ययन, आवश्यक, दशवैकालिक, दशाश्रुतस्कंध, कल्पसूत्र, व्यवहार और ऋषिभाषित सूत्रोंपर नियुक्तियोंकी
रचना की है । दिगम्बर परम्परामें दो भद्रबाहु हुए हैं; दूसरे भद्रबाहु मौर्य चन्द्रगुप्तके समकालीन थे । प्रथम
भद्रबाहुका समय ईसाके पूर्व चौथी शताब्दि माना जाता है ।
आचारांग-द्वादशांग सूत्रोंमें सर्व प्राचीन ।
स्थानांग-द्वादशांगका तीसरा सूत्र ।
उत्तराध्ययन - उत्तराध्ययन चार मूल सूत्रोंमें प्रथम सूत्र । इसमें छत्तीस अध्ययन हैं। इनमें केशी-
गौतमका संवाद, राजीमतीका नेमिनाथको उपदेश करना, कपिलका जैन मुनिका शिष्यत्व, कर्मसे जाति
आदि महत्त्वपूर्ण विषयोंका वर्णन है ।
आवश्यक-मूल सूत्रोंमें दूसरा सूत्र । इसमें सामायिक, स्तव, वन्दन, प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग और
प्रत्याख्यान इन छह आवश्यकोंका वर्णन है । आवश्यक सूत्र बहुत प्राचीन है ।
निशीथचूर्णि—यह अनेक चूर्णियोंके रचयिता जिनदासगणि महत्तरकी कृति है । समय ई. स. ६७६
के लगभग ।
वाचकमुख्य-उमास्वाति ही वाचकमुख्यके नामसे कहे जाते हैं । इन्होंने तत्त्वार्थाधिगमसूत्र और
उसके ऊपर भाष्य लिखा है । उमास्वाति प्रशमरति, श्रावकप्रज्ञप्ति आदि ग्रंथोंके भी कर्ता हैं । उमास्वातिको
दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों सम्प्रदाय पूज्य दृष्टिसे देखते हैं । दिगम्बर इन्हें उमास्वामि कहते हैं, और
कुन्दकुन्द आचार्यके शिष्य अथवा वंशज मानते हैं। दिगम्बरोंके अनुसार तत्त्वार्थभाष्य उमास्वामिका बनाया
हुआ नहीं माना जाता । तत्त्वार्थाधिगम सूत्रोंमें दिगम्बर और श्वेताम्बर परम्पराके अनुसार पाठभेद पाया
जाता है । इन सूत्रोंपर दिगम्बर आचार्य पूज्यपाद, अकलंक, विद्यानन्द आदि तथा श्वेताम्बर आचार्य
सिद्धसेनगणि, हरिभद्र, यशोविजय आदिने टीकायें लिखी हैं। समय ईसवी सन्की प्रथम शताब्दि ।
सिद्धसेन दिवाकर- श्वेताम्बर सम्प्रदायके महान् तार्किक और प्रतिभाशाली विद्वान । सिद्धसेनने
प्राकृत भाषामें सन्मतितर्क तथा संस्कृतमें न्यायावतार और द्वात्रिंशद् द्वात्रिंशिकाओंकी रचना की है । सन्मति-
तर्कपर अभयदेवने, और न्यायावतारपर सिद्धर्षिने टीका लिखी है । सिद्धसेन अपने समयके महान स्वतंत्र
विचारक माने जाते थे । इन्होंने श्वेताम्बर आगमकी नयवाद और उपयोगवादकी मूल मान्यताओंका विरोध
कर अपने स्वतंत्र मतका स्थापन किया है । सिद्धसेनने वेद, तथा न्याय, वैशेषिक, बौद्ध और सांख्य दर्शनोंपर
द्वात्रिंशिकाओंकी रचना की है । पं. सुखलालजी सिद्धसेनका समय ईसवी सन्की चौथी शताब्दि मानते हैं ।
समंतभद्र-समंतभद्रका नाम दिगम्बर सम्प्रदायमें सुप्रसिद्ध है । सिद्धसेन श्वेताम्बर सम्प्रदायमें और
समन्तभद्र दिगम्बर सम्प्रदायमें आदिस्तुतिकार गिने जाते हैं। समन्तभद्रने रत्नकरण्डश्रावकाचार, आप्त-
मीमांसा, बृहत्स्वयंभूस्तोत्र आदि ग्रन्थोंकी रचना की है। सिद्धसेन और समंतभद्रकी कृतियोंमें कई श्लोक
समान रूपसे पाये जाते हैं। प्रायः सिद्धसेन और समंतभद्र दोनों समकालीन हैं। प्रो. के. बी. पाठकके अनु-
सार समंतभद्र ईसाकी आठवीं शताब्दिके पूर्वार्धमें, तथा पं. जुगलकिशोरजीके मतमें समंतभद्र सिद्धसेनके
पूर्ववर्ती हैं, और ईसाकी तीसरी शताब्दिमें हुए हैं।