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सर्वकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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उत्तरतंत्रम्

७७३

इस उदावर्त के लक्षण और चिकित्सा को विस्तार से

कहूंगा ॥५॥
त्रयोदशविधश्चासौ भिन्न एतैस्तु। कारणैः।
पूर्वक वातादि कारणों से भिन्न होने के कारण उदावर्त
तेह प्रकार का है।
अपथ्यभोजनान्चापि वद्यते च तथाऽपरः ॥६॥
अपथ्य भोजन के कारण जो उदावर्त होता है वह इनसे
भिन्न है, उसको अलग कहेंगे ॥६॥

आधमानशूलौ हृदयोपोरोधं
शिरोरुजं श्वासमतीव हिक्काम् ।

कासप्रतिशयायगलग्रहाश्व
बलासपित्तप्रसरं च घोरम् ॥७॥

कुर्यादपानोऽभिहतः स्वमागं
हन्यात् पुरीषं मुखतः क्षिपेद्वा ।

वातजन्य उदावर्त—अपने मार्ग में रुकी अपान वायु—
आधमान, शूल, हृदय, का अवरोध, शिर में दर्द, श्वास की
दुबि, हिक्का, कास, प्रतिशयाय, गलग्रह (टॉसिलायटिस), कफ
पित्त का प्रसरण, पुरीष क्षय या मुख से मल की प्रवृत्ति उत्पन्न
करता है ॥७॥

आटोपशूलौ परिकर्तनं च
सङ्गः पुरीषस्य तथोर्वचातः ॥८॥

पुरीषमास्यादपि वा निरेति
पुरीषवेगेऽभिहते नरस्य ।

पुरीष वेग को रोकने से—आधमान, शूल, कर्तन के
समान पीड़ा, मल का अवरोध, ऊर्ध्व वायु, अथवा मल की
मुख से प्रवृत्ति होती है ॥८॥

मूत्रस्य वेगेऽभिहते नरस्तु
कृच्छ्रेण मूत्रं कुरुतेऽत्यमल्पम् ॥९॥

मेह्नेगुदे वृद्धक्षणवस्तिमुष्क-
नाभिप्रदेशेऽव्यथावाऽदि मूर्ध्नि ।

आनन्दवस्तिश्च भवन्ति तीव्रा
शूलाश्च शूलैरिव भिन्नमूर्तः ॥१०॥

मूत्र वेग को रोकने से—मनुष्य मूत्र का कठिनाई से थोड़ा
थोड़ा त्याग करता है। मेहन, गुद, वंक्षण, वस्ति, अण्ड, नाभि-
प्रदेश, अथवा शिर में, तीव्र वेदना होती है, मूत्राशय में गति
नहीं होती है, शरीर दृढता प्रतीत होता है, कांटों के जुभने
के समान शूल-सा होता है ॥९, १०॥

मन्यागलस्तम्भशिरोविकारा
जुम्भोपघातात् पवनात्मकाः स्युः ।

श्रोत्राननघ्राणविलोचनोत्था
भवन्ति तीव्राश्च तथा विकाराः ॥११॥

जुम्भा के रोकने से—मन्यास्तम्भ, गल-स्तम्भ, शिरोरोग,
कम्प, सुप्ति आदि वात रोग, कान-नाक-मुख और आँखों के
मयानक रोग उत्पन्न होते हैं ॥११॥

आनन्दजं शोकसमुद्भवं वा
नेत्रोदकं प्राप्तसमुच्चतो हि ।

शिरोगुरुत्वं नयनामयाश्च
भवन्ति तीव्राः सह पोतसेन ॥१२॥

अश्रुजन्य उदावर्त—आनन्द के कारण या शोक के
कारण से उत्पन्न आँखों को रोक लेने से शिर में भारीपन,
मयानक नेत्र रोग, पीनस उत्पन्न होते हैं ॥१२॥

भवन्ति गाढं क्षयथोविघाता-
च्छिरोक्षिनासाश्रवणेषु रोगाः ।

कण्ठास्पपूर्णस्वमतीव तोदः
कूजश्च वायोरुत वाऽप्रवृत्तिः ॥१३॥

छीक को रोकने से—शिर, नाक, आंख, और कान में
मयानक रोग होते हैं। कण्ठ और मुख वायु से भरे रहते हैं,
गले और मुख में तीव्र व्यथा, कराहना, अथवा उल्लूवास का
अवरोध होता है ॥१३॥

उद्गारवेगेऽभिहते भवन्ति
घोरा विकाराः पवनप्रसृताः ।

उद्गार को रोकने से कम्प, हिक्का आदि वातजन्य
मयानक रोग होते हैं।

छर्द्विघातेन भवेरुच कुष्ठ
येनैव दोषेण विदग्धमलम् ॥१४॥

छर्दि के रोकने से—जिस दोष के कारण अन्न विदग्ध
हुआ होता है, उसी दोष की अधिकतावाला कुष्ठ उत्पन्न होता
है। (चकार से अरोचक आदि होते हैं) ॥१४॥

मूत्राशये पायुत्ति मुष्कयोश्च
शोफो रजो मूत्रविनिग्रहश्च ।

शुक्राशमरी तत्त्ववर्ण भवेद्वा
ते ते विकारा विहते तु मुक्के ॥१५॥

शुक्र के उपस्थित वेग को रोकने से—मूत्राशय, गुद,
मुष्क में शोफ, पीड़ा होती है, मूत्र का अवरोध, शुक्राशमरी,
शुक्र का क्षरण, हृत्पीड़ा, अंगमर्द आदि शुक्रवेगावरोधजन्य
रोग होते हैं ॥१५॥

तन्द्राङ्गमर्दरुचिचिभ्रमाः स्युः
जुष्माऽभिघातात् कृशता च हृष्टः ।

भूख के उपस्थित वेग को रोकने से—तन्द्रा, अंगों का
द्रुढता, अरुचि, चक्कर आना, दृष्टि की निर्बलता होती है।
(कार्यदर्बल्यवेवर्ण्यमंगमर्दोऽरुचिभ्रमः लुद्ववेगनिग्रहात्....)।

कण्ठास्पशोषः श्रवणावरोध-
स्तृष्णाभिघाताद्बुध्दये व्यथा च ॥१६॥

तृष्णा को रोकने से—गले और मुख में शोष, बहरापन,
हृदय में पीड़ा (श्रम-स्वेद आदि) होती है ॥१६॥

शान्तस्य निःश्वासविनिग्रहेण
हृद्दोगमोहाव्यथाऽपि गुल्माः ।