सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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उत्तरतन्त्रम्
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निराहारस्य यस्यैव तीव्रं शूलमुदर्यते ।
प्रस्तब्धगात्रो भवति कृच्छ्रणेच्छवसितीव च ॥८२॥
वातमूत्रपुरीषाणि कृच्छ्रणे कुरुते नरः ।
पतैर्लिङ्गैर्विजानीयाच्छूलं वातसमुद्भवम् ॥८३॥
वातजशूल—विना भोजन के जिसको तीव्रशूल उत्पन्न होता है, शरीर कठोर—(स्तब्ध) हो जाता है, कठिनाई से श्वास आता है, वायु मल मूत्र कठिनाई से जिसे प्रवृत्त होते हैं, इन लक्षणों से वातजन्य शूल समझे ॥८३॥
तृष्णा दाहो मदो मूच्छर्वा तीव्रं शूलं तथैव च ।
शीताभिकामो भवति शीतेनैव प्रशाम्यति ॥८४॥
पतैर्लिङ्गैर्विजानीयाच्छूलं पित्तसमुद्भवम् ।
प्यास, दाह, मद, मूच्छर्वा, तीव्रशूल, शीत को चाहना और शीतल उपचार से शूल का शान्त होना इन लक्षणों से पित्तजन्य शूल समझे ॥८४॥
शूलैनोत्पीड्यमानस्य हृत्प्रास उपजायते ॥८५॥
अतीव पूर्णकोष्ठत्वं तथैव गुरुगात्रता ।
एतच्छूलैः समसुत्थस्य शूलस्योक्तं निदर्शनम् ॥८६॥
शूल से पीड़ित मनुष्य को जी मचलाना (वमन प्रवृत्ति) होता है, कोष्ठ का अतिशय भरा होना, अंगों में भारीपन, ये कफजन्यशूल के लक्षण हैं । ८५, ८६॥
सर्वाणि दृष्ट्वा रूपाणि निदिदेशत्सान्निपातिकम् ।
सन्निपातसमुत्थानमसाध्यं तं विनिदिशेत् ॥८७॥
शूलानां लक्षणं प्रोक्तं
सब लक्षणों को देखकर सान्निपातिक शूल को समझे । सन्निपातजन्य शूल असाध्य कहा है । शूलों के लक्षण कह दिये हैं ।
वक्तव्यं निर्वेद्य—“वातात्मकं वस्तिगतं वदन्ति पित्तात्मकं चापि वदन्ति नाभ्याम् । हृत्प्राशर्वकुक्षौ कफसन्निविष्टं, सर्वेषु देशेषु च सन्निपातात्” ॥८७॥
चिकित्सां तु निबोध मे ।
आमुकारी हि पवनस्तस्मात् स्वरया जयेत् ॥८८॥
तस्य शूलाभिपन्नस्य स्वेद एव सुखावहः ।
मुखा से चिकित्सा को सुनो—वायु शीघ्रकारी है, इसलिये सबसे प्रथम वायु को ही शान्त करे । इसलिये शूल से पीड़ित व्यक्ति को स्वेद ही सुखदायक होता है ॥८८॥
पायसेः क्रशरापिण्डेः स्निग्धघैर्वा पिशितैर्हितः ॥८९॥
दूध में पकाये चावलों से, तिल-तण्डुल-उड़द से बनाई क्रशरा से, स्निग्ध द्रव्यों से सेक करना उत्तम है ॥८९॥
त्रिवृच्छाकेन वा स्निग्धमुष्णं भुञ्जीत भोजनम् ।
चिरबिल्वानुकराद् वापि तैलभृष्टास्तु मक्षयेत् ॥९०॥
वैहंगाश्च रसान् स्निग्धान् जांगलान् शूलपीडितः ।
यथात्माभं निषेवेत मांसानि बिलशायिनाम् ॥९१॥
स्निग्ध एवं उष्णं भोजन को निशोथ के शोक से खाये । नाटाकरज के कोमल पत्तों को तैल में भूनकर खाये । जांगल पक्षियों (बटेर तीतर आदि) के स्निग्ध मांस रसों को शूल पीड़ित खाये । बिल में रहनेवाले—सेह, शल्लक आदि में जो मिल सके, उनके मांस को खये ॥९०, ९१॥
सुरा सौवीरकं चुक्रं मस्तूदधितथा दधि ।
सकाललवणं पेयं शूलं वातसमुद्भवम् ॥९२॥
वातजन्य शूल में—सुरा, कांजी, चुक (शुक्त), मस्तू, उदधित (आधे जल का तक), दही, काला लवण (काला नमक) मिलाकर पीना चाहिये ।
वि० मन्तव्य—सुरा आदि में से जो भी उपलब्ध हो उसमें काला लवण मिलाकर प्रयोग करे । आज के सोडा वाटर तथा सोडा वाटर युक्त सुरा पीने का यही सूत्र है ॥९२॥
कुल्लथयूषो युक्तान्तो ठावकीयूषसंस्कृतः ।
ससैन्यवः समरिचो वातशूलविनाशनः ॥९३॥
बटेर के यूष से संस्कृत, अनारदाना से परिमाण में खड़ा किया, सैन्यव और मरिच युक्त कुल्लथी का यूष वातशूल को नष्ट करता है ॥९३॥
विडंगशिम्रुकपिप्लपध्याश्यामात्मलेवतसान् ।
सुरसामश्चमूर्त्री च सौवर्चलयुतान् पिवेत् ॥९४॥
मध्येन वातजं शूलं क्षिप्रमेव प्रशाम्यति ।
विडंग, सुहांजना, कमीला, हरड, निशोथ, अम्लवेतस, तुलसी, अश्वमूर्त्री (शल्लकी), सौवर्चल इनको मद्य के साथ पीये, इससे वातजशूल शीघ्र शान्त होता है । (अश्वमूर्त्री के स्थान पर अश्वकर्ण भी पाठ है) ॥९४॥
पृथ्वीकाजाजिचविकायवानीव्योषचित्रकाः ॥९५॥
पिप्लप्यः पिप्लीसूलं सैन्यवं चेति चूर्णयेत् ।
तानि चूर्णानि पयसा पिवेत् काश्चलकेन वा ॥९६॥
मध्वासवेन चुक्केण सुरासौवीरकेण वा ।
अथवे (चैव) तानि चूर्णानि मातुलुंगरसेन वा ॥९७॥
तथा बव्रयूषेण भावितानि पुनः पुनः ।
तानि हिङ्गुप्रगाढानि सह शकैरया पिवेन् ॥९८॥
सह दाडिमसारणेन वर्तिः कार्या भिषगजिता ।
सा वर्तिवार्तिकं शूलं क्षिप्रमेव व्यपोहति ॥९९॥
गुडतैलेन वा लौढा पीता मध्येन वा पुनः ।
पृथ्वीका (हिण्गुत्री), जीरा, चविका, अजवायन, त्रिकुट, चित्रक, पिप्ली, पिप्लीसूल, सैन्यव इनका चूर्ण करे । इस चूर्ण को पानी से या काश्चलिक यूष (दधि-मस्तू अम्ल सिद्ध) से, मध्वासव से, चुक (शुक्त) से, सुरा से अथवा कांजी से पीये । अथवा पृथ्वीका आदि के चूर्णों को बिजौर के स्वरस से, बेर के यूष से बार बार भावित करके, प्रचुर मात्रा में हींग मिला-