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सर्वकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 762

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मुमुक्षुसंहिता

[ अ० ४० ]

नाशक, श्रमनाशक तथा वातव्याधिहर है। इसके अवलेह आदि योग बनाये जाते हैं ॥१२६॥

बिल्बमध्यं समधुर्कं शर्कराक्षौद्रसंयुतम् ।

तण्डुलान्मुखुयुतो योगः पित्तरक्तोत्थितं जयेत् ॥१२७॥

बिल्ब की मजा, मुलेहटी, शर्करा, मधु इनको चावल के धोवन के साथ लेने से पित्तरक्तजन्य अतिसार को नष्ट करता है ॥१२७॥

योगान् साम्राहिकांश्चान्यानं पिवेतस्क्षौद्रशर्करान् ।

न्यग्मोधादिषु कुर्याच्छ च पुटपाकान् यथेतिदान् ॥१२८॥

पित्तातिसारोक्त अन्य साम्राहिक योगों को मधु और शर्करा के साथ पीये। कहे हुए अनुसार न्यग्मोधादि द्रव्यों से पुटपाक बनाये ॥१२८॥

गुदपाके च ये उक्तास्तेऽत्रापि विधयः स्मृताः ।

गुदपाक में जो सेकादि कहे हैं, वे पित्तरक्तजन्य अतिसार में भी हितकारी हैं।

रुजायां चाप्रशाम्यन्तयां पिच्छावस्तिहितो भवेत् ॥१२९॥

वेदना के शान्त न होने पर पिच्छावस्ति हितकारी है ॥

सक्तविद्धु दोषबहुलं दीप्तान्गिनयोंऽतिसायेते ।

विद्धङ्गत्रिफलाकृष्णकपायैस्तं विरेचयेत् ॥१३०॥

अथवैरण्डसिद्धेन पयसा केवलं वा ।

यवाग्वितरेच्छास्य वातन्नेदीपनैः कृताः ॥१३१॥

जो रोगी अग्नि के प्रदीप्त होने पर विवद्ध मल को, प्रचुर मात्रा में प्रवाहित करता हो, उसे विडंग, त्रिफला, पिप्पली के कपाय से विरेचन देवे। अथवा ऐरण्ड तैल से सिद्ध केवल दूध से विरेचन देवे। शालिपर्णी आदि वातध्न एवं दीपनीय द्रव्यों से बनाई यवागू इसको देवे ॥१३०, १३१॥

दीप्तान्निष्पुरीषो यः सार्यते फेनिलं शकृतः ।

स पिवेत् फाणिं शुण्टोदधिर्तैलपयोधुतम् ॥१३२॥

दीप्तान्नि पुरुष मल से रहित क्षागदार (मल में केवल क्षाग ही) प्रवाहित करता हो, वह राव, सोंठ, दधि, तैल, दूध और घी इनको मिलाकर पीये। (इल्हण के मत से यह निश्चारक का लक्षण है) ॥१३२॥

स्विन्नानि गुडतैलाभ्यां भक्षयेद् बदराणि च ।

उबाले हुए बेरों को गुड़ और तैल से खाये।

स्विन्नानि पिष्टवद्वाऽपि समं बिल्बशलादुभिः ॥१३३॥

बेरों को और कच्चे बिल्ब को पिष्ट स्वेदन विधि से स्विच्छ करके शीतल होने पर गुड़ और तैल से खाये। (पिष्ट-स्वेद-गुजरात में जिस प्रकार ढोकरा बनाते हैं, छलनी में रखकर भाप से ही पकाये)।

वि० मन्तव्य—यह बेर तथा बिल्बगिरि के दोनों योग बेर का तथा बिल्ब का मुरम्बा ही हैं अथवा उनके रूपान्तर हैं ॥

दध्नोपगुज्य कुल्माषान् श्वेतामनुपिवेत् सुराम् ।

कुल्माषां (आधे उबले जौ) को दही के साथ खाकर, पिही से बनी सुरा को पीछे से पीये।

शशमांसं सरुधिरं समङ्गां सघृतं दधि ॥१३४॥

खादेद्विपच्य सेवेत् मृद्वन्नं शकृतः क्षये ।

मल के क्षय में—खरगोश के मांस और रक्त के साथ, कोमल अन्न (उड़द आदि) और लाजवन्ती को पकाकर घी और दही के साथ खाये। (माष-मल करनेवाले हैं, माषो बहु-मलो वृष्यः) ॥१३४॥

संस्कृतो यमके माषयवकोलरसः शुभः ॥१३५॥

भोजनार्थं प्रदातव्यो दधिदाडिमसाधितः ।

उड़द, जौ और बेर का क्वाथ घी और तैल में संस्कृत करके, दही और अनारदाने से बघारकर भोजन के लिये देना चाहिये ॥१३५॥

बिद्धं बिल्बशलाद्वनि नागरं चाम्लपेषितम् ॥१३६॥

दध्नः सरश्च यमके भृष्टो वर्चःक्षये हितः ।

विडनमक, कच्चे बिल्ब, सोंठ इनको कांजी से पीसकर-दही की मलाई मिलाकर घी और तैल में भूनकर वर्चःक्षय (मलक्षय में) में उत्तम है ॥१३६॥

सशूलं क्षीणवर्चा यो दीप्तान्गिनरितिसार्यते ।

स पिवेदीपनैर्युक्तं सर्पिः संग्राहकैः सह ॥१३७॥

जो क्षीणपुरीष मनुष्य अग्नि के दीप्त होने पर शूल के साथ मलत्याग करता हो वह चित्रकादि दीपन एवं घातकी, बिल्बशलादु आदि संग्राहक औषधियों के साथ अपक्व घृत पीये।

वि० मन्तव्य—निष्पुरीष = निकल चुका पुरीष जिसका (श्लो० १३२) शकृतः क्षये = पुरीष का क्षय हो जाने पर (श्लो० १३४), वर्चःक्षये = वर्चस् अर्थात् पुरीष का क्षय हो जाने पर (श्लो० १३६) आदि वाक्य उस दशा के लिये प्रयुक्त हैं। जब पुरीष पूर्ण रूप से निकल जाता है और शरीर के द्रव घातु (अर्थात् घातु श्लो० ६) ही निकल रहे होते हैं ॥

वायुः प्रवृद्धो निचितं बलासं

नुदत्त्यधस्तादहिताशनस्य ।

प्रवाहमाणस्य मुहुर्मैलाक्तं

प्रवाहिकां तां प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥१३८॥

अहित भोजन करनेवाले पुरुष में बढ़ी हुई वायु संचित कफ को गुद मार्ग से प्रेरित करती है। प्रवाहण करते हुए बार-बार मल से मिला कफ बाहर आता है, इसको वैद्य लोग प्रवाहिका कहते हैं।

वि० मन्तव्य—प्रवाहिका—यह शब्द—वायु—बिलोडने घातु (भ्वादि आ० सेट्) से बनाया जाय और “प्रवाहिका” पदा जाय अथवा वाह प्रयत्ने घातु (भ्वा आ० से०) से बनाया जाय या बना समझा जाय तो सार्थक