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सर्वकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 686, कुल 872 में से

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पृष्ठ 686

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मुमुक्षुसंहिता

[ अ० १० ]

“कृष्णसर्पवसाक्षौद्रं रसो धान्या रसक्रिया ।
शस्ता सर्वाक्षिरोगेषु काचावुर्दमलेषु च ॥” च० ॥३५॥
प्रत्यञ्जनं स्रोतसि यत्समुत्थितं
क्रमद्रसक्षीरघृतेषु भावितम् ।

स्रोतोजन को क्रम से मांस रस (चतुष्प मुग पक्षी मांस रस—गीघ, मोर आदि), दूध, और घी में भावित करके प्रत्य-
यंजन (अंजन के पीछे जो बरतते हैं, तीक्ष्ण अञ्जन के पीछे मृदु
अञ्जन या मृदु अञ्जन के पीछे तीक्ष्ण अञ्जन) बरते ।

स्थितं दशहत्रयमेतन्ञ्जनं
कृष्णोर्गस्त्ये कृञ्जसंप्रवेष्टिते ॥३६॥

तन्माळतीकोरकसैन्धवायुतं
सदाऽञ्जन स्यात्तिमिरेऽथ रागिणि ।

सुभावितं वा पयसा दिनत्रयं
काचापहं शाळविदः प्रचक्षते ॥३७॥

कुशा से लपेटे हुए काले साँप के मुख में इस अञ्जन को
धरकर एक मास रख देवे फिर निकालकर चमेली की कलियों
और सैन्धव में मिलाये । इसे रागवाले (रंगवाले) तिमिर में
सदा बरते । अथवा दूध से तीन दिन भली प्रकार भावित
करके काच को यह नष्ट करता है, ऐसा शाळविद कहते हैं ।

“वदने कृष्णसर्पस्य निहितं मांसमञ्जनम् ।

ततस्तस्मादसमुदृश्य सुसुन्दमं चूर्णयेद् बुधः ॥

सुमनःकोरकैः शुक्लैरर्धशैः सैन्धवेन च ।

एतन्नेत्रांजनं कार्यं तिमिरन्मुत्तमम् ॥ चरक

इसमें चमेली की कलियाँ अञ्जन आधी और सैन्धव की
मात्रा दोष के अनुसार बरते ॥३६,३७॥

हविर्हितं क्षीरभवं तु पैत्तिके

बदन्ति नस्ये मधुरीषधैः कृतम् ।

तत्तर्पणे चैव हितं प्रयोजितं

सजाङ्गलस्तेषु च यः पुटाह्वयः ॥३८॥

दूध को मथकर निकाले घृत को काकोल्यादि मधुरराग को
औषधियों से संस्कृत करके पैत्तिक तिमिर में नस्य देना चाहिये ।
इस घृत का अक्षितर्पण में भी प्रयोग करे । मधुर औषधियों
में—जांगल मांस रस का बनाया पुटपाक पित्तज तिमिर में
स्नेहन के लिये उत्तम है ॥३८॥

रसाञ्जनक्षौद्रसितामनःशिलाः

बुद्राञ्जनं तन्मधुकेन संयुतम् ।

रसौत, मधु, शर्करा, मेनसिल, मुलेहृठी इनकी रसक्रिया
पित्तज तिमिर में उत्तम है ।

रसस्त्रानं वा कनकाकरोद्भवं

सुचूर्णितं श्रेष्ठमुगन्ति तद्विदः ॥३९॥

कनकाकरोद्भव (तुर्य) के बराबर सुरमा मिलाकर चूर्ण
करे । यह पित्तज तिमिर में श्रेष्ठ अञ्जन है ॥३९॥

भिल्लोटगन्धोदकसेकसेचितं

प्रत्यञ्जने चात्र हितं तु तुल्यकम् ।

भिल्लोट (लोघ), एलादिगण, इनके कषाय में विक्षित
किये तुर्य का प्रत्यंजन इसमें उत्तम है ।

समेष्वृद्धाञ्जनभागसमितं

जलोद्भवं काचमलं व्यपोहति ॥४०॥

मेवधृंगी, सौवीरांजन (सुरमा), उन दोनों के समान भाग
स्रोतांजन मिलाकर अञ्जन करने से काचमल नष्ट होता है ।
(जलोद्भवम—शंख ऐसा कई मानते हैं) । मेवधृङ्गी को उलूण
नेजीयापोता जैसा वृक्ष लिखा है ॥४०॥

पलाशरोहीतमधुकजा रसाः

क्षौद्रेण युक्ता मदिराप्रमिश्रिताः ।

दाक, रोहेड़ा, महुआ इनका रस मधु और मदिरा के
ऊपरी भाग के साथ मिलाकर अञ्जन करे ।

वक्तव्य—उलूण ने इनको समान भाग लेकर—रसक्रिया
बनाकर मधु मिलाकर बरतने को कहा है ।

उशीरलोघत्रिकलाप्रियकुभिः

पचेत् नस्यं कफरोगग्रान्तये ॥४१॥

खस, लोघ, त्रिकला, प्रियगु, इनसे तिल तैल सिद्ध करे ।
कफ रोग की शान्ति के लिये नस्य देवे ॥४१॥

विडङ्गपाठाकिणिहीकुदीत्वचः

प्रयोजयेद् धूमसुशीरसंयुताः ।

विडंग, पाठा, चिरचिटा, हिंगोट की छाल, खस इनसे
कफज तिमिर में धूमपान करे ।

वनस्पतिकवाथविपाचितं घृतं

हितं हरिद्रान्तलदे च तर्पणम् ॥४२॥

बरगद आदि क्षीर वृक्षों के क्वाथ में हल्दी और बालक
का कल्क मिलाकर सिद्ध किया घृत अक्षितर्पण में उत्तम है ॥

समागधो माक्षिकसैन्धवाब्दः

सजाङ्गलः स्यात् पुटपाक एव च ।

पिप्पली, मधु, प्रचुर मात्रा में सैन्धव, जांगल पशुपक्षियों
का मांस इनसे बनाया पुट पाक कफज तिमिर में उत्तम है ।

मनःशिलाज्यूपणशंखमाक्षिकैः

ससिन्धुकासीसरसाञ्जनेः क्रियाः ॥४३॥

मेनसिल, त्रिकुट, शंख, मधु, सैन्धव, कासीस, रसौत,
इनमें चौगुणा जल मिलाकर रस किया बनाये । इसे कफज
तिमिर में बरते ॥४३॥

हिते च कासीसरसाञ्जने तथा

बदन्ति पथ्ये गुडनागरैर्युते ।

कासीस, रसौत, गुड और साँठ इनकी रस किया अञ्जन
के रूप में बरतनी हितकारक है ।