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सर्वकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० १० ]

उत्तरतन्त्रम्

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पित्तस्यन्दे पैचिके चाधिमन्थे
रक्ताखावः अंसनं चापि कार्यम् ।
अदृग्गोः सेकालेपनस्याङ्जनानि
पैत्ते च स्याद्यद्विसर्पं विधानम् ॥३॥

पित्तमिष्यन्द में पित्तजन्य अधिमन्थ में-रक्ताखाव, विरे-
वन, आँखों पर परिषेक, आलेप, नस्य और अंजन करने
चाहिये। पित्त विसर्प की चिकित्सा (उशीर, लाम्बक चन्द-
नानि-आदि) करे ॥३॥

गुन्द्रां शालिं शैवलं शैलभेदं दार्वीमैलासुत्पलं रोघ्रमभ्रम् ।
पद्मपात्रं शर्करां दर्भमिष्ठुं तालं रोध्रं वेतसं पद्मकं च ॥
द्राक्षां क्षौद्रं चन्दनं यष्टिकाह्वं
योषित्क्षीरं राज्यनन्ते च पिष्ठा ।
सर्पः सिद्धं तर्पणे सेकनस्ये
अस्तं क्षीरं सिद्धमेतेषु बाजम् ॥५॥
योग्यो वर्गो व्यस्त एषोऽन्यथा वा
सम्यङ्जनस्येऽष्टार्धसंख्येऽपि नित्यम् ।

गुन्द्रा (एरक, घावाजरिया-गुजराती), शाली, शैवल
(सेवाल या दूर्वा), पाषाणभेद, दारुहल्दी, इलायची, कमल,
लोघ, मोथा, कमलपत्र, शर्करा, दाम, इच्छु, ताल (मुसली या
ताड), लोघ, वेत, पद्माल, द्राक्षा, मधु, चन्दन, मुलेहटी, धावन
(ब्री का दूध), हल्दी, सारिवा इनको पीसकर, ईख के रस में
(द्रव कार्य ईख के रस से) घृत सिद्ध करे। यह घृत अक्षि
तर्पण, सेक, नस्य में उत्तम है। इसी प्रकार इन द्रव्यों में सिद्ध
किया बकरी का दूध भी उत्तम है। इन द्रव्यों को अलग अलग,
या सब मिलाकर, चार प्रकार के नस्य में (प्रतिमर्ष, अवपीड,
नस्य, विरोविरेचन) बरतना चाहिये ॥४,५॥

क्रियाः सर्वाः पित्तहर्षः प्रशस्ता-
स्व्यहाशोघ्वं क्षीरसर्पिश्च नस्यम् ॥६॥
इस पित्तज अभिष्यन्द में पित्तनाशक सब उपचार करे,
तीन दिन के पीछे, दूध से निकाले घी का नस्य देवे ॥६॥

पालाशं स्याच्छोणितं चाङ्जनार्थं
शस्त्रक्या वा शर्कराक्षौद्रयुक्तम् ।
डाक अथवा पलाश के रस में (डाक के फूल के रस में)
शर्करा और मधु मिलाकर अंजन करे।

रसक्रियां शर्कराक्षौद्रयुक्तां
पालिन्धां वा मधुके वाऽपि कुर्यात् ॥७॥
कालीनिशोथ या मुलेहटी की रसक्रिया बनाकर, शर्करा,
मधुमिलाकर अंजन करे।

वक्तव्य—एहीला क्वाथकल्पेन क्वाथं पूतं पुनः पुनः ।
क्वाथयेत् फाणिताकारमेघां प्रोक्ता रसक्रिया ॥७॥

मुस्ता फेनः सागरस्योत्पलं च
कृमिच्छैलाधात्रिबीजाद्रसश्च ।

मुस्ता, समुद्रफेन, कमल, वायविडंग, आंवला, विजयसार,
इनके क्वाथ से रस किया बनाये ॥

तालीशैलागैरिकोशीरशङ्खै-
रेवयुक्त्यादङ्खनं स्तन्यपिष्टैः ॥८॥
तालीश, इलायची, गेरु, खस, शंख इनको धावन में
पीसकर अंजन करे ॥८॥

चूर्णं कुर्यादङ्जनार्थं रसो वा
स्यन्योपैता धातकीस्यन्दनाभ्याम् ।
धातकी और सांदन इनको धावन में मिलाकर या इनसे
रस किया बनाकर अंजन करे।

योषित्तन्तयं शातकुम्भं विघृष्टं
क्षौद्रोपेतं कैशुकं चापि पुष्पम् ॥९॥
सुवर्ण को धावन में घिसकर, या ढाक के फूलों को मधु में
मिलाकर (ताम्र पात्र में) अंजन करे ॥९॥

रोध्रं द्राक्षां शर्करासुत्पलं च
नायौः क्षीरे यष्टिकाह्वं वचां च ।
पिष्ठा क्षीरे वर्णकस्य त्वचं च
तोयोनिमिश्रे चन्दनोदुम्बरं च ॥१०॥

लोघ, द्राक्षा, शर्करा, कमल, मुलेहटी, वच इनको धावन
में पीसकर अंजन करे। अमलतास की छाल को धावन में
पीसकर अंजन करे। बालक, चन्दन, गूजर इनको वस्त्र की
पोटली में बाँधकर पानी में भिगोकर आश्च्योतन करे ॥१०॥

कार्यः फेनः सागरस्याङ्जनार्थं
नारीस्तन्ये माझिके चापि घष्टः ।
योषित्तन्त्ये स्थापितं यष्टिकाह्वं
रोध्रं द्राक्षां शर्करासुत्पलं च ॥११॥

क्षौमाबद्धं पथ्यमाश्च्योतने वा
सर्पिघृष्टं यष्टिकाह्वं सरोभ्रम् ।
तोयोनिमिश्राः काश्मरीधात्रिपथ्या-
स्तद्वृच्छवाहुः कटफलं चाम्बुनैव ॥१२॥

समुद्रफेन को धावन और मधु में घिसकर अंजन करे।
मुलेहटी, लोघ, द्राक्षा, शर्करा, कमल इनको धावन में
रखकर (पीसकर) अंजन करे। अथवा इनको रेशम के (झीने)
वस्त्र में बाँधकर धावन में भिगो-भिगोकर आश्च्योतन करे।
मुलेहटी और लोघ को घिसकर, घी मिलाकर (घी में भिगो-
भिगोकर) आश्च्योतन करे। गम्भारी, आंवला, हरड, इनकी
पोटली पानी में भिगोकर आश्च्योतन कर। कायफल का
जल से ही आश्च्योतन करे (पोटली में बाँधकर, पानी में भिगो-
कर आँख पर रखे) ॥१२,१३॥

एषोऽम्लाख्येऽनुक्रमश्चापि शुक्तौ
कार्यः सर्वः स्यात्सिरासोक्षवर्ष्यः ।
अम्लाध्युषित और शुक्ति में भी यही सम्पूर्ण चिकित्सा
करें, परन्तु सिरामोक्षण न करे।