सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ ३०८ ]
विश्वामित्रो नृपवरः कदाचिदपिसत्तमम् ।
वशिष्ठं कोपयासास राःवाऽऽश्रमपदं किञ्च ॥६०॥
कुपितस्य मुनेस्तस्य लळाटात् स्वेव विन्दवः ।
अपतन् दर्शनादेव रवेस्तत्समतेजसः ॥६१॥
तृणे महर्षिणा लूने वेन्वर्थं संभूतेऽपि च ।
ततो जातास्त्विमा घोरा नानारूपा महाविषाः ।
अपकाराय वर्तन्ते नृपसाधनवाहने ॥६२॥
यस्मात्लूने प्राप्ता मुनेः प्रस्वेदविन्दवः ।
तस्मात्लूनेति भाष्यन्ते सङ्ख्यया तावन्न पौण्ड्र ॥६३॥
कभी पुरातन काल में विश्वामित्र राजा ने ऋषियों में श्रेष्ठ वशिष्ठ ऋषि को उनके आश्रम में जाकर कुपित किया था । रवि के समान तेजस्वी उन मुनि के कुट्ट होने पर उनके दर्शन मात्र से ही स्वेद के कण माथे पर से गिर पड़े । ये स्वेदविन्दु गाय के लिये काटकर इकट्ठे किये घास पर पड़े, इन विन्दुओं से ये महाविष नानाप्रकार की लतायें उत्पन्न हुई हैं । राजा के साधन, वाहन के अपकार के लिये (विश्वामित्र को नुकसान करने के लिये) ये लतायें बढ़ने लगीं । क्योंकि वशिष्ठ मुनि के स्वेद कण कटे घास पर पड़े, इसलिये इनको लता कहते हैं । इनकी संख्या सोलह है ॥६०-६३॥
कृच्छ्रसाध्यास्तथाऽसाध्या लूतास्तु द्विविधाः स्मृताः ।
तासामष्टौ कृच्छ्रसाध्या वयर्थास्तावत्य एव तु ॥६४॥
त्रिमण्डला तथा श्वेता कपिला पीतिका तथा ।
आलमूत्राविषा रक्ता कसना चाष्टमो स्मृता ॥६५॥
तामिर्दण्डे शिरोदुःखं कण्डुदंशे च वेदना ।
भवन्ति च विशेषेण गदा श्लैष्मिकवातिकाः ॥६६॥
सौवर्णिका लाजवर्णा जालिन्येणपीद्वी तथा ।
कृष्णाऽनिवर्णा काकाण्डा मालागुणाऽष्टमौ तथा ॥६७॥
तामिर्दण्डे दंशकोथः प्रवृत्तिः क्षतजस्य च ।
ज्वरो दाहोऽतिसारश्च गदाः स्युश्च त्रिदोषजाः ॥६८॥
पिडका विविधाकारा मण्डलानि महान्ति च ।
महान्तो मृदवः शोका रक्ता रथावाश्चलास्तथा ॥६९॥
सामान्यं सर्वलूतानामेतदादंशलक्षणम् ।
लता दो प्रकार की हैं, कष्टसाध्य और असाध्य । इनमें आठ कष्टसाध्य और आठ ही असाध्य हैं । इनके नाम- त्रिमंडला, श्वेता, कपिला, पीतिका, आलविषा, मूत्रविषा, रक्ता और कसना ये आठ हैं । इनके काटने पर शिरो-वेदना, दंश स्थान पर कण्डु, वेदना तथा विशेष करके कफ-वातजन्य रोग होते हैं । सौवर्णिका, लाजवर्णा, जालिनी, एणीपदी, कृष्णा, अनिवर्णा, काकाण्डा, और मालागुणा ये आठ हैं । इनके काटने पर दंश स्थान का सड़ना, रक्त का बहना, ज्वर, दाह, अतिसार और त्रिदोष जन्म रोग होते हैं । नानाप्रकार की पिडकायें, बड़े-बड़े मण्डल (चकत्ते), बड़ी और कोमल लाल, रथाव, एवं फैलेवाली सूजन होती है । सब लताओं के काटने पर ये लक्षण सामान्य रूप में होते हैं ॥
विशेषलक्षणं तासां वद्यामि सचिकित्सितम् ॥१००॥
त्रिमण्डलाया दंशेऽसूक्तं कृष्णं स्रवति दीर्घते ।
वायिर्यं कलुषा दृष्टितस्था दाहश्च नेत्रयोः ॥१०१॥
तत्राकर्मूलं रजनी नाकुली पुरिनर्पणिका ।
पानकर्मणि जस्यन्ते नस्यालेपाञ्जनेषु च ॥१०२॥
श्वेतायाः पिडका दंशे श्वेता कण्डुमती भवेत् ।
दाहमूर्च्छाज्वरवती विसर्पकलेदरुक्करी ॥१०३॥
तत्र चन्दनरास्तैलाहरेणुनलवञ्छलाः ।
कुष्ठं लामञ्जकं वक्रं नलदं चागदो हितः ॥१०४॥
आदंशे पिडका ताम्रा कपिलायाः स्थिरा भवेत् ।
शिरसो गौरवं दाहस्तिमिरं भ्रम एव च ॥१०५॥
तत्र पद्मककुष्ठेलाकरञ्जककुभत्त्वचः ।
स्थिराकर्मण्यपामागदंवाबाह्यो विषापहाः ॥१०६॥
आदंशे पीतिकायास्तु पिडका पीतिका स्थिरा ।
भवेच्छाद्विज्वरः शूलं मूर्ध्नि रक्ते तथाऽक्षिणी ॥१०७॥
तत्रेष्टाः कुटजोशोरतुञ्जपद्मकवञ्छलाः ।
शिरीषकिणिहीशुलकदम्भककुभत्त्वचः ॥१०८॥
रक्तमण्डनिभे दंशे पिडकाः सर्पाणा इव ।
जायन्ते तालुशोषश्च दाहश्चालविषादिते ॥१०९॥
तत्र प्रियङ्कुहोवैरकुष्ठलामञ्जवञ्जुलाः ।
अगदः शतपुष्पा च सर्पिपलवटाङ्कुराः ॥११०॥
पूतिमूर्त्रविषादंशो विसर्पा कृष्णशोणितः ।
कासरवासवमीमूर्च्छाज्वरदाहसमन्वितः ॥१११॥
मनःशिलालमधुकुष्ठचन्दनपद्मकैः ।
मधुमिश्रैः सलामञ्जैरगदस्तत्र कीर्तितः ॥११२॥
आपाण्डुपिडको दंशो दाहकलेदसमन्वितः ।
रक्ताया रक्तपर्यन्तो विज्ञेयो रक्तसंयुतः ॥११३॥
कायस्तत्रागदस्तोयचन्दनोशीरपद्मकैः ।
तथैवाजुनशेल्भ्यां त्वग्भिराम्रातकस्य च ॥११४॥
पिच्छिलं कसनादंशादुधिरं शीतलं स्रवेत् ।
कासश्चासौ च तत्रोक्तं रक्तलूताचिकित्सितम् ॥११५॥
इनके विशेष लक्षण और चिकित्सा को कहता हूँ । त्रिमण्डला के काटने पर काला रक्त बहता है, दंश कटा होता है । बहरापन, दृष्टि का मेल्ला होना, नेत्रों में दाह होता है । इसमें आक की जड़, हल्दी, रास्ता, पुरिनपर्णी इनका उपयोग पीने में, नस्य में, आलेप में और अंजन में करे । श्वेता के दंश में श्वेत वर्ण एवं खाजवाली पिडका होती है । इसमें दाह, मूर्च्छा, ज्वर, विसर्प, कलेद, पीड़ा होती है । इसमें चन्दन, रास्ता, इलायची, हरेणु, नल, जलवेतस, कूट, खस, तगर, मासी, इनका अगद हितकारी है । कपिला लता के दंश में ताम्रवर्ण की एवं स्थिर पिडका होती है । शिर में भारीपन, दाह, तिमिर और भ्रम होता है । इसमें पद्माख, कुष्ठ, इलायची, करंज, अजुन की छाछ, शालपर्णी, अकंपर्णी, चिरचित्पा,