सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४० ]
अत एवं शयानस्य शुद्धयर्थं स्वेदयेच्छिरः ।
संस्वेद्यं नासामुत्क्रम्य वामेनाङ्गुष्ठपवर्णना ॥
हस्तेन दक्षिणेनाथ कुर्यादुभयतः समम् ।
प्रणाख्या पिचुना वाऽपि नस्तः स्नेहं यथाविधि ॥
कृते च स्वेदयेद् भूयः आकर्षेच्च पुनः पुनः ।
तस्तेनैव श्लेष्मणा सार्थं तथा स्नेहो न तिष्ठति ॥
स्वेदेनोत्क्लेशितः श्लेष्मा नस्तः कर्मण्युपस्थितः ।
भूयः स्नेहस्य शैत्येन विरसि स्याथते पुनः ॥
चरक सि० अ० ६।६८-१०४
(३) दत्तमात्रे नस्ये कर्णललाटकेशभूमिगण्डमन्यास्कन्धपाणिपादतलान्त्यनुमुखं मर्दयेत् । शनैः शनैः च उन्मिळय्यात् ॥
तस्य प्रमाणमष्टौ विन्दवः प्रदेशिनीपर्वद्वयनिःसृताः प्रथमा मात्रा, द्वितीया शक्तिः, तृतीया पाणिशक्तिः, इत्येतान्तिष्ठो मात्रा यथाबलं प्रयोय्याः ॥२८॥
स्नेह की मात्रा आठ विन्दु है। प्रदेशिनी अंगुली के दो पर्व स्नेह में डुबोकर उनसे निकली आठ बूंद प्रथम मात्रा है। दूसरी मात्रा शक्ति है, तीसरी मात्रा पाणिशक्ति (६४ बूंद) है। ये तीन मात्राएँ बल के अनुसार देनी चाहिये। (प्रथम मात्रा दोनों नासा में १६, मध्यम-३२, उत्तम ६४ है) ॥२८॥
स्नेहनस्य नोपगिलेत्कथंचिदपि बुद्धिमान् ॥२९॥
शृङ्गाटकमभिप्लान्य निरेति वदनाद्यथा ।
कफोत्कलेशमयाच्छनैव निष्ठोवेदविधारयन् ॥३०॥
बुद्धिमान् मनुष्य स्नेह नस्य को किसी प्रकार भी न निगले। यह स्नेह नस्य शृंगारक मर्म तक फैलकर मुख से निकल जाता है। कफ के उत्कलेशित होने के भय से इसको वाम-दक्षिण पार्श्व में बिना रोके थूक देवे।
वक्तव्य—कहीं कहीं नासिका से स्नेह पान भी है, यथा-क्षीणं मांसं बलं यस्य वातात्तिश्वोर्बज्जुजा। सुदीप्तानिः स्नेह-सात्म्यः स नस्यं नासया पिबेत् ॥ धातुंश्च तप्येहेहं पीतं नस्यं तु नस्यतः ॥ (२) अनम्यवहरंश्च वामदक्षिणपार्श्वयोः निष्ठोवेत् । एकपार्श्वोवने न सर्वाः सिरा भेषजेन सम्यग् व्याप्यान्ते ॥
दत्ते च पुनरपि संस्वेद्य गलकपोलादीन् धूमसासेवेत्, भोजयेच्छनैवमभिष्यन्दि, ततोऽस्याचारिकमादिशेत्, रजोधूमस्नेहात्पमघद्रवपानशिरःभ्रनानातियानकोधादीनि च परिहरेत् ॥३१॥
नस्य देने के उपरान्त फिर से गले, कपोल आदि पर स्वेद देकर धूम का सेवन करे। इसको अभिष्यन्दि भोजन देवे। इसके पीछे इसको आचारिक (नियम पालन) कर्म बताये। धूल, धूम, स्नेह, धूप, मद्य, द्रवपान, शिरः स्नान, बहुत सवारी, क्रौध आदि को छोड़ देवे ॥३१॥
तस्य योगातियोगायोगानामिदं विज्ञानं भवति ॥३२॥
लाघवं शिरसो योगे सुखस्वप्नं प्रबोधनम् ।
विकारोपजमः शुद्धिरिन्द्रियाणां मनःसुखम् ॥३३॥
कफप्रसेकः शिरसो गुरुतेन्द्रियविभ्रमः ।
लक्षणं मूर्धन्यतिस्तिगन्धं रूक्षं तत्रावचारयेत् ॥३४॥
अयोगे वातवैगुण्यमिन्द्रियाणां च रूक्षता ।
रोगाशान्तिश्च तत्रेष्टं भूयो नस्यं प्रयोजयेत् ॥३५॥
नस्य के योग, अतियोग, अयोग, के लक्षण ये हैं। नस्य के सम्यग् योग में शिर में लघुता, सुख से सोना, नींद आना और जागना, रोगों की शान्ति, इन्द्रियों की निर्मलता, मन का सुख होता है। शिर का अतिस्नेहन होने से-कफ का गिरना, शिर में भारीपन, इन्द्रियों का विभ्रम होता है। इसमें रूक्ष उपचार करे। अयोग में—वायु की विपरीतगति, इन्द्रियों की रूक्षता, रोग का शान्त न होना होता है, इसमें पुनः नस्य देना चाहिये ॥३२-३५॥
चत्वारो विन्दवः षड् वा तथाऽष्टौ वा यथाबलम् । शिरोविरेकस्तेहस्य प्रमाणमभिनिर्दिशेत् ॥३६॥ शिरोविरचन स्नेह की मात्रा चार, छै या आठ बूंद (प्रतिनासापुट के लिये) है, इनको बल के अनुसार बरतना चाहिये ॥३६॥
नस्ये त्रीण्युपदिष्टानि लक्षणानि प्रयोगतः ।
शुद्ध (द्वि) हीनातिसंज्ञानि विशेषाच्छाच्छचित्तकैः ॥३७॥
लाघवं शिरसः शुद्धिः क्षोतसां व्याधिनिर्जयः ।
चित्तेन्द्रियप्रसादश्च शिरसः शुद्धिलक्षणम् ॥३८॥
कण्ठपदेहौ गुरुता क्षोतसां कफसंस्वः ।
मूर्धनि हीनविशुद्धे तु लक्षणं परिकीर्तितम् ॥३९॥
मस्तुलुङ्गामसो वातशुद्धिरिन्द्रियविभ्रमः ।
शून्यता शिरसश्चापि मूर्धनि गाढविरेचिते ॥४०॥
हीनातिशुद्धे शिरसि कफवातघ्नमाचरेत् ।
सस्यग्विशुद्धे शिरसि सर्पिनस्यं निषेचयेत् ॥४१॥
(एकान्तरं द्व्यन्तरं वा समाह्वं वा पुनः पुनः ।
एकविंशतिरात्रं वा यावद्वा साधु मन्यते ॥४२॥
भारुतेनाभिभूतस्य वाऽत्यन्तं यस्य देहिनः ।
द्विकालं चापि दातव्यं नस्यं तस्य विज्ञानता) ॥४३॥
शास्त्रविन्तकों ने प्रयोग की दृष्टि से नस्य के तीन लक्षण—शुद्ध, हीन और अतियोग रूप से कहे हैं। शुद्ध के लक्षण—शिर में लघुता, क्षोतों की निर्मलता, रोग की शान्ति, मन और इन्द्रियों की निर्मलता, यह शिर की शुद्धि का लक्षण है। हीन शुद्धि में क्षोतों में कण्ठ, मल (कफ) वृद्धि, भारीपन, कफ का वहना, शिर का हीन शोधन होने पर ये लक्षण होते हैं। शिर का अतिविरचन (शोधन) होने पर मस्तुलुङ्ग का आना, वात की वृद्धि, इन्द्रियविभ्रम, शिर में रक्तता होती है।