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सर्वकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 543

अ० २५ ]

चिकित्सास्थानम्

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शुक्र और मन का क्षय (ग्लानि) होता है। खड़े होकर मैथुन करने पर शुक्र की हानि और वायु का कोप होता है। अतिमैथुन से शोष, शुक्र-क्षय होता है। रोगी पुरुष के मैथुन करने पर प्लीहा के रोग, मृत्यु या मूर्च्छा होती है। प्रातःकाल में या आधीरात में मैथुन करने पर ( क्रमशः ) वात, पिचकुपित होते हैं। तिर्यग्गोन ( वकरी आदि ) में या अयोनि में, दूषित योनि में मैथुन करने से उपदंश, वायु का कोप और शुक्र का क्षय होता है। मल-मूत्र के या शुक्र के उपस्थित वेग को धारण करने से तथा चित लेटकर ( अधः स्थितः पुमानुत्तानः तदुपरिस्थिता नारी-अनुत्ताना ), मैथुन करने से शुक्रारमरी क्षीण उत्पन्न-हो जाती है। इसलिये इन सब उपरोक्त बातों से बचे, ये दोनों लोकों ( इहलोक, परलोक ) में गहिराई हैं। उपस्थित शुक्र को कभी भी अज्ञान के कारण रोकना नहीं चाहिये। ( शुक्वेग-निरोधः पाण्ड्यकराणाम्—चरक )।

वि० मन्तव्य—मूर्धावरणमेव च— शिरन के मूर्धमणि पर आवरण चढ़ाना—जैसे फ्रेंच लेदर आदि का उपयोग सन्तति निरोधार्थ किया जाता है, सुना है कि इससे नर-नारी दोनों को हानि पहुँचती है। यथा दाक्षिणात्याः कृतकर्मणि कार्यन्ति इति जज्जराचार्यः—अर्थात् बनावटी शिरन का प्रयोग न करे। वात्स्यायन काम सूत्र अधिकरण ७ अ० २ में “अपद्रव्य” नाम से इसका उल्लेख है। बलवान् अपि वर्जयेत्—अत्यन्त मैथुन सामर्थ्य होने पर भी ऐसा न करे। अकामा—अकामा के साथ संसर्ग करना “बलात्कार” कहलाता है, जो दण्डविधान में अपराध माना गया है। क्रीडायां अपि.....परिवर्जयेत्—अर्थात् केवल क्रीडा के लिये—खेल २ में मैथुन करना उचित नहीं, यथा कुछ नर-नारियाँ परस्पर मित्र बनकर इस कर्म को करने में संकोच नहीं करते, आयुर्वेद-स्वास्थ्य शास्त्र हैं। वह केवल उत्तम सन्तान के लिये ही मैथुन का उपदेश करता है, यथा— सन्तोऽपि आहुः अपर्यायं दमत्स्योः संगतं रहः।

दुरपत्यं कुलाङ्गारो जातं गोत्रे महत्यपि ॥

अ० ६० श० अ० १

अतएव वन्ध्या के साथ भी संसर्ग का निषेध किया गया है ॥१२६॥

वयोरूपगुणोपेतं तुल्यशीलां कुलान्विताम् ॥१३०॥

अभिकामोऽभिकामं तु हृष्टो हृष्टामलङ्कृताम् ।

सेवेत-प्रमदं युक्त्या वाजीकरणञ्च हितः ॥१३१॥

भक्ष्याः सशर्कराः क्षीरं ससितं रस एव च ।

स्नानं सव्यजनं स्वप्नो व्यवाधान्ते हितानि तु ॥१३२॥

वय, रूप, गुण से युक्त, समान स्वभाववाली, उत्तम कुल-युक्ता, चाहवाली, कामेच्छावाली ( वृषसन्ती—सकामाम् इति ढल्लन ), प्रसन्न, अलंकृत ( शृंगार की हुई ), स्त्री के साथ, वाजीकरण औषधियों से पुष्ट प्रसन्न मन मनुष्य युक्ति के साथ

सहवास करे। मैथुन के पीछे, शर्करा मिश्रित भक्ष्य ( खाद्य ), शर्करा ( मिश्री ) मिला दूध, मांवरस, स्नान, पंखे की वायु, सोना उत्तम है ॥१३०-१३२॥

वक्तव्य—‘स्नानं सशर्करं क्षीरं रसो भक्ष्याश्च गौडिकाः। व्यजनं स्वप्नसेवा च व्यवाधान्ते हितानि तु ॥ रात्रि में स्नान कठिन है, फिर भी प्रातःस्नान विषेय है। मैथुन के वुरन्त पीछे स्नान ठीक नहीं। शरीर के स्वस्थ हो जाने पर ( साधारणतः दो या तीन घण्टे के पीछे ) स्नान करना चाहिये।

वि० म०—सव्यजनं स्नानं, पंखा करके मैथुन जन्य श्रम दूर हो जाने पर स्नान करने से कोई हानि नहीं, अपितु लाभ होता है। स्नानं सशर्करं क्षीरं भक्ष्यं ऐसवसंस्कृतम्। वातो मांसरसः स्वप्नो वुरतान्ते हिता अमी ॥ भा० प्र० पू० खं प्रकरण ४। स्नानानुलेपनहिमानिलखण्डखाद्यशीताम्युदुग्धरस-यूषसुराप्रसन्नाः। सेवेत चानुशयनं विरतं रतस्य तस्यैवमाशु वपुषः पुनरेति धाम ॥ वामभट्ट ॥१३०-१३२॥

मुखमात्रं समासेन सद्वृत्तस्येवदौरितम् ।

आरोग्यमायुरर्थो वा नासन्दिः प्राप्यते नृभिः ॥१३३॥

यह सद्वृत्त केवल प्रधानरूप में दिग्दर्शन रूप से कहा है। अनाचारवाले मनुष्य आरोग्य आयु और धन प्राप्त नहीं कर सकते ॥१३३॥

इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थानेऽनागतावाध-

चिकित्सितं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥२४॥

पञ्चविंशतितमोऽध्यायः

अथातो मिश्रकचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

अब इसके आगे मिश्रक चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥

पाल्यामयास्तु विष्ठाया इत्युक्तं प्राङ्निबोध तान् ।

परिपोटस्तथोत्पात उन्मन्यो दुःखवर्धनः ॥३॥

पञ्चमः परिलेही च कर्णपाल्यां गदाः स्मृताः ।

विष्ठावण्ण के योग्य पाली के जो रोग हैं, उनको मुझसे सुनो। परिपोट, उत्पात, उन्मन्य, दुःखवर्धन और परिलेही ये पाँच कर्णपाली के रोग कहे हैं ॥३॥

सौकुमार्याच्चिरोत्सृष्टे सहसाऽभिप्रवर्धते ॥४॥

कर्णशोफो भवेत् पाल्यां सरुजः परिपोटवान् ।

कृष्णारुणनिभः स्तब्धः स वातात् परिपोटकः ॥५॥

गुर्वाभरणसंयोगात्तान्द्रार्धणादिपि ।

शोफः पाल्यां भवेच्छूयावो दाहपाकरुगन्वितः ॥६॥

रक्तो वा रक्तपिताभ्यासुत्पातः स गदो मतः ।

बलाद्धर्षयतः कर्णे पाल्यां वायुः प्रकुप्यति ॥७॥