सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० २१ ]
खिति प्राणो तावत् कार्यां प्रतिक्रिया । कदाऽपि दैवयोगेन दद्या-
रिष्टोऽपि जीवति ॥ इस न्याय से चिकित्सा कही है ॥४८-५६॥
धात्र्याः स्तन्यं शोधयित्वा बाले साध्याऽहिपूतना ।
पटोलपत्रत्रिफलारसाञ्जनविपाचितम् ॥५८॥
पीतं घृतं नाजयति कृच्छ्राम्प्यहिपूतनाम् ।
त्रिफलाकोलखदिरकषायं व्रणरोपणम् ॥५८॥
कासीसरोचनातुत्थहरितालरसाञ्जनैः ।
लेपोऽन्म्लपिष्टो बंदरीत्वग्वा सैन्धवसंयुता ॥५९॥
कपालतुत्थजं चूर्णं चूर्णकाले प्रयोजयेत् ।
चिकित्सैन्मुष्ककच्छं चाप्यहिपूतनामवत् ॥६०॥
बालक के अहिपूतना रोग में धात्री के दूध का शोधन
करके चिकित्सा करे । परबल के पत्ते, त्रिफला, रसौत (धात्रीके)
दूधसाथ्य अहि पूतना को भी अच्छा कर देता है । त्रिफला बेर,
खैर इनका कषाय व्रण का रोपण करता है । कासीस, हल्दी,
तुत्थ, हस्ताल, रसौत इनको कांजी में पीसकर अथवा बेर की
छाल सैधवनमक इनको कांजी में पीसकर लेप करे । रोपण काल
में मिट्टी के ठोकरे का चूर्ण और तुत्थ का चूर्ण लिङ्गके । मुष्क
कच्छ की चिकित्सा अहि पूतना और पामा की मांति करे ॥६०॥
गुदभ्रंशं गुदं स्विन्नं स्नेहाभ्यक्तं प्रवेशयेत् ।
कारयेद् गार्फणाबन्धं मध्यन्निच्छ्रद्रेण चर्मणा ॥६१॥
वितिगमार्थं वायोश्च स्वेदयेच्छ च सुदुर्मुदुः ।
क्षीरे महत्पञ्चमूलं मृषिकां चान्नवजिताम् ॥६२॥
पक्त्वा तस्मिन् पचेत्तैलं वातघ्नोषधसंयुतम् ।
गुदभ्रंशमिदं कृच्छ्रं पानाभ्यङ्गात् प्रसाधयेत् ॥६३॥
गुदभ्रंश में गुदा पर स्वेदन करके स्नेह से गुदा को
स्निग्ध करके अन्दर प्रविष्ट करे । फिर बीच में छेद रखकर
चमड़े की पट्टी बांध दे । वायु निकलती है, इसलिये उदर पर
बार-बार स्वेद देवे । अन्न रहित चुहिया को, महत्पञ्चमूल को
दूध में पकाये । इस दूध में वातनाशक औषधियों के साथ तैल
सिद्ध करे । इस तैल के पीने और अभ्यङ्ग से कष्ट साथ्य गुद-
भ्रंश भी अच्छा होता है ॥६१॥
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने बुद्धरोगचिकित्सितं
नाम विंशोऽध्यायः ॥२०॥
एकविंशतितमोऽध्यायः
अथातः शूकदोषचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
अब इसके आगे शूकदोष चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे-
जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ।
वि० मन्तव्य—शूक दोषों का वर्णन नि० स्या० अ० १४
में देखिये ॥१,२॥
संलिख्य सर्षर्पी सम्यक् कषायैरवचर्णयेत् ।
कषायैर्वेव तैलं च कुर्वीत व्रणरोपणम् ॥३॥
सर्षर्पी में भली प्रकार लेखन करके कषाय वृक्षों के चूर्ण से
अवचूर्णन करे (मिश्रकोक्त शोधन कषाय द्रव्यों के चूर्ण को
लिङ्गके ) । रोपणसाथ्य कषाय द्रव्यों के कल्क से जल में तैल
सिद्ध करे, यह व्रण रोपक है ॥३॥
अष्टोलिकां जलौकोभिर्ग्राहयेच्छ पुनः पुनः ।
तथा चानुपशाम्यन्तीं कफप्रन्थिवदुद्धरेत् ॥४॥
अष्टोलिका में बार-बार जाँक लगाये । इससे भी रोग
शान्त न हो तो कफ ग्रन्थि के समान शस्त्र से इसको काटकर
निकाल देवे ॥४॥
स्वेदयेद् ग्रथितं शस्त्रमाडीस्वेदेन बुद्धिमान् ।
सुखोष्णैरुपनाहैश्च सुस्निग्धैरुपनाहयेत् ॥५॥
कुम्भीकां पाकमापन्नां भिन्द्याच्छुद्धां तु रोपयेत् ।
तैलेन त्रिफलालोघ्रतिन्दुकाभ्रातकेन तु ॥६॥
ग्रथित को बुद्धिमान् वैद्य निरन्तर नाडी स्वेदसे स्वेद देवे ।
अतिशय स्निग्ध एवं सुहाते हुए गरम उपनाहो से इसको बाँधे ।
पकी हुई कुम्भिका को चौरें । शोधन करके इसका रोपण
करे । रोपण के लिये त्रिफला, लोघ, तिन्दुक और अम्बाड़ा
इनसे चौगुने जल में तैल सिद्ध करे ॥५,६॥
ग्राहयित्वा जलौकोभिरलजीं सेचयेत्ततः ।
कषायैस्तेषु सिद्धं च तैलं रोपणमिष्यते ॥७॥
अलजी को जाँक लगाकर पिल्लन आदि कषाय वृक्षों के
कषाय से परिषेक करे । इन कषाय वृक्षों के कषाय में सिद्ध
तैल रोपण के लिये उत्तम है ॥७॥
बलातैलेन कोष्णेन मृदितं परिषेचयेत् ।
मधुरैः सर्पिषा स्निग्धैः सुखोष्णैरुपनाहयेत् ॥८॥
मृदित को गुनगुने बला तैल से परिषेक करे । काकी-
ल्यादि मधुर द्रव्यों को घी से स्निग्ध करके सुहाता हुआ गरम
उपनाह बाँधे ॥८॥
संमूढपिडिकां क्षिप्रं जलौकोभिरुपाचरेत् ।
भिन्त्वा पर्यागतां चापि लेपयेत् क्षौद्रसर्पिषा ॥९॥
संमूढ पिडिका में तुरन्त जाँक लगाये । पक जाने पर चौर-
कर, मधु और घी से लेप करे ॥९॥
अवमन्ये गते पाकं भिन्ने तैलं विधीयते ।
धवाश्वकर्णपत्तङ्गसल्लकीतिन्दुकीकृतम् ॥१०॥
क्रियां पुष्करिकायां तु जीतां सर्वां प्रयोजयेत् ।
जलौकोभिर्हरेन्चासूक् सर्पिषा चावसेचयेत् ॥११॥
स्पर्शहान्यां हरेद्रक्तं प्रदिद्यान्मधुरैरपि ।
क्षीरेक्षरससर्पिभिः सेचयेच्छ सुजीतलैः ॥१२॥