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सर्वकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 475

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चिकित्सास्थानम्

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गोलक के बीजों के चूर्ण को मधु के साथ, भेड़ के दूध में घोलकर सात दिन पीने से अश्मरी नष्ट होती है ॥१२॥

द्रव्याणां तु घृतोत्क्रान्तां क्षारोऽविमूत्रगालितः ॥२०॥

प्राप्यसत्त्वशक्त्याहारैः संयुक्तः साधितः अतैः ।

तत्रोषकादिशाखापः कार्यक्षिकदुकान्वितः ॥२१॥

एष क्षारोऽश्मरीं गुल्मं शर्करां च भिन्नस्यपि ।

घृतों के लिये कहे वर्गों के द्रव्यों को लेकर तिल नालों से जलाकर, इनको भेड़ के मूत्र में घोलकर छान लेवे । इसमें गाय-वकरी आदि प्राप्य पशुओं के गोबर-लीद आदि को जलाकर बनाया क्षार, मिलाकर इनको धीरे धीरे पकाये । पकाते समय इसमें ऊषकादिगण का प्रचोप और त्रिकुट मिला दे । यह क्षार अश्मरी को, गुल्म को, शर्करा को नष्ट करता है ॥२०, २१॥

तिलापामार्गकदलीपलाशयवल्कजः ॥२२॥

क्षारः पेयोऽविमूत्रेण शर्करां नाशानः परः ।

तिल, त्रिरचित, कला, ढाक, जौ के तुष, इनका क्षार, भेड़ के मूत्र से पीना चाहिये । यह शर्करा को नष्ट करता है । (क्षार की मात्रा दो कर्ष या तीन कर्ष लेकर-दो पल मूत्र से पीये) ॥

पाटलाकरवीराणां क्षारमेवं समाचरेत् ॥२३॥

पाटला और करवीर (कनेर) के क्षार को भी इसी प्रकार

भेड़ के मूत्र से बरते ॥२३॥

श्वदृष्ट्यायष्टिकाब्राह्मोक्लकं वाऽक्षसमं पिवेतु ।

गोलक, मुलेहटी और ब्राह्मी का कल्क एक कर्ष मात्रा में भेड़ के मूत्र से पीये ।

सहैडकाख्यौ पेयौ वा शोभाञ्जनकमार्कवौ ॥२४॥

पनवाड़, सुहाजना और भांगरा इनको भेड़ के मूत्र से पीये ॥

कपोतबंका मूलं वा पिवेदम्लैः सुरादिभिः ।

तत्सिद्धं वा पिवेतु क्षौरं वेदनाभिरुपदुतः ॥२५॥

कपोतबंका (ब्राह्मी या सुवर्चला) का मूल, कांजी आदि अम्ल द्रवों से या सुरा आदि के साथ पीये । अथवा वेदना से पीड़ित मनुष्य कपोतबंका मूल से सिद्ध किया दूध पीये ॥२५॥

हरीतक्यादिसिद्धं वा वर्षामुसिद्धमेव वा ।

त्रिफला या पुनर्नवा से सिद्ध किया दूध पीये ।

सर्वैष्यैवोपयोऽयः स्याद् गणो वीरतरादिकः ॥२६॥

वीरतरादिगण का घी, दूध, कषाय, यवगू, भोजन आदि सब कार्यों में उपयोग करना चाहिये ॥२६॥

घृतैः क्षारैः कषायैश्च क्षारैः सोत्तरबस्तिभिः ।

यदि नोपशमं गच्छेच्छेदस्तत्रोत्तरो विधिः ॥२७॥

घी, क्षार, कषाय, दूध, उत्तरबस्ति, से भी अश्मरी शान्त न हो तब, आगे कहीं विधि (शस्त्र कर्म) करे ॥२७॥

कुशलस्यापि वैद्यस्य यतः सिद्धिरिहाभूवा ।

उपक्रमो जघन्योऽयमतः संपरिकीर्तितः ॥२८॥

इस शस्त्र कर्म में कुशल वैद्य की भी सफलता अनिश्चित रहती है, इसलिये यह शस्त्र-कर्म जघन्य-हीन कहा गया है ॥२८॥

अक्रियायां ध्रुवो मृत्युः क्रियायां संशयो भवेत् ।

तस्मादापुच्छ्य कर्तव्यमौऽवर् साधुकारिणा ॥२९॥

इसलिये अच्छा कार्य करनेवाले वैद्य को चाहिये कि राजा या स्वामी की आज्ञा लेकर, उसे यह समझाकर कि चिकित्सा न करने पर तो मृत्यु निश्चित ही है, और चिकित्सा करने पर जीने की सम्भावना भी हो सकती है, यह बताकर, तब शस्त्र कर्म करे ॥२९॥

अथ रोगान्वितमुपस्तिग्धसपक्वद्वोषमोषत्कशितसभ्य-
क्तस्विन्नशरीरं सुक्लवन्तं कृतवलिमङ्गलस्वस्तिवाचन-
मग्नापहरणीयोक्तेन विधानेनोपकल्पितसम्भारमाश्रय,
ततो बलवन्तमविकलवमाजातुसमे फलके प्रागुपविद्यन्य-
पुरुषस्योत्सङ्गे निषण्णपूर्वकायमुत्तानमुन्नतकटीकं वक्षधा-
रकोपविष्टं सङ्कुचितजातुकूर्पर्मितरेण सह।वबद्धं सूत्रेण
जाटकैर्वा, ततः स्वभ्यक्तनाभिप्रदेशस्य वामपार्श्वं विमृद्य
मुष्टिनाऽवपीडयेदथोनाभेयांवदरमयधः प्रपन्नैति, ततः
स्नेहाभ्यक्ते कलुमनखे वामहस्तप्रदेशेनोमध्यमे अङ्गुल्यौ
पायो प्रणिधायातुसेवनीमासाद्य प्रयत्नबलाभ्यां पायुमद्वा-
न्तरमानीय निर्व्यलीकमनायतमविषमं च बस्ति सन्निवेश्य
भुशमुत्पीडयेदङ्गुलिभ्यां यथा प्रन्थिरिवोन्नतं शल्यं
भवति ॥३०॥

इसके उपरान्त रोगी व्यक्ति का स्नेहन करके, वमन, विरे-
चन से दोषों को निकालकर, रोगी को थोड़ा कुश (लंघन)
करके, स्नेहन, स्वेदन देकर, भोजन देवे । फिर बलि, मंगल
पाठ, स्वस्तिवाचन आदि कर्म करके अप्रोपहरणीय अध्याय में
कहीं विधि से सब साधन सामग्री को तैयार करके, रोगी को
सान्वना देवे । फिर बलवान् एवं न धवरांनवाले रोगी को घुटना
के बराबर ऊँची चौकी पर, पूर्व की ओर मुख करके बैठे हुए
दूसरे पुरुष की गोदी में-नाभि से ऊपर का भाग रख देवे ।
रोगी के नितम्बों के नीचे कपड़े की गद्दी या ऐँडवी रखकर
कटि को ऊँचा उठाकर, घुटने और कोहिनियों को संकुचित
करके, एक दूसरे के साथ धागे या कपड़े से बांध देवे । फिर
अच्छा प्रकार स्नेह का अभ्यंग करके, नाभि प्रदेश के वाम
पार्श्व में मलकर, मुट्ठी द्वारा नाभि के नीचे दबाये, जब तक
पत्थरी नीचे न आ जाये । फिर स्नेह से स्निग्ध, नख कटवाये
हुए, वाम हाथ की तर्जनी और मध्यमा अंगुलियों को गुदा में
प्रविष्ट करके सेवनी के साथ २ ले जाते हुए—गुदा और मेहन
के बीच में लाकर कोशिश एवं बल पूर्वक, स्तना में संकोच हुए
बिना, बस्ति को आयताकार-और सीधा करके, अंगुलियों से
जोर से दबाये, जिससे कि शल्य (अश्मरी) गांठ के समान ऊपर
को उठ आये ॥३०॥