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सर्वकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 457

अ० ३ ]

४९

चिकित्सास्थानम्

४०९

मुसलेनोक्षिपेत् कक्षामंससन्धौ विसंहते ।
स्थानस्थितं च बन्धीयात् स्वस्तिकेन विच्छिन्नः ॥३१॥
अंस सन्धि के अलग होने पर कक्षा को मूसल से ऊँचा उठाये । स्थान पर बुद्धिमान् वैद्य स्वस्तिक बन्धन बाँधे ॥३२॥
कीर्परं तु तथा सन्धिमुच्छेदन्तानुसार्जयेत् ।
अनुसृज्य ततः सन्धि पीडयेत् कूपराच्छुतम् ॥३२॥
प्रसार्थीकुच्छयेन्नैव स्नेहसेकं च दापयेत् ।
कूपरं सन्धि भंग को अंगूठे से मले । मलकर कोहनी की अलग हुई सन्धि को दबाये । खींचकर इसको कोहनी पर संकुचित (मोड़े) करे, ऊपर से स्नेह का परिषेक करे ॥३२॥
एवं जानुनि गुल्फे च मणिबन्धे च कारयेत् ॥३३॥
जानु-गुल्फ और मणियन्ध के भंग में इसी प्रकार करे ॥३३॥

उभे तले समे कृत्वा तलभग्नस्य देहिनः ।
बन्धीयादामतैलेन परिषेकं च कारयेत् ॥३४॥
मृत्पिण्डं धारयेत् पूर्वं लवणं च ततः परम् ।
हस्ते जातबले चापि कुर्यात् पापाणधारणम् ॥३४॥
मनुष्य की हथेली टूटने पर दोनों हथेलियों को समान करके, बाँध देवें । ऊपर कोल्हू के ताजे तेल से परिषेक करे । पहले मिट्टी का ढेला पकड़े, फिर सैन्धव नमक को पकड़े । हाथ में बल आने पर धीरे-धीरे पत्थर को थमाना आरम्भ करे ।

वि० मन्तव्य—जब भग्न ठीक हो जाय और पट्टी खोल दी जाय तब प्रथम मिट्टी का फिर लवण का ढेला सर्वदा हाथ में रखा रहे कुछ और बल आने पर पत्थर को धारण करे ॥ ३४, ३५ ॥

सन्तमुन्तमयेत् सिवन्तमक्षकं मुसलेन तु ।
तथोन्नतं पीडयेत्तु बन्धीयाद् गाढमेव च ॥३६॥
अक्षक अस्थि नीचे दबी हो तो इसको मूसल से ऊपर उठाये, ऊपर को उठी अस्थि को मूसल से नीचे दबाये । कसकर पट्टी बाँध देवे ॥ ३६ ॥

ऊरुवच्छापि कर्तव्यं बाहुभग्नचिकित्सिम् ।
बाहुभग्न की चिकित्सा उरु की भाँति करनी चाहिये ।
श्रीवायां विद्युतायां तु प्रविष्टायामधोऽपि वा ॥३७॥
अवतावथ हन्वोश्च प्रगुह्योन्मयोनन्तरम् ।
ततः कुशाः समं दत्त्वा वक्षपट्टेन वेष्टयेत् ॥३८॥
उत्तानं शासयेच्छैव सप्तरात्रमवद्वितः ।
श्रीवा के टेढ़ी होने या नीचे को बैठ जाने पर रोगी को ठोड़ी और गर्दन के पिछले भाग (गुद्दी) से पकड़कर ऊँचा करे । फिर बराबर कुशाओं को बिटाकर पट्टी से बाँध देवे । बिना आलस्य किये वैद्य इसको सात दिन पीठ के बल (चित्त) सुलाये ॥३७, ३८॥
हन्वस्थिनी समानीय हनुसन्धौ विसंहते ॥३९॥

स्वेदयित्वा स्थिते सम्यक् पश्चाङ्गीं वितरेद्विषक् ।
वातघ्नमधुरैः सर्पिः सिद्धं नस्ये च पूजितम् ॥४०॥
हनुसन्धि के अलग होने पर हनु की अस्थियों को ठीक विठाकर, स्वेदन करे । ठीक बैठ जाने पर पश्चाङ्गी बन्ध बाँध देवे । भद्रदाव्यादि, विदारिगन्धादि और काकोल्पादि से सिद्ध घृत नस्य में उत्तम है ॥४०॥
अभग्नाश्चलितान् दन्तान् सरत्कानवपीडयेत् ।
तरुणस्य मनुष्यस्य औतैरालेपयेद्ब्रह्मिः ॥४१॥
सिक्त्वाऽमनुभित्ततः शीतैः सन्धानीयैरुपाचरेत् ।
उत्पलस्य च नालेन क्षीरपात्रं विधीयते ॥४२॥
जीर्णस्य तु मनुष्यस्य वर्जयेत्तु चलितान् द्विजान् ।
युवा मनुष्य के न टूटे हुए, हिले एवं रक्तवाले दांतों को दबाये, बाहर शीतल लेप करे । शीतल जल से परिषेक करके, मधु घृत आदि सन्धानीय द्रव्यों से चिकित्सा करे । कमल के नाल से दूध पिलाये । बुद्ध मनुष्य के हिलते हुए दांतों की चिकित्सा न करे ।
वि० मन्तव्य—अभिघात से दन्त हिल जाने (दन्त में सन्धिमुक्त नामक भग्न हो जाने) पर यह उपाय किये जाते हैं । यदि बुद्ध के दन्त हिल जाते हैं तो वे फिर अचल नहीं होते ॥४१, ४२॥
नासां सन्तां विद्युत्तां वा ऋद्धीं कृत्वा शलाकया ॥४३॥
पृथङ्कनासिकयोर्नाड्यौ द्विसुख्यौ संप्रवेशयेत् ।
ततः पट्टेन संवेष्ट्य घृतसेकं प्रदापयेत् ॥४४॥
दबी हुई या टेढ़ी हुई नासा को शलाकाओं से सीधा करके, प्रत्येक नासा में दो मुखवाली नाड़ी प्रविष्ट करे । फिर वक्ष से लेपेटकर घी का सेक करे ।
वि० मन्तव्य—श्वास के लिए द्विसुखी नली लगाई जाती है ॥४३, ४४॥
भग्नं कर्णं तु बन्धीयात् समं कृत्वा घृतप्लुतम् ।
सद्यः क्षतविधानं च ततः परवात् समाचरेत् ॥४५॥
भग्न कर्ण को ठीक बाँधकर, प्रचुर घृत युक्त मधु से सद्यः क्षत की भाँति, अभ्यङ्ग, परिषेक आदि पीछे से बरते ॥४५॥
मस्तुलुङ्गाद्विना भिन्ने कपाले मधुसर्पिषौ ।
दत्त्वा ततो निवन्धीयात् सप्तार्हं च पिबेद्घृतम् ॥४६॥
घिर की अस्थियों के भिन्न होने पर यदि मस्तुलुङ्ग नहीं भग्न नहीं हुआ, तो मधु और घी को लगाकर बाँध देवे, और सात दिन घृत पीये ॥४६॥
पतनान्भिघाताद्वा शूनमङ्गं यदक्षतम् ।
श्रीतान् प्रदेहान् सेकाश्च भिषक् तस्यावचारयेत् ॥४७॥
घिरने से या चोट लगने से जिस अंग में क्षत हुए बिना सूजन आ गई हो, उस पर शीतल प्रदेह, शीतल परिषेक वैद्य बरते ॥४७॥
अथजङ्गैरुभग्नानां कपाटशयनं हितम् ।
कौलकावन्धनाथं च पञ्च कायां विजानंता ॥४८॥